
जलवायु संकट पर बहस अक्सर नीतियों और तकनीक तक सिमट जाती है, पर दुनिया की आबादी, उत्पादन, कार्बन और तापमान के ग्राफ़ साथ रखें तो एक ही रेखा दिखती है। धरती को दो चीज़ें मार रही हैं: बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता उपभोग। दोनों एक ही वृत्ति से निकलते हैं, ख़ुद को न जानना और बाहर जाकर भोगना। जंगल घट रहे हैं, जीव-जंतु मिट रहे हैं। जब तक करने वाला नहीं बदलेगा, नीतियाँ कैसे बदलेंगी? क्या समाधान हमारे ही हाथ में है?


























हमें चेतना होगा, ज़मीनी हक़ीक़त को स्वीकारना होगा, तथ्यों को सम्मान देना होगा। वरना हमारे प्यारे देश को प्रकृति की बड़ी कड़ी सज़ा दुर्भाग्यवश भुगतनी पड़ेगी।



प्रलय जैसी स्थिति जब बनेगी, तो बाक़ी प्राणी किसी तरह अपना गुजारा कर लेंगे। आपका क्या होगा? और अगर वो मरेंगे भी, विलुप्त भी होंगे, तो दर्द सहकर मरेंगे, दुख सहकर नहीं। आपका क्या होगा? ना तो हमारा शरीर इस लायक है कि कुछ सह सके, ना हमारा मन इस लायक है कि कुछ सह सके। हम पृथ्वी की सबसे कमजोर प्रजाति हैं।


एलन मस्क को मनुष्यों की प्रजाति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता क्या? बाक़ी सब जो प्रजातियाँ हैं, वो क्या हैं? हमारे दुश्मन हैं या वो हमारे बच्चे हैं? वो चंद गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं। वो बहुत गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं, जहाँ पर अब टीएफ़आर इस लेवल पर आ गया है कि पॉपुलेशन स्टेबलाइज़ हो गई है, या माइनर डिक्रीज़ है। कुछ देश हैं बस ऐसे।





प्रश्नकर्ता१: नमस्ते सर। सर, बकरीद आने वाली है तो कल ही मेरे दोस्तों से मेरी बात हो रही थी व्हाट्सएप पर। तो उन्हें मैंने बोला कि भई इस बकरीद पर आप बकरा मत काटना — वो हर बकरीद पर काटते हैं।













नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?
जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।
जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।
जानवर अपनी जैविक प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य के पास विवेक और चुनाव की क्षमता है। इसलिए अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए पशुओं का उदाहरण देना उचित नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण यह है कि हम सचेत होकर निर्णय लें। इसी तरह खेल में सफलता तब मिलती है जब ध्यान खेल पर हो, न कि जीत, प्रशंसा या दूसरों को प्रभावित करने पर। परिणाम की चिंता बढ़ते ही एकाग्रता टूटती है और प्रदर्शन प्रभावित होता है।
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।
जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
हम जो एनिमल लवर भी बनते हैं, तो आमतौर पर क्या करते हैं, मुझे आसपास जो दिख रहा है, मैं उसका ख़्याल कर लूँगा। तो ये तो तुम्हारा बहुत संयोग से रिश्ता बना न, बोध की बात तो ये है कि मैं देखूँ कि पूरी पृथ्वी पर क्या चल रहा है और उसके लिए काम करूँगा। और बिल्कुल ये हो सकता है कि जितना समय आप चार जानवरों की सेवा में लगा रहे हो, उतना समय अगर आप जानवरों के लिए सही तरीक़े से लगा दो, तो आप 4 हज़ार जानवर बचा दो। तो बताओ, फिर ये चार जानवरों की सेवा करना प्रेम हुआ या हिंसा?
