
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आवारा कुत्तों की संख्या और इससे जुड़े स्वास्थ्य व सुरक्षा ख़तरों को लेकर देश भर में चर्चा है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही दिल्ली एनसीआर में सभी आवारा कुत्तों को आठ हफ़्तों में शेल्टर में रखने के निर्देश दिए हैं। एक ओर देखा जाए तो जहाँ की कोर्ट और कई लोग जनता की सुरक्षा के लिए समर्थन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर जानवर-प्रेमी उसके विरोध में हैं और इसे अमानवीय कृत्य बता रहे हैं। आपका क्या कहना है इसके ऊपर?
आचार्य प्रशांत: देखिए, एक ओर तो मैं सुप्रीम कोर्ट के तर्क को समझता हूँ, सबसे पहले तो ये। क्योंकि भारत में स्ट्रे डॉग्स (आवारा कुत्ते) लगभग 7 करोड़ हो गए हैं और उनके कारण लाखों डॉग-बाइट्स के मामले होते हैं, (काटने के) और हज़ारों रेबीज़ के भी मामले होते हैं। और रेबीज़ हम जानते हैं कि बिल्कुल एक प्राणघातक बीमारी है, उसका कोई इलाज नहीं है। और रेबीज़ न भी हो तो भी काटने के मामले बहुत सारे होते हैं, छोटे बच्चे हैं, बुज़ुर्ग हैं, उन्हें कई तरह की समस्याएँ जो हैं, यहाँ तक कि सड़क पर जो साइकिल वाले, बाइक वाले हैं, कई तरह की दुर्घटनाएँ भी होती हैं।
तो ये सुप्रीम कोर्ट का तर्क है और इस तर्क में कुछ वज़न है। सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना पड़ेगा, कि आवारा कुत्तों की वजह से हैं समस्याएँ, और इतने आवारा कुत्ते दुनिया में और किसी देश में हैं भी नहीं।
अब फिर जो पशु-प्रेमी व्यक्ति और संगठन हैं —डॉग-लवर्स, एनिमल-लवर्स, एनिमल-एक्टिविस्ट उनके भाव को भी हमें ध्यान में रखना पड़ेगा, क्योंकि उनकी बात में भी एकदम दम है। वो कह रहे हैं, कि आप इतने सारे कुत्तों को अचानक उठाकर कहाँ ले जाएँगे? और आप जिन डॉग-शेल्टर्स की बात कर रहे हैं, वे तो अभी बने ही नहीं हैं। इतनी तो कैपेसिटी ही नहीं है। इतने सारे आप कुत्ते उठाना चाहते हैं, लगभग 10 लाख, 20 लाख कुत्ते इनके लिए तो आपके पास शायद पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं है।
और अगर आप इन्हें ले भी जाएँ तो इस बात की क्या गारंटी है कि वहाँ पर उनको समुचित व्यवस्थाएँ मिलेंगी — देखभाल, खाना-पीना, दवाई मिलेगी। और उनका एक तर्क और है कि ये स्ट्रे डॉग्स नहीं हैं, ये कम्युनिटी डॉग्स हैं। एक तरह से ये हमारे समाज का, समुदाय का हिस्सा बन चुके हैं। तो हमारा इनसे भावनात्मक लगाव भी है। तो आप इनको नहीं ले जा सकते, और इस बात में बिल्कुल दम है क्योंकि भावनात्मक लगाव तो होगा ही।
कुत्ता लगभग 30–40 हज़ार साल से इंसान का साथी रहा है। कुत्ता पहले हुआ करता था भेड़िया, जो ग्रे-वुल्फ है। तो भेड़िया और कुत्ता एक ही साझी वंशावली है। यानी कुत्ते और भेड़िए आपस में आप लोग कह सकते हैं कि कज़िन्स हैं, ममेरे चचेरे भाई हैं ये। लेकिन फिर कुत्ता हमारे साथ रहने लग गया, उसका आकार छोटा हो गया, उसने पूँछ हिलानी शुरू कर दी। वो हमारा साथी बन गया और बड़ा वफ़ादार साथी बना है।
