जड़ बेहोश लोगों को न कोई द्वंद उठता है न दुविधा || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। महाभारत में हम देखते हैं कि युद्ध से पूर्व अर्जुन को आत्यन्तिक पीड़ा होती है अपने सगे-सम्बन्धियों के विरुद्ध युद्ध करने में। उनका मन शोक से भर जाता है, वो नहीं चाहते हैं युद्ध करना। वहीं उनके दूसरे भाई — युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव — तैयार खड़े होते हैं युद्ध करने के लिए। इनके मन में कोई संशय नहीं होता। कोई दर्द, कोई तकलीफ़ नहीं! अर्जुन के मन में ये सारी दुविधाएँ मौजूद हैं और उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति बनी हुई है। इस दृश्य में अर्जुन हृदय से कमज़ोर जान पड़ते हैं।
अर्जुन की ऐसी स्थिति देखकर मेरे मन में प्रश्न आता है कि क्या हम अपने जीवन की परेशानियों से, दुख-दर्द से डरकर अध्यात्म की ओर आते हैं। जो लोग अध्यात्म की तरफ़ बढ़ते हैं, क्या वो इसलिए नहीं इस ओर आते हैं क्योंकि वो मन से कमज़ोर हैं और उनके मस्तिष्क में सिर्फ़ दुविधाएँ और जीवन को लेकर कई छोटे-बड़े डर हैं?
आचार्य प्रशांत: दुविधारहित होने के लिए ताक़त नहीं चाहिए, जड़ता चाहिए। जड़ता माने समझते हैं? मूर्खता, चेतना का अभाव। समझदारी का अभाव चाहिए, फिर कोई दुविधा नहीं रहती। तो अगर आप किसी को पायें कि संशय में है, सोच-विचार कर रहा है, द्वन्द्व-दुविधा में है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो कमज़ोर, पागल या बुद्धू है, इसका मतलब ये है कि वो जड़ नहीं है।
पूरे तरीक़े से द्वन्द्वमुक्त दो ही कोटियों के लोग होते हैं ― या तो बिलकुल बुद्धू हो या बुद्ध हो। या तो इतने बुरे तरीक़े से संस्कारित हो, ढर्राबद्ध हो, ढाँचाबद्ध हो, यन्त्रवत हो, कि उसको उसके उद्वेगों, आवेगों के अलावा कोई विकल्प दिखाई ही न पड़ता हो। जब आपको आपके आवेगों, भावनाओं के अलावा कोई विकल्प दिखाई ही नहीं पड़ेगा तो भाई दुविधा कहाँ से उठेगी! दुविधा उठने के लिए कम-से-कम दो विकल्प चाहिए न? ‘द्व-विधा’। दो विधाएँ हों, दो रास्ते हों, तब न द्वन्द्व उठता है। और कोई इतना ज़्यादा ढल गया हो पुराने तयशुदा ढाँचों में कि ढाँचे के अतिरिक्त उसको और कुछ न दिखाई देता हो, न सुनाई देता हो, न समझ में आता हो, तो उसको क्योंकर दुविधा उठेगी! ऐसे लोग आपको आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिखाई देंगे। आप उनके पास जाएँगे, वो कहेंगे, ‘सब पता है, कोई दिक्क़त नहीं, कोई तनाव नहीं, नो टेंशन ब्रो



