
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
























तुम्हारे जीवन में कुछ भी सहज नहीं है। रिश्ता भी सहज नहीं बनता। तुम रिश्ता भी सोचकर बनाते हो। जिस रिश्ते में आज़ादी नहीं है उसमें प्यार कहाँ से आ जाएगा! जैसे ही तुम रिश्ते को नाम देते हो, तुमने एक परिभाषा दे दी और परिभाषा का मतलब होता है बंधन।



क़ुर्बानी तो वास्तव में सिर्फ़ अहंकार की ही दी जा सकती है। और बोधयुक्त व्यक्ति अच्छे से जानता है कि ख़ुशी तो एक ही होती है — परम ख़ुशी, आनंद। पर हम जब कहते हैं कि दूसरे की ख़ुशी के लिए अपने आप को क़ुर्बान कर दिया है, तो क्या यह वास्तव में उनके आनंद के लिए है हमारी कुर्बानी? या उनके क्षणिक उन्माद के लिए? उनकी मुक्ति के लिए है या उनके भयों की रक्षा के लिए?






प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुदेव। चरण स्पर्श। मुझे प्रश्न नहीं करना है एक अनुरोध है कि आपके पिछले शिविर से जो कुछ सीखा उससे कामवासना में निम्नता आई, जिससे पत्नी की ओर से खिन्नता हमको समझ में आई। पत्नी से सत्र से जुड़ने का अनुरोध भी किया। आरम्भ में वो तैयार नहीं


प्रश्नकर्ता: एक जानकार हैं, स्कूल टीचर हैं। तो आपसे इस तरीक़े से वार्तालाप होगी, मैंने उनको बताया था तो मैंने कहा कुछ परेशानी है? बताऍं। तो उन्होंने कहा— मैं स्कूल टीचर हूँ और स्कूल टीचर से कोई शादी नहीं करना चाहता। मेरी शादी कब होगी? क्षमा चाहती हूँ उनके सवाल

प्रश्नकर्ता: जो आपने प्रेम के बारे में मैंने आपके वीडियोज़ भी देखे, थोड़ा समझने की कोशिश करी तो ये समझ में आया कि हम कई बार व्यापार बहुत सारा कर रहे होते हैं, उनको प्रेम का नाम देते हैं। लेकिन जीवन में जो सम्बन्ध हैं, जैसे कोई भी सम्बन्ध है,



प्रश्नकर्ता: भगवानश्री प्रणाम, आपके सान्निध्य में रहकर ये तो दिख गया कि मिलकर भी कुछ मिलता नहीं, ये समझ गहरी हुई। लेकिन जो दौड़ दौड़ी, चालीस साल के हैं तो बीस-पच्चीस साल, तीस साल दौड़ दौड़ी है उसका एक बल है। अपने को समझाकर जब जिनके साथ दौड़े थे उनको…


प्रश्नकर्ता: सबसे पहले आपको और इस संस्था से जुड़े सभी वॉलन्टियर्स (स्वयंसेवकों) को कोटि-कोटि नमन, हम सभी के जीवन में एक अलग अलख जगाने के लिए। मैं पिछले दो वर्षों से आपको सुन रहा हूँ, जिसकी वजह से अन्दर से एक अलग आवाज़ आती है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। थोड़ा-सा पहली बार आया हूँ तो थोड़ा-सा बता दूँ कि कैसे आप तक पहुँचा। बहुत ज़ोर से भाग रहा था,


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी जैसा आपने बताया कि आप एक वुमन (महिला) होने से पहले एक कॉन्शियसनेस (चेतना) हैं, तो ये बात मेरे दिमाग में बैठ गयी है। मेरे मन में बहुत शुरू से ही चीज़ें आती थीं कि घर में खाना हम ही क्यों बनायें हमारे

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पाँच साल का रिश्ता था, शादी होने वाली थी। कुछ वजहों से कि उसका रुझान अध्यात्म में नहीं है, झूठ बोलती है चीज़ों को लेकर ताकि हमारा रिश्ता बना रहे; इन चीज़ों ने बहुत ज़्यादा मुझे ठेस पहुँचाई। अब मैं उस बिन्दु पर खड़ा हूँ कि