बहुत तरीक़े से उसने हमारे कामों में भी मदद की है — रक्षा से लेकर गाइड, सेना में भी उसका उपयोग रहता है। घरों की वो चौकीदारी करता है और हमारे साथ रहता है। उससे एक हमारा भावनात्मक जुड़ाव भी हो जाता है। तो ये बात है।
ये रहा मुद्दा, अब इस मुद्दे में चीज़ ये है कि हम अगर देखें कि हुआ क्या है इतिहास में? तो जो-जो देश विकसित होते गए हैं और जहाँ-जहाँ शहरीकरण (अर्बनाइज़ेशन) बढ़ता गया है, वहाँ-वहाँ कुत्तों को खाने की चीज़ें मिलनी बहुत कम हो गई हैं। तो अगर आप यूरोप को देखेंगे, या जापान को देखेंगे, या अमेरिका में भी जो शहर हैं बड़े, उनको देखेंगे तो वहाँ आपको स्ट्रीट डॉग्स, स्ट्रे डॉग्स, आवारा कुत्ते मिलेंगे ही नहीं। एकदम नहीं मिलेंगे। दो-चार हों इधर-उधर कहीं तो इक्का-दुक्का अलग बात है। वहाँ आपको मिलेंगे पेट-डॉग्स।
और मैं समझता हूँ कि ये इंसान और कुत्ते के रिश्ते की सही, सार्थक और अंतिम अभिव्यक्ति होनी चाहिए। और अगर ये अभिव्यक्ति हम नहीं दे रहे हैं—हम कहते हैं कि वी आर डॉग-लवर्स, पर हम कुत्तों को अपने घरों में रखने को तैयार नहीं हो रहे तो फिर नतीजा वही निकलेगा कि इंटीग्रेशन ऑर एक्सटिंक्शन। या तो आप उन्हें अपने घरों में ले आइए, नहीं तो वो बाहर अब सड़कों पर ज़िंदा नहीं रह सकते।
क्योंकि जैसे-जैसे शहर साफ़ होते जाएँगे और विकसित होते जाएँगे, देखिए, कुत्ते को खाने के लिए गार्बेज चाहिए, जो डंपिंग स्पॉट्स हैं, वो चाहिए। उनको ऐसा ऑर्गेनिक मैटर चाहिए, जो वहाँ बाहर सड़क पर खुले में पड़ा हुआ है। और जैसे-जैसे समृद्धि आती है, सफ़ाई आती है और ज़्यादा गेटेड कम्युनिटीज़ बन जाती हैं, वैसे-वैसे बहुत बड़ी व्यवहारिक बात ये है कि कुत्तों को खाने को मिलना ही बंद होता जाता है। और ये मैं कोई आगे के लिए बस कल्पना मात्र नहीं कर रहा, यही हुआ है इतिहास में। जो-जो देश विकसित होते गए हैं, वहाँ-वहाँ शहरों से, सड़कों पर से कुत्ते हटते गए हैं।
कुत्ते बचेंगे, पर ये जो स्ट्रीट डॉग्स एक तरह की जो लाइफ़स्टाइल है, वो ख़त्म हो जाती है। कुत्ते बचते हैं, कहाँ बचते हैं? बहुत सारे बचते हैं, लाखों की तादाद में रहते हैं पर घरों के अंदर रहते हैं, सम्मान के साथ रहते हैं, केयर के साथ रहते हैं। उनकी देखभाल की जाती है, उनको खाना-पीना दिया जाता है, उनकी जिम्मेदारी उठाई जाती है। तो आज बस एक यही तरीक़ा है कि कुत्तों को बचाया जा सके।
रही बात अभी जो सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है — मैं समझता हूँ कि जो तरीक़ा नीदरलैंड्स ने और कुछ अन्य यूरोपियन देशों ने अपनाया, वो बेहतर तरीक़ा है। वो तरीक़ा ये है कि भाई, आप वैक्सिनेशन करिए, स्टेरिलाइज़ेशन करिए और उनको उनकी जगहों पर वापस छोड़ दीजिए। कुत्ते कोई 50 साल, 100 साल तो जीते हैं नहीं। क्यों उनको दुख दे रहे हैं, उनकी जगहों से उठा के पता नहीं कहाँ ले जाएँगे, कहाँ छोड़ देंगे! उनको वापस छोड़ दीजिए। जितनी उनकी जीवन-अवधि है, वो जी लेंगे। उसके बाद वो ख़ुद ही चले जाएँगे। और अब आपने उनको अगर स्टेरिलाइज़ वग़ैरह कर दिया है, तो वो संताने तो पैदा करेंगे नहीं। धीरे-धीरे उस क्षेत्र से कुत्तों की आबादी ख़ुद ही कम हो जाएगी।