खेत खाली जगह नहीं है; खेत एक ह्यूमन कॉलोनी है। खेत का मतलब होता है कि तुमने वहाँ की पूरी प्रकृति नष्ट कर दी है। 80% जो खेती होती है, वो सिर्फ़ इंसान को अन्न खिलाने के लिए नहीं, वो इंसान को मीट खिलाने के लिए होती है। तो जंगल काट के तुमने खेत बनाया, और वो खेती इसलिए कर रहे हो कि अब जानवर काटोगे। अगर हम में थोड़ी चेतना जगेगी, तो जैसे हम मनुष्यों को मारने को अपराध समझते हैं, वैसे ही हम जीवों को मारने को भी अपराध घोषित करेंगे, और पेड़ काटने को भी अपराध घोषित करेंगे।
यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।
‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।
रेस्टोरेंट में जाकर बैठो, वहाँ मेन्यू आता है; उसमें लाल निशान वाले इतने सारे होते हैं; क्या बुरा नहीं लगता? सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता हूँ, तो वहाँ पर झटका मीट, हलाल मीट। छोटे शहरों की ओर चले जाओ, तो वहाँ तो पूरे के पूरे बकरे लटक रहे हैं। जिस इंसान में थोड़ी भी जागृति है, वह जैसे-जैसे इस दुनिया को देखेगा, वैसे-वैसे बिल्कुल पगलाता जाएगा। कहेगा, "ये दुनिया है? ये जीने की जगह है? यहाँ क्यों जिए?" पर जीना है। दुनिया में आग लगी हुई है, तो आग बुझाने के लिए जीना है।
मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूंद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरह से इतना पानी दिया जाएगा कि पीकर ज़िंदा रह लो। अगर प्लानेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट फॉर्म्स हैं; ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे। किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना।
आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। यह प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है। यह आंतरिक दूषण है, जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है। छोटी सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदइन। और जो चीज भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा?
दुनिया में किसी देश में उतनी खराब जलवायु नहीं है, जितनी भारत में है, और भारत में कहीं भी उतनी खराब नहीं, जितनी दिल्ली में है। यहाँ साँस नहीं ली जाती, यहाँ का पानी गंदा है, लेड, मर्करी सब मिले हुए हैं पानी में। जीना मुश्किल होने वाला है सबका, बस कुछ पर असर आज ही पड़ जाएगा, कुछ पर चार साल बाद पड़ेगा। जब तक आपको पता चलेगा कि यह असर इर्रिवर्सिबल है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, आप कुछ नहीं कर पाओगे।
पृथ्वी नहीं गर्म हो रही है, हम भीतर से तप रहे हैं, अपनी कामनाओं में। आग लगी हुई है हमारे भीतर — और भोग लूँ, और भोग लूँ, मुझे और कंज़म्पशन करना है। ये जो हमारे भीतर आग लगी हुई है ना, ये ग्लोबल वार्मिंग के रूप में हमें दिखाई दे रही है। कचरा बाहर नहीं फैल रहा है, कचरा हमारे भीतर है। और जब तक इंसान के भीतर के कचरे को साफ़ नहीं करोगे, बाहर कचरे को रोकने का कोई तरीका नहीं है।
अरे होगा कोई आमरण अनशन कर रहा होगा, हमें क्या लेना-देना?” तुम्हें ये लेना-देना कि तुम भूखे मरने वाले हो क्लाइमेट चेंज से। खेतों में फसलें उगनी बंद होने वाली हैं, और जिनकी वजह से खेतों में फसलें उगनी बंद होंगी, उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। उनके पास बहुत पैसा है। अपनी आमदनी का वो खाने पर एक या दो प्रतिशत खर्च करते हैं बस, उनके पास इतना पैसा है। वो दो प्रतिशत पहले खाने पर खर्च करते थे, अब तीन प्रतिशत खर्च कर लेंगे, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
अगर कोई NCR में रह रहा है लगातार, तो उसकी उम्र से दस–पंद्रह साल गए — निश्चित रूप से गए। हमको सिखाया नहीं गया है कि क्या कीमती है। गुड लाइफ़ इसमें नहीं है कि हवा साफ़ है, पानी साफ़ है, सेहत अच्छी है, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने को मिल रहा है। गुड लाइफ़ इसमें है कि तुम मेरा माल खरीदो। जब तक हम वो सीमा नहीं तय कर देते कि भाई, इससे ज़्यादा कंज़म्प्शन की किसी भी आदमी को ज़रूरत नहीं है, तब तक ये AQI वगैरह बढ़ता ही रहेगा। लोग बस ये कहते हैं कि “मैं तो नहीं मरा न, और अभी तो नहीं मरा न; आगे मरेंगे तो देखा जाएगा।