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न महिलाओं से सम्बन्धित है, रेप (बलात्कार) से सम्बन्धित। तो अभी जैसे ये कानून में बदलाव हुआ है कि लड़कियों की उम्र अठारह से इक्कीस कर दी है शादी की। तो इसमें काफ़ी नेता और समाज के लोग भी ये कह रहे हैं कि इससे

आचार्य प्रशांत: जाओ किसी भी आम लड़के से पूछ लो वह किसलिए विवाह करता है। सम्मानजनक काम करने के लिए तो वह विवाह करता नहीं। वह काम सारे ऐसे ही करता है जो अगर वह विवाह के बिना कर दे तो तुम कहोगे — जलील, लुच्चे, लफंगे गायब हो जा

एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि दोस्त ऐसे हों, पति ऐसा हो, जीवन ऐसा हो। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं। हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है, संस्कारों का आदेश है। इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है, वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है।
लड़का–लड़की का मिलन तो बहुत साधारण–सी बात होनी चाहिए; कुछ उसमें इतना विशेष नहीं कि उसका हव्वा बनाया जाए। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है। हमारी परंपरा ने बीच में पर्दे डाल–डाल कर दोनों को इतना दूर कर दिया कि दोनों ने एक–दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। इंसान को इंसान की तरह देखो। ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं, ये तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।
पर तुमने अगर मेरे साथ थोड़ा सुना है, पढ़ा है, अध्यात्म, उपनिषद्, गीता थोड़ा तुम्हारे भीतर उतरी है, तो मनुष्य क्या है? मनुष्य की पहचान क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति क्या है? और किस तरीक़े से वो हमें संचालित करती है, ये सब समझ में आया होगा। तो फिर समझ पाओगे कि मैं तुम्हें क्या कह रहा हूँ। कुछ विशेष नहीं है बेटा यहाँ पर। क्या विशेष हो जाना है, बताओ न क्या विशेष हो जाना है?
जीवन सही जियो, तो रिश्ते भी फिर सही बनाओगी। सही लोगों को ही अपनी ज़िंदगी में प्रवेश दोगी। गलत ज़िंदगी जीने के कई दुष्परिणाम होते हैं। उनमें से एक ये होता है कि तुम्हें सब गलत ही लोग मिलेंगे। अभी दिक़्क़त ये होती है कि खेल तो होता है सारा जिस्मानी, लेकिन तुमने अपने आप को ये समझा रखा होता है कि बात भावनाओं की है। तो फिर जब रिश्ता टूटता है जिस्मानी, तो तुमको ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी भावनाओं पर चोट हुई है। अरे, बात भावनाओं की कभी थी ही नहीं। क्यों व्यर्थ में भावनाओं को इसमें बीच में ला रहे हो।
पत्नी, बहू घर आई है तो खाना बनाएगी, बर्तन धोएगी, कपड़े साफ़ करेगी, बच्चे पैदा करेगी। इसमें पवित्रता क्या है? क्या बताते हो कि शादी का पवित्र बंधन, अगर यही सब है, तो पवित्र क्या है इसमें फिर? पवित्रता चीज़ क्या होती है; ये जानना है तो ऋषियों के पास जाओ, उपनिषदों के पास जाओ। वो बताएँगे कि पवित्र माने क्या। “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान ही है जो पवित्र करता है। ज्ञान है पवित्र। ये थोड़ी है कि बर्तन माँजना पवित्र हो गया।