आप ये कह भी लो कि आप कुत्तों को हटा दोगे किसी जगह से, तो भी वैक्यूम इफेक्ट होता है। आपने एक जगह से कुत्ते हटा दिए, उसके बगल की जगह से तो हटाए नहीं। तो बगल की जगह के कुत्ते आ जाएँगे उस जगह पर खाली देख कर के। क्योंकि कुत्ते बड़े टेरिटोरियल होते हैं, वो अपनी जगह बाँध कर रखते हैं। और जब वो जगह खाली हो जाएगी, तो दूसरी जगह के कुत्ते आ जाएँगे खाने की तलाश में। तो आप कुत्तों को हटा भी दें, तो इस समस्या का समाधान होना तो है नहीं। समस्या का ज़्यादा अच्छा समाधान वो है, जो यूरोप ने किया है। वो कई बेहतर समाधान है।
बात पूरी नहीं होगी अगर इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा छोड़ दिया जाए और वो बड़ा हिस्सा ये है, कि बड़ा अच्छा लगता है जब इंसान अपनी प्रजाति के अलावा किसी और प्रजाति के प्रति संवेदना व्यक्त करता है। बड़ा अच्छा लग रहा है, कि इतने सारे पशु-प्रेमी हैं और सड़कों पर भी आ गए हैं। ख़बरें आ रही हैं, कि पुलिस से और वकीलों से सड़कों पर भी भिड़ंत हो रही है, ये सब चल रहा है। एक तरीक़े से ये बात राहत की है, सुखद है। इससे मानवता के ज़िंदा होने का सबूत मिलता है कि हम अपने क्षुद्र स्वार्थों को छोड़कर दूसरी प्रजातियों का भी ख़याल रख लेते हैं, ये अच्छी बात है।
लेकिन इसमें कमी क्या है, वो कहना भी बहुत ज़रूरी है। कमी ये है कि कुत्ते तो करोड़ों में हैं। सिर्फ़ एक प्रजाति के प्रति ही इतना प्रेम, इतनी संवेदना क्यों? अगर हम में सचमुच प्यार है, और बहुत अच्छी बात है कि प्यार है — वो प्यार और प्रजातियों को हम क्यों नहीं दिखा रहे हैं? भारत में ही हज़ारों प्रजातियाँ हैं, जो क्रिटिकली एन्डेन्जर्ड, एन्डेन्जर्ड और वल्नरेबल हैं। वो विलुप्ति की कगार पर हैं, वो कभी देखने को नहीं मिलेंगी। पर हम उनकी बात ही नहीं करना चाहते।
कुल जो कुछ डोमेस्टिकेटेड स्पीशीज़ हैं — कुत्ता, बिल्ली, बकरा, गाय, भैंस, दुनिया बस इनकी ही बात करती है। विदेशों में भेड़ और सूअर भी शामिल कर लेंगे। बस इनकी ही बात होती है। और दुनिया भर में जो बायोमास है, यही जो मनुष्य द्वारा पाली गई प्रजातियाँ हैं, इनका 96% है कुल का। जो टोटल एनिमल बायोमास है, उसका 96% मनुष्य द्वारा पाली गई प्रजातियों का है क्योंकि मनुष्य के काम आती हैं। तो इनको तो हमने बढ़ा दिया, हम इनकी परवाह भी करते हैं, इनकी सुरक्षा भी करते हैं। लेकिन जो बाक़ी प्रजातियाँ हैं, वो करोड़ों में हैं। हम उनकी बात भी नहीं करना चाहते, हमने उनको लगभग पूरा समाप्त कर डाला है।
जंगलों में अगर सिर्फ़ गिनती करें कि कितने पशु होते थे, तो पिछले 50 साल में जंगलों के 70 फ़ीसदी पशु-पक्षी हमने मार डाले हैं दुनिया भर में। उनके प्रति हम कोई बात क्यों नहीं करना चाहते?