तुम कैसे शुद्ध सात्त्विक ज़िंदगी जी लोगे? संभव ही नहीं है। सड़क पर चल रहे हो न? सड़क पर खून है। वो सड़क ऐसे ही नहीं बन गई। सड़क पर ही चलते हो न? भोजन ही खाते हो न? भोजन में खून है। तुम कैसी सात्त्विक ज़िंदगी जी रहे हो? झूठ! हवा में साँस ले रहे हो न? हवा में धुआँ है। और वो धुआँ किस चीज़ का है? वो लाशों का धुआँ है। तुम किस सात्त्विक ज़िंदगी की बात कर रहे हो? लेकिन हमें ये बर्दाश्त करना पड़ेगा, हम गुनाह में शरीक हैं।
जिसकी चेतना पूरे तरीके से उसकी देह से आबद्ध है, वह पशु है। पशुबलि का मतलब जानवर मारना नहीं है, पशुबलि का मतलब अपने भीतर के जानवर को मारना है। बकरे को नहीं मारना है, ये जो भीतर ‘मैं-मैं’ चलता रहता है, इसे मारना है। एक पशु को मारकर खाने से तुम्हें शांति कैसे मिल जाएगी? इससे कौन-सा देवता प्रसन्न हो जाएगा? ये क्रूरता और मूर्खता की बात है। वास्तविक धर्म कहता है — “भीतर वाले पशु को मारो।”
ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ यह भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का हो। ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चले और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर और प्रेम हो।
जो चीज़ तुम्हें सबसे प्यारी हो, प्यार से यहाँ पर अर्थ है मोह का, आसक्ति का। जिससे तुमने अपनी आसक्ति बैठा ली है, जिससे लिप्त हो गये हो व्यर्थ ही, उसको त्यागना ही बलि है और ये बात ग्रन्थ बार-बार ज़ोर-ज़ोर से, दोहरा-दोहराकर, चिल्लाकर कहते हैं कि बलि की सही परिभाषा ये है। लेकिन इंसान ने बलि के नाम पर जानवरों को काटना शुरू कर दिया, हमसे ज़्यादा बड़ा जानवर कोई है क्या?
आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक स्तर से 50% ज़्यादा हो गई है। ऐसा पाँचवें महाविनाश के बाद कभी नहीं हुआ। इसे छठा महाविनाश माना जा रहा है। सिर्फ़ तापमान नहीं बढ़ने वाला, तापमान की रेंज ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ने वाली है। यदि औसत तापमान 3 डिग्री है तो पीक 8–10 डिग्री बढ़ेगा। हर प्रजाति तापमान पर निर्भर होती है। तापमान बदल दोगे तो पूरी प्रजाति ही नष्ट हो जाएगी। यदि पूर्ण विध्वंस होगा तो वह आपने तय किया है और आप चाहो तो उसका समाधान भी हो सकता है।
पिछले एक हज़ार साल में मानवता के सामने जलवायु परिवर्तन से बड़ी कोई समस्या नहीं आई है। दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा एक-दो प्रतिशत प्रिविलेज्ड आबादी करती है और इसी ने सबको नशे में डाल रखा है। सारा काम अमीरों ने किया है, और गरीब भुगत रहे हैं। यह मानव की उपभोग-प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न संकट है। ज़िंदगी की एक समझ चाहिए, जिसकी शिक्षा हमें नहीं दी जा रही। हम अपने आपको नहीं जानते और यही वजह है कि इंसान अब इस हालत में पहुँच गया है कि बचना बड़ा मुश्किल हो गया है।
पृथ्वी पर आज तक पाँच बार महाविनाश हो चुका है। महाविनाश माने सारे जीव जंतुओं का संपूर्ण नाश।इतिहास में 5 बार पृथ्वी का तापमान बेहिसाब बढ़ा, और ग्रह पर जीवन ही समाप्त हो गया।
और अब, छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!और इस छठे महाविनाश का कारण भी…
प्रकृति के सारे चक्र क्लाइमेट चेंज से प्रभावित होने जा रहे हैं — ये प्रलय ही है। सब चक्र एक-दूसरे पर आश्रित हैं और फ़ीडबैक लूप्स सक्रिय हो चुके हैं। हम सिर्फ़ मरने नहीं वाले, हम पागल होकर मरने वाले हैं। अनुमान है कि 120 करोड़ लोग अपना घर छोड़कर भागने को विवश होंगे। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विस्थापन होगा। यह वैल्यू सिस्टम की कैटस्ट्रॉफ़ी है; किसको महत्त्व देना है और किसको नहीं — यह हमें पता नहीं है, इसलिए अध्यात्म बहुत ज़रूरी है।
कुत्ते को खाने के लिए ऐसा ऑर्गेनिक मैटर चाहिए, जो वहाँ बाहर सड़क पर खुले में पड़ा हुआ है। और जैसे-जैसे समृद्धि आती है, वैसे-वैसे उनको खाने को मिलना ही बंद होता जाता है। या तो आप उन्हें अपने घरों में ले आइए, नहीं तो वे बाहर अब सड़कों पर ज़िंदा नहीं रह सकते। आप पशु-प्रेमी हैं, इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता, पर यह बात थोड़ी विचित्र-सी लगती है कि हम दूसरी प्रजातियों और क्लाइमेट चेंज की बात नहीं करते। अगर हम में सचमुच प्यार है, तो वह प्यार और प्रजातियों को हम क्यों नहीं दिखा रहे हैं?
