प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा और उसी तरह के विचारों से ओतप्रोत था। परन्तु जब मैं यहाँ आया तो मैंने पाया कि शायद सत्तर प्रतिशत भारतीय जो बड़े कोसमोपोलिटन सिटीज़ (सर्वदेशीय शहर) में रहते हैं — जैसे ये दिल्ली एनसीआर — वो मृत हैं अर्थात उनकी संवेदनशीलता मर चुकी है।
न यहाँ हवा शुद्ध है, न खाना-पीना में शुद्धता, सभी चीज़ों में मिलावट, दलाली, मक्कारी, जालसाज़ी, जोड़-तोड़, चाटुकारिता, भ्रष्टाचार, झूठा अभिमान तो फिर द्वन्द्व पैदा होता है, कि आपकी तरह, किसी तरह घुटते-पिसते, दर्द झेलते धीरे-धीरे समाज में एक बदलाव लाऊँ या यूरोप या किसी भी विकसित अन्य राष्ट्र में चला जाऊँ और सुकून से अपना और अपनी अगली पीढ़ी का जीवन अच्छे से निकालूँ?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जानना बड़ी भारी ज़िम्मेदारी है, बहुत भारी ज़िम्मेदारी है। जो जान गया वो भाग नहीं सकता। भागा सिर्फ़ नींद में जा सकता है। वैसे आपको जो भाव उठ रहा है, वो यदा-कदा मुझे भी उठता है। ठीक है? पर थोड़ा पाखंड तो मैं भी कर सकता हूँ न। तो उसी नाते मैं बोले दे रहा हूँ, भागा नहीं जा सकता और मेरा खुद से भी ये वादा है कि भागूँगा नहीं, भले ही भाव ये उठता है कि काहे के लिए जान दिये दे रहे हो।
सबकुछ जो आप बोल रहे हैं, वो अनुभव करता हूँ। ठीक है? कई बार लगता है दीवारों पर सिर मार रहा हूँ, ज़िन्दगी खराब कर रहा हूँ और मैं शायद बेहतर काम कर सकता हूँ अगर मैं भारत की जगह कहीं और रहूँ। लेकिन पाँव जमा कर रखना है, कहीं भागना नहीं है, सम्भावना नहीं है, विकल्प ही नहीं है। जब जान गये कि कहाँ आपकी ज़रूरत है तो आप किसी दूसरी जगह कैसे जा सकते हो? ज़रूरत मेरी यहाँ है, मैं वहाँ जाकर क्या करूँगा!