और जब हम उनकी बात करें, तो सबसे बड़ा मुद्दा फिर आएगा — जलवायु परिवर्तन। क्लाइमेट चेंज, जिसमें जंगलों का कटना भी शामिल है, वो पशुओं के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। तो ये बात मुझे थोड़ी विचित्र-सी लगती है कि हम अपने आप को पशु-प्रेमी बोलते हैं, पर दूसरी प्रजातियों की बात नहीं करते और क्लाइमेट चेंज की बात नहीं करते। ये बात हमको बहुत अजीब लगती है कि आप एक ओर तो अपने आप को कह रहे हो कि मैं पशु-प्रेमी हूँ और दूसरी ओर आप दूसरी प्रजातियों की बात क्यों नहीं कर रहे?
आप पशु-प्रेमी हैं, इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता। लेकिन आप दूसरी प्रजातियों की बात नहीं कर रहे, ये बात समझ में नहीं आती। आप जिस एक प्रजाति की बात कर रहे हैं, वो बड़ी प्यारी प्रजाति है। कुत्तों से हम सबको लगाव रहता है। लेकिन वो प्रजाति कहीं से भी विलुप्ति की कगार पर नहीं खड़ी है, बल्कि वो तो बहुत फलने-फूलने वाली प्रजाति है, क्योंकि मनुष्यों के साथ रही है।
और वो प्रजातियाँ जो हमें अब कभी देखने को भी नहीं मिलेंगी, इस बात की भयावहता को समझिए कृपया। इतनी ही प्रजातियाँ हैं, जो कभी देखने को नहीं मिलेंगी। वो प्रजातियाँ साल में दो-चार नहीं विलुप्त हो रही हैं, ये प्रतिदिन विलुप्त हो रही हैं और मैनमेड रीज़न्स से विलुप्त हो रही हैं। हमारे कारण विलुप्त हो रही हैं — एक्सटिंक्ट फॉरएवर, नेवर टू बी सीन अगेन, एंड नेवर टू रिटर्न। हम कर रहे हैं। हम उनकी क्यों नहीं बात कर रहे हैं? तो उनकी बात भी करनी बहुत-बहुत ज़रूरी है और तभी हमारे पशु-प्रेम में किसी प्रकार की सार्थकता होगी।
प्रश्नकर्ता: सर हमने जैसे बात की थी कुत्तों की — स्ट्रे डॉग्स की पर अपनी कंट्री, डेवलप कंट्री, सिर्फ़ भारत की ओर हम जा रहे तो आपको क्या लगता है, ऐसे इशूज़ बढ़ते रहेंगे, तो सरकार की इसके ऊपर क्या ज़िम्मेदारियाँ होनी चाहिए? सरकार को क्या स्टेप्स उठाना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देखिए, संविधान तक ये कहता है कि जो भारत का पशुधन है, जो हमारी पशु-राशि है, उसकी रक्षा होनी चाहिए।
तो सरकार का निस्संदेह कर्तव्य है कि कम से कम वो पशु जो हमारे साथ रहते हैं, उनकी सुरक्षा के लिए, उनकी दवाई के लिए और उनके खाने-पीने के लिए कुछ प्रबंध करे। बिल्कुल वहाँ पर सरकार का कर्तव्य आता है। तो एनिमल शेल्टर्स बनने चाहिए। जैसे अभी शेल्टर्स की बात हो रही है, वो शेल्टर कोई प्राइवेट पार्टी तो क्या ही बनवाएगी, वो सरकार का काम है और उसके लिए बजट भी होता है। तो वो बजट कैसे ख़र्च किया जा रहा है, ये सब देखना सरकार का काम है।
लेकिन मैं समझता हूँ, कि सरकार का ज़्यादा बड़ा जो कर्तव्य है इस वक़्त, वो उन प्रजातियों के प्रति है जो गुमनाम हैं, जिनका कोई चेहरा नहीं है और जो चुपचाप मिटती जा रही हैं।
भविष्य हमसे ये सवाल करेगा, कि जब क्लाइमेट चेंज हो रहा था और सैकड़ों की तादाद में प्रजातियाँ प्रतिदिन विलुप्त हो रही थीं, तब आप क्या कर रहे थे?