हम शायद वह आख़िरी पीढ़ी हैं, जो मौसमों को कुछ सामान्य देख पा रहे हैं। सेलिब्रिटी, क्रिकेटर, पॉलिटिशन, या रिलिजस फ़िगर — इन सबका मूल्यांकन इनके कार्बन फुटप्रिन्ट से होना चाहिए। एक बिलियनेयर का जेट दो घंटे में उतना एमिशन करता है, जितना एक भारतीय हज़ारों साल में करेगा। इनके एमिशन से हज़ारों प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। पृथ्वी जल रही है, मासिव एक्सटिंक्शन हो रहा है। अमीर मौज कर रहे हैं, आम आदमी मर रहा है। Operation 2030 ही क्लाइमेट चेंज रोकने का एकमात्र तरीक़ा है, क्योंकि आत्मज्ञान का अभाव ही क्लाइमेट चेंज है।
‘ग्रीनवॉशिंग’ का मतलब होता है कि जो चीज़ पर्यावरण की बहुत कम मदद कर पाएगी, उसको ऐसे प्रदर्शित करना जैसे वो पर्यावरण के लिए बड़ी हितकारी हो। ये एक तरह की धोखेबाज़ी है। पेड़ लगाना बहुत बड़ी ग्रीनवॉशिंग है। पेड़ लगाने से नहीं होगा; ग्रीनवॉशिंग मत करो। तुम दो काम बहुत घातक कर रहे हो — प्रोडक्शन और पॉपुलेशन; ये बरकत नहीं है, ये पृथ्वी का नाश है। कुछ और मत करो; बस प्रोडक्शन और पॉपुलेशन कम करो — ये है क्लाइमेट क्राइसिस का इलाज।
एलोन मस्क जैसे कुछ बड़े नाम खुलेआम कह रहे हैं कि आबादी और बढ़ाओ, वरना पॉपुलेशन डिक्लाइन आ जाएगा। इस वक़्त दुनिया की जो बड़ी से बड़ी बीमारियाँ हैं — चाहे वो बायोडायवर्सिटी लॉस हो, चाहे क्लाइमेट कैटास्ट्रॉफी हो — उसका वास्तविक समाधान सिर्फ़ एक है: जनसंख्या नियंत्रण। तो ये अगर कभी होगा भी कि चाँद पर या मार्स पर ह्यूमन कॉलोनी बनेगी, तो उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ जो सबसे अमीर लोग हैं, वो जाकर के रहने वाले हैं। ग़रीबों के लिए तो यही रहेगा — कि मर जाओ।
नेता, सेलिब्रिटीज, क्रिकेटर और इंडस्ट्रियलिस्ट, जो आबादी के शीर्ष 0.01% हैं, वही इस ग्रह को तबाह करने के ज़िम्मेदार हैं। इनके प्राइवेट जेट और लाइफस्टाइल से millions of tons कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है, जो इस कार्बन क्राइसिस का असली कारण है। पर आम आदमी को गुनहगार बताया जा रहा है—उसे कहा जा रहा है बल्ब कम जलाओ, रिसाइक्लिंग करो। असली समाधान यही है कि इन शीर्ष लोगों के consumption पर रोक लगे, नहीं तो आम आदमी 55–60 डिग्री तापमान में पागल होकर मरेंगे।
माँस यूँ ही तो तुम्हारी थाली पर नहीं आ जाता, न? माँस आने से पहले क़त्ल होता है, हिंसा होती है। हिंसक मन के साथ जिओगे कैसे? एक-एक साँस में बेचैनी रहेगी, तड़पते रहोगे। इसलिए बचो जानवरों को मारने से, या किसी को भी मारने से। किसी भी प्रकार की हिंसा से बचो — किसी और की ख़ातिर नहीं, अपनी ख़ातिर।
वो जो सामने आपके एक जीव है, उसकी आँखों में देखो। उसको क्या फ़र्क पड़ता है कि उसका झटका हुआ कि हलाल हुआ; वो तो जान से गया न? और उसने कुछ ऐसा गुनाह नहीं कर दिया था कि आपने उसको मार दिया। और उसको मार करके आपको कोई पुण्य कहीं से नहीं मिल गया। ये काम चाहे हिंदू करे, चाहे मुस्लिम करे, कोई करे — इससे कैसे कोई पुण्य हो सकता है? ये तो सीधे-सीधे पाप का काम है।
तो उन्होंने मुझे सीधा ये बोला कि भाई, हम…
