भक्ति और ज्ञान, दोनों की मंज़िल एक है || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह और आदि शंकराचार्य पर (2019)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, "इक अलफ़ पढ़ो छुटकारा ए।"
बाबा बुल्लेशाह जी कहते हैं कि बस अल्लाह का नाम लो, उसी में मुक्ति है। जबकि आदि शंकर जी कहते हैं कि दुख का मूल कारण ही अज्ञान है और अज्ञान नेति-नेति से ख़त्म होता है। और बाबा बुल्लेशाह जी कह रहे हैं कि तुमने क़ुरान कंठस्थ कर ली और अपनी ज़बान को भी रवा कर लिया है, फिर भी तुम्हें ज्ञान नहीं हुआ है। तो बुल्लेशाह जी केवल अल्लाह का नाम लेने और परमात्मा को याद करने पर ज़्यादा ज़ोर दे रहे हैं जबकि आदि शंकर अपने अज्ञान को देखने पर ज़ोर दे रहे हैं। और बिना अज्ञान को देखे अगर हम अल्लाह या परमात्मा का नाम भी लेंगे तो वो भी झूठ ही होगा। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: कपिल, एक ही चीज़ है, देखने के दो अलग-अलग छोर हैं। जहाॅं से देख रहे हैं बुल्लेशाह, वहाॅं संसार दिखाई ही नहीं देता। उनको तो बस वही दिखाई देता है जिसको वो कभी अपना मुर्शिद कहते हैं, कभी रब कहते हैं, कभी अल्लाह कहते हैं, कभी मुक्ति कहते हैं।
भक्त की दृष्टि है वो! बाबा बुल्लेशाह की दृष्टि भक्त की दृष्टि है। भक्त की दृष्टि कहती है अलिफ़ पढ़ लो। अलिफ़ माने 'अ', अल्लाह। उसको चाहे तो ऐसे कह दीजिए 'अ' से अल्लाह या ये कह दीजिए अलिफ़ माने पहला। पहला, अव्वल; और अव्वल माने अल्लाह।
तो भक्त की दृष्टि कहती है कि तुम इधर-उधर की बातें छोड़ो, तुम इस उस एक को याद करो तो ये बाक़ी सब अपनेआप ख़त्म हो जाएँगे। ख़त्म करने की बात भक्त भी करता है पर ख़त्म करना उसके लिए प्राथमिक नहीं है, उसके लिए प्रेम प्राथमिक है। वो कहता है कि ख़त्म करने में समय कौन ख़राब करे। दुनिया के जंजाल को काटने में समय कौन ख़राब करे, मैं तो सीधे उसकी बात करूँगा और उस तक पहुँचूँगा जहाँ तक पहुँचना है।