सरकार का सबसे बड़ा काम इस वक़्त होना चाहिए सही क्लाइमेट एक्शन और एन्वायरनमेंटल प्रोटेक्शन। और वो चीज़ जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) को कहीं से कम नहीं करेगी। बल्कि बात उलटी है कि क्लाइमेट क्राइसिस जीडीपी का बहुत बड़ा हिस्सा छीन ले जाती है। तो हम ये भी नहीं कह सकते कि विकास और पर्यावरण के प्रति निष्ठा ये दोनों विपरीत दिशाएँ हैं। नहीं, बिल्कुल भी नहीं। वास्तविक विकास पर्यावरण की परवाह करके ही हो सकता है।
और पर्यावरण का ही तो मतलब होता है पशु-पक्षी। जो पर्यावरण को बचा रहा है, जो अपने जंगलों को बचा रहा है, वही पशु-पक्षियों को बचा रहा है। तो अगर आप प्रश्न करेंगे कि पशुओं के प्रति सरकार का क्या कर्तव्य है, तो मैं कहूँगा—जो कर्तव्य सरकार का पर्यावरण के प्रति है, जो कर्तव्य सरकार का इस वक़्त क्लाइमेट क्राइसिस का सामना करने के प्रति है।
कार्बन फुटप्रिंट सब पदार्थों पर, सब पैकेज्ड प्रोडक्ट्स पर साफ़-साफ़ लिखा होना चाहिए। ग्रीन टैक्स की इस वक़्त भारत को बहुत सख्त ज़रूरत है। और ऐसे एरियाज़ चाहे वो एनर्जी प्रोडक्शन के हों, चाहे एनर्जी यूटिलाइज़ेशन के हों, जो ग्रीन हैं, उनको सब्सिडी की ज़रूरत है।
मांस हम जानते हैं, उदाहरण के लिए जब भी क्लाइमेट चेंज की बात आती है, तो हम बस सोचते हैं कि फॉसिल फ्यूल्स, ट्रांसपोर्ट, एनर्जी, हम इन्हीं सेक्टर्स की बात सोचते हैं। लेकिन जो दूसरा सबसे बड़ा कारण है, वो तो है एनिमल फार्म्स, एनिमल एग्रीकल्चर, मांसाहार तो उस पर भी ड्यू टैक्सेशन होना चाहिए।
नैतिक कारण वग़ैरह कुछ नहीं, सीधे-सीधे व्यावहारिक,फैक्चुअल कारण कि आप जो काम कर रहे हैं, चाहे वो आप डीज़ल जला कर कर रहे हों, चाहे वो आप जानवरों को मार कर और जानवरों को खाकर के कर रहे हों, उसका एक बहुत बड़ा कार्बन फुटप्रिंट है। और उस कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए जो पैसा लगेगा, वो पैसा आप ही तो देंगे न, क्योंकि आपने कंज़म्प्शन किया है इस तरीक़े से कि उसमें से इतना कार्बन रिलीज़ हो रहा है। तो अब उस कार्बन को वापस सोखने के लिए जो पैसा लगेगा, वो आप ही तो देंगे।
तो ग्रीन टैक्स दुनिया के कई देशों में पहले से लगा हुआ है और भारत को भी उसकी बहुत सख्त ज़रूरत है। और सरकार को यह समझना पड़ेगा कि डेवलपमेंट और एन्वायरनमेंट ये दोनों विपरीत चीज़ें नहीं हैं। और अगर एन्वायरनमेंट का नाश करके ही डेवलपमेंट हो, तो वो डेवलपमेंट फिर कोई सार्थक विकास नहीं कहा जा सकता।
तो बस यही बातें हैं, इन दोनों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। ये दोनों साथ हैं बिल्कुल — पर्यावरण और विकास।