क्लाइमेट चेंज, न्यूक्लियर डिज़ास्टर — ये सब ख़तरे इंसान के लिए हैं, पर अपनी फ़िक्र हम नहीं करते क्योंकि उसके लिए सबसे पहले स्वीकार करना पड़ेगा कि हमारे ऊपर ख़तरा है, और हमें ठीक होने की ज़रूरत है। हम बहुत तेज़ी से एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें हर आदमी पागल होगा — बाहर से स्वस्थ होगा और भीतर-ही-भीतर साइको। प्रकृति के विनाश की चिंता मत करो, अपने विनाश की चिंता कर लो। प्रकृति अपने आप को पुनर्जीवित कर लेगी — ये इंसान है जो वापस नहीं आएगा।
क्लाइमेट चेंज की समस्या इंसान की आबादी और इंसान के उपभोग के कारण है। और इन दोनों समस्याओं के केंद्र में आदमी की पाश्विक वृत्ति है। उस वृत्ति को न सरकारें हटा सकती हैं, न वैज्ञानिक हटा सकते हैं, उस वृत्ति को सिर्फ़ अध्यात्म हटा सकता है। इसलिए जब तक आध्यात्मिक तल पर इस समस्या को संबोधित नहीं किया जाएगा, तब तक संपूर्ण पृथ्वी और मानव जाति के बचने की कोई संभावना नहीं है।
पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”
मोहन: इतने दिनों से कहाँ था? दिखाई नहीं दिया?
सोहन: भाई! घूमने गया था। पास के हिल स्टेशन तक मस्त 4 लेन रोड बनी है!
मोहन: अच्छा, वही जो पहाड़ काटकर और पेड़ों को जलाकर बनी है?
सोहन: तुझे क़ानून नहीं पता? विकास के लिए जो पेड़ कटते हैं, उसकी…
अध्यात्म के मूल में करुणा होती है — अपने और सारे संसार के प्रति। 'पीर सबन की एक-सी — मुर्गी, हिरणी, गाय।' आदमी हो, मुर्गी हो, हिरणी हो या गाय — पीड़ा सभी को एक जैसी होती है। अगर तुम अपनी पीड़ा मिटाने को उत्सुक हो, तो दूसरे को पीड़ा कैसे दे सकते हो? यह संभव ही नहीं कि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक हो और साथ ही साथ मांस चबाता हो, जानवर का खून पीता हो — हो ही नहीं सकता।
जितनी देर में हम बात कर रहे हैं, जितनी देर में लोगों ने ये बात सुनी होगी थोड़े कुछ चंद मिनट उतनी देर में गई। अब हमें कभी उनके दर्शन नहीं होंगे गए। अब ऐसा भी नहीं है कि किसी और जन्म में वो लौट कर आएँगी। वो इतिहास बन गई वो कभी नहीं लौट कर आने की है। ये हम कर रहे हैं और इस भयानक तबाही से हम गुजर रहे हैं।
जंगलों की कटाई, पेड़-पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, प्लास्टिक से सागर भर जाना—ये सब हमारे भीतर की हिंसा और बर्बादी का प्रतिबिंब हैं। जब तक इंसान के भीतर की सफ़ाई नहीं होगी, पर्यावरण की तबाही नहीं रुकेगी। बाहरी स्वच्छता, आंतरिक स्वच्छता की छाया है। अगर 1% लोग जागरूक हो जाएँ, तो ये 99% अपने आप ठीक हो जाएँगे क्योंकि ये जिधर हवा बहेगी, उधर ही बह निकलेंगे। इसलिए बस 1% जागरूक लोग चाहिए जो दिशा तय करें।
कुल 4000 मिलियन हेक्टेयर हमारे पास जंगल है पृथ्वी पर, और लगभग पिछले 10 सालों में ही हमने उसमें से 500 हटा दिया। सबसे ज़्यादा कहाँ हटाया जाता है, मालूम है? गरीब देशों में — जैसे भारत। 2015 से 2020 के बीच जिन देशों में सबसे ज़्यादा फॉरेस्ट कवर हटाया गया, उनमें से एक भारत है। एक लंबे अरसे तक पृथ्वी के 50% क्षेत्र पर जंगल थे। अभी कितने हैं? 30%। ये पृथ्वी ऐसे चल ही नहीं सकती। क्या समाधान है इसका? जब तक हम इंसान को ही नहीं बदलेंगे, हम देश और पॉलिसीज़ को कैसे बदल सकते हैं?