एक सिद्धांत है। एक सिद्धांत क्या है? कि भाई, गाड़ी में जब पाँच-एक लीटर या दो लीटर ही फ्यूल बचे, तो गाड़ी आवाज़ कर देगी, वो सिद्धांत की बात है। आप गाड़ी को इसके लिए दोष थोड़े ही दे सकते हो। तथ्य ये है कि फ्यूल सचमुच कम है, तथ्य ये है कि आप बैठे हो या कोई भी बैठा हो गाड़ी यही कहेगी, कि “लो फ्यूल, लो फ्यूल।” गाड़ी कोई अपनी बात आपसे थोड़ी कह रही है। बात समझिए। और न गाड़ी की आपसे कोई व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी है, एक सिद्धांत है।
किसी भी सफल विवाह में सीमाएँ होंगी, और अगर आप उन सीमाओं का सम्मान करना नहीं जानते तो वह टूट जाएगा। कोई व्यक्ति आपके जीवन का केंद्र बन जाए, यह प्यार नहीं है। दो इंसानों के बीच एकमात्र सच्चा संबंध जो हो सकता है, वह है दोस्ती। एक-दूसरे के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताइए और फिर एक-दूसरे को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र छोड़ दीजिए।
रिश्ते फिर से याद रखिए, आपको अपने बंधन दिख रहे हैं तो उससे रिश्ता बनाइए, जो आपको चुनौती देता हो, आपके सामने आईने की तरह खड़ा होता हो, आपको आपकी बेड़ियाँ दिखा देता हो कि देखो अपने गले को, इसमें बेड़ियाँ ही बेड़ियाँ हैं। आपको अपने बंधन दिख रहे हों तो उससे रिश्ता बनाइए जो आपकी आज़ादी में सहायक हो। और आपको अगर दूसरे के बंधन दिख रहे हैं तो उसके सामने आईना बन के खड़े हो जाइए। यही राइट रिलेशनशिप है। इसके अलावा कुछ नहीं होती।
रिश्ते प्राथमिक नहीं होते, इंसान प्राथमिक होता है। जो अपने लिए ही अच्छा नहीं, वो किसी और के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता, भले ही वह कितनी भी कसमें-वादे कर ले। अच्छा रिश्ता सस्ती चीज़ नहीं है, वो उन्हीं को मिलता है, जिन्होंने पहले ख़ुद पर मेहनत की हो। जिसमें अपने अंधेरे और भीतर की पशुता का सामना करने का साहस है, वही ख़ुद और दूसरों के साथ स्वस्थ रिश्ता बना सकता है।
शुरुआत इसकी होती है — उस शिक्षा व्यवस्था से, उस परवरिश से, जिसमें हमें संबंध का मतलब ही नहीं बताया जाता। बस यह बता दिया जाता है कि जल्दी से जवान होते ही लड़की की शादी कर देनी है। आप दो लोगों को एक तरह से मजबूर कर रहे हो कि एक साथ रहो, जबकि वे एक-दूसरे को जानते-समझते नहीं। दिलों को मिलने दो। दो लोग यदि अपनी मर्ज़ी से, अपने अनुभव के आधार पर ज़िन्दगी को देख-समझ कर संबंध बनाएँगे, तो कुछ अलग बात होगी।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक बेटे या बेटी का माँ-बाप के प्रति क्या ऋण होता है? मेरे पिता भ्रष्ट व्यक्ति हैं, मुझे पसंद नहीं हैं। लेकिन बार-बार यह ऋण चुकाने वाली बात मन पर हावी हो जाती है। कुछ कहें!
आचार्य प्रशांत: संतान का और माँ-बाप का रिश्ता दो तलों पर…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। मेरा विवाह हुआ, उसके बाद दो बच्चे हुए हमें। पत्नी मेरी गृहणी हैं। और एक बेटा है पहले, फिर उसके बाद बेटी हुई। परन्तु कुछ मेडिकल कंडीशन (चिकित्सा स्थिति) के कारण उसकी मृत्यु हो गई थी। अभी एक लड़का ही है साढ़े तीन साल का। तो अब…
