प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न भक्ति को लेकर है। हमने बचपन से यही सीखा है कि भक्ति ज्ञान की माता है। भक्ति का अर्थ सगुण भक्ति, लेकिन आपने हमें समझाया है कि जानने से प्रेम भक्ति है। तो असल में भक्ति का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: तो आपने बता तो दिया।
प्र: जी।
आचार्य: जानने से प्रेम भक्ति है। बस वो ही। कितनी सुंदर आपने परिभाषा दे दी! यही भक्ति है और कुछ नहीं। लंबे-चौड़े किसी वर्णन की तलाश में मत रहिए। कोई बात अगर बहुत लंबी-चौड़ी हो रही है तो ज़्यादा सम्भावना है कि उलझी हुई है, जटिल है। और सत्य जटिल नहीं होता। सत्य सरल, सहज होता है, एकदम सीधी बात। तो वहाँ यह नहीं होता कि बड़े लंबे-चौड़े सिद्धांत और जटिलताएँ मिलेंगी। सत्य में तो चीज़ें क्या हो जाती हैं? सरल हो जाती हैं, सिम्प्लिफाय हो जाती हैं। तो भक्ति क्या है? मन का चैन के प्रति खिंचाव ही प्रेम है। उसी को आप भक्ति भी बोल सकते हो।
जब मन यह जान ले कि पूर्ण नहीं है, बँटा हुआ है—वही जो भज धातु है, उसी से भक्ति शब्द भी आया है। मन यह जान ले कि बँटा हुआ है, जैसे हाथ काट दिया हो किसी ने आपका, जैसे आपकी हस्ती ही काट दी हो दो में, और उस कारण आपको चैन न मिल रहा हो। और आप कह रहे हों, इस तरह से आधा-अधूरा होना ठीक नहीं है, पूर्णता चाहिए; तो भक्ति है।
पूर्णता की प्यास, जिसमें भक्त कहता है, ‘मैं छोटा हूँ, पर छोटा रहना नहीं' — यह भक्ति है। तो भक्ति करना माने क्या? स्वीकार करना कि मैं छोटा हूँ और संकल्प करना कि छोटा रहूँगा नहीं, बस यही भक्ति है। भक्ति क्या है?