इंसान के भीतर जो यह भाव है कि मैं एक इंसान हूँ जो पैदा हुआ है भोगने के लिए, जो दुनिया से अलग अपने हित साध सकता है, दूसरों को बर्बाद कर के खुशी पा सकता है, जब तक इंसान के भीतर ये चीज रहेगी तब तक इसका मुकाबला करना बहुत मुश्किल है
आज के समय में माँस का भक्षण किसी का निजी मसला नहीं है। आपको इस बात की परवाह करनी होगी कि किसी की थाली में क्या है, क्योंकि दूसरा जो खा रहा है, उसका असर पूरी दुनिया पर, पूरे पर्यावरण पर और हर एक की ज़िंदगी पर पड़ रहा है। माँस-भक्षण इस समय दुनिया की सबसे घातक बीमारी है। पृथ्वी की नदियाँ, पहाड़, पर्यावरण, हवा, तापमान, सब कुछ तबाह हो गए — सिर्फ़ इसलिए क्योंकि आदमी को माँस खाना है।
वातावरण में तापमान बढ़ने के कारण धरती पर तरह-तरह के अनिष्ट होते हैं। लेकिन फिर भी आदमी वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि गैसों का उत्सर्जन किए ही जा रहा है, जो वातावरण के तापमान को बढ़ाती हैं। इसे रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं, पर उनमें से कोई भी अभियान सफल होता दिखाई नहीं दे रहा, क्योंकि उसका सीधा संबंध आदमी के भोग से है। इसे रोकने का एक ही तरीक़ा है—या तो भोग कम कर दो, या फिर भोगने वालों की संख्या कम कर दो।
जंगल बायोडायवर्सिटी का केंद्र होते हैं। इतना तो हम समझते हैं। आप जब जंगल काटोगे तो वहां जो जिस दिशा में भाग सकता है भागेगा, ये भी समझते हो। ज्यादातर कहीं कोई भागेंगे बचेंगे नहीं। अब हिरण कहां को जाके बचेगा? वो मरेगा। हाथी कहां जाएगा? मरेगा। पर जंगल में कुछ ऐसे हैं जो नहीं मरेंगे बल्कि वो खुश हो जाएंगे कि जंगल कट गया। वो कौन है जानते हो? वो वायरस हैं। आप जंगल काटोगे पेड़ नहीं रहा तो उनको नया होस्ट मिल गया। कौन? जंगल काटने वाला। वो पहले पेड़ में रहता था या कहीं और रहता था वो आप में रहेगा।
Technology अधिक-से-अधिक इतना ही करती है कि मशीन की Efficiency बढ़ा देती है। अगर Technological Development उनके हाथों में है जिनका मन अभी भोगवाद और लालच से मुक्त नहीं है, तो हर प्रकार का तकनीकी विकास आत्मघातक ही होगा। असली समस्या ये है कि हमें भोगना है, हम प्रेम का अर्थ भी भोग समझते हैं। जब मन बदलेगा, तभी दुनिया में हो रही क्षति बदलेगी। ये बहुत बड़ी भ्रान्ति है कि तकनीकी विकास दुनिया को बचा लेगा।