प्रेम में साथ रह भी सकते हो, और नहीं भी। मूल मुद्दा रिश्ते के स्वास्थ्य का है। जिस रिश्ते में प्रेम नहीं होता, वहाँ दूरी बनते ही घबराहट होती है। भीतर असुरक्षा चिल्लाती है — “नज़रों के सामने नहीं है, दूर चला गया, लौटेगा या नहीं, न जाने क्या कर रहा होगा, कहीं हमें भूल न जाए।” लेकिन रिश्ता अगर बढ़िया है, तो वह एक विश्वास देता है कि दूरी बनाई जा सकती है और नुक़सान भी नहीं होगा। इसलिए, न साथ रहना ज़रूरी होता है, न दूर जाना — बस प्रेम ज़रूरी होता है। प्रेम है, तो सब सही है।
मोह और वासना में आदमी अंधा हो जाता है। अगर किसी रिश्ते में आपको दुख मिल रहा है, तो इसका मतलब है कि उसे चुनने में गलती आपकी ही थी। दूसरे को दोष देने से पहले ये स्वीकार करना ज़रूरी है कि चूक आपकी ही हुई है। जब आप अपनी गलती मान लेते हैं, तो सामने वाले के प्रति जो गुस्सा और नफरत होती है, वो कुछ कम हो जाती है, और हो सकता है कि उसके प्रति आपके मन में थोड़ी करुणा भी जाग जाए।
कोई फँसा नहीं होता है गलत रिश्ते में, उस रिश्ते में उसका कुछ-न-कुछ स्वार्थ अटका होता है। अगर आपको दिखने लगे कि आपकी ज़िंदगी की क्या कीमत है, तो जहाँ फँसे हुए हैं, उस जगह को छोड़ना आपके लिए बहुत आसान हो जाएगा, क्योंकि न छोड़कर कितना नुकसान हो रहा है, बस यह नहीं देख पाते। आज़ादी बहुत बड़ी चीज़ है; अगर गुलामी में कुछ फायदा हो भी रहा हो, तो भूलना नहीं कि आज़ादी बेशकीमती होती है। फिर गुलामी छोड़ना आसान हो जाएगा।
हिंदुस्तान में असंभव है कि एक किशोर बेटा अपने बाप से अपने हृदय की बात कहे। हमारी परंपरा में बेटा बाप के चरण स्पर्श कर सकता है, पर गले नहीं लगा सकता। जिसके साथ चीज़ सेट हो गई, चाहे वह बाप-बेटे का रिश्ता हो या पति-पत्नी का, वहाँ फिर किसी तरह की कोई जिज्ञासा, कोई आत्मीयता नहीं रह जाती। ऐसे रिश्ते बनाना चाहते हो जहाँ दूसरे के लिए प्राण भी दे सको, तो मित्रता कर लो। रिश्ता तो वही चलेगा जिसमें नाम से ज़्यादा दोस्ती है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परिवार और कर्तव्यों के कारण मैं सत्य की तरफ़ एक मन से नहीं बढ़ पा रही। कृपया इस बात का झूठ देखने में मेरी मदद करिए।
आचार्य प्रशांत: ये लड़का (सामने बैठा श्रोता) एक सौ बीस किलो का है, यही…
अध्यात्म का अर्थ यह नहीं है कि रिश्ते तोड़ देने हैं। अध्यात्म का अर्थ है— घटिया रिश्ते को सुंदर बनाना है। बीमारी अगर जाती है तो 'स्वास्थ्य' प्रकट भी तो होता है। इसी तरीके से रिश्तों में, जब बंधन कटते हैं तो स्वस्थ संबंध प्रकट होता है। अध्यात्म सबकी मुक्ति के लिए है। इसलिए स्वयं मुक्त होते चलो और जिनसे संबंधित हो, उन सब के भी मुक्ति में सहायक बनो।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैं अपने मित्रों को अध्यात्म के बारे में बताती हूँ तो उनमें से कुछ इसमें रुचि नहीं लेते। वे कहते हैं, ‘उनके जीवन में दूसरी चीज़ें महत्वपूर्ण हैं।‘ हालाँकि इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, चूँकि मैं समझती हूँ कि सत्संग मुझे मुक्ति की ओर…
आपको कैसे पता कि वो लड़का बुरा है कि गलत है? हो सकता है गलत हो, पर क्या आपको अपनी ज़िंदगी में सदा पता रहा है कि क्या अच्छा है? क्या बुरा? जब आपको नहीं पता क्या अच्छा है, क्या बुरा तो आपको कैसे पता कि उस लड़की ने जिसको चुना है बहुत बुरा है? क्या अच्छे-बुरे की आपकी पहचान, ठोस है बिल्कुल? वो लड़की भी उतनी ही गलत है, जितने गलत आप हो। और जैसे आप ठीक हो सकते हो, बिल्कुल वही विधि है, उस लड़की को भी ठीक करने की। दोनों को अपने आप से एक बार ये पूछना पड़ेगा कि ये जो हम कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं? भीतर कौन सी चीज़ है जो हमसे ये काम करवा रही है?
कोई आप पर तभी छा सकता है, जब आपने उसे इजाज़त दी हो। कोई चिल्ला सकता है, हाथ उठा सकता है, क्योंकि आपने उसे अधिकार दिया है। और अधिकार उसने बदले में आपको कोई लाभ देकर खरीदा है। तन कर खड़ा होना है तो दूसरों से स्वार्थ का रिश्ता कम करें। ज़रूरतें घटाएँ, निर्भरता घटाएँ। जितना हो सके, दुनिया को दीजिए। बाँटते चलिए, बटोरते नहीं।
बिल्कुल यह ज़रूरी है कि लड़के ऐसे हों जो लड़की को सिर्फ़ शरीर की तरह न देखें। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि लड़कियों के पास पूँजी के तौर पर देह से आगे भी कुछ हो। ज़्यादातर लड़कियाँ पितृसत्तात्मक समाज के कारण ऐसी बन जाती हैं कि रिश्ते में शरीर के सिवा कुछ और नहीं होता। इसलिए, अगर आप चाहती हैं कि अच्छे लड़के मिलें, तो वैसे गुण विकसित करिए जो अच्छे लोगों की अच्छाई से रिलेट कर सकें और उनके अस्तित्व के सही बिंदु से संबंध बना सकें।
जीवन का अर्थ ही है संबंध, हो ही नहीं सकता कि आप संबंधित हो ही न। आप दूसरे व्यक्ति से जो संबंध बनाते हो न, वो संबंध अनुचित होता है, हमें वो संबंध छोड़ना होता है। संबंध खंडहर हो गया है, उस संबंध से बाहर आना है। व्यक्ति को क्या छोड़ोगे आप, व्यक्ति को आपने पकड़ कब रखा था; पकड़ का नाम तो रिश्ता होता है।
जो स्वतंत्र होता है, वो परेशान नहीं करता। सास-बहू का झगड़ा इसीलिए होता है क्योंकि हम उन्हें आश्रित, दुर्बल और मजबूर बना देते हैं। अन्यथा न सास को बहू से लड़ने का शौक है, न बहू को सास से। ये उनकी पराधीनता और बेबसी का सूचक है। इसलिए उन्हें सशक्त बनाओ और उन्हें जीवन में कुछ ऐसा सार्थक दो, जो लड़ाई-झगड़े से ज्यादा आकर्षक हो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी प्रेम प्रसंग की आप बात कर रहे थे तो मेरे कुछ मित्र हैं, मेरे एक मित्र हैं पर्टिकुलर, तो हर टाइम क्या रहता है कि कोई रिलेशनशिप में जब एंटर करतें है, तो काफ़ी उम्मीद के साथ एंटर करते हैं रिलेशनशिप में कि काफ़ी कुछ…
प्रश्नकर्ता: गर्लफ्रेंड के साथ सम्बन्धों में क्या आगे की योजना बनानी चाहिए? या अनप्लान्ड, स्पोन्टेनियस (अनियोजित, बिना किसी पूर्वाग्रह के) रहना चाहिए और अगर आपका साथी भविष्य की प्लानिंग की बात करे तो आपको क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: बेटा, जैसा साथी होगा वैसी तो वो बात करेगा ही न,…
"प्रेम प्रेम सब कहैं, प्रेम न चीन्है कोय। जा मारग साहब मिलै, प्रेम कहावै सोय।" या जा मारग डायपर मिले प्रेम कहावै सोय? जिस मार्ग पर चलकर साहब से मुलाकात हो जाए, उस मार्ग का नाम है प्रेम (आकाश की ओर इशारा करते हुए) । या प्रेम उस मार्ग का नाम है जो *मैटरनिटी* (प्रसूति) वार्ड की ओर जाता है?
अगर तुम्हें प्रेम है, तो क्या तुम तय करके किसी से दूर हो सकते हो? यह तो ह्रदय की बात होती है। क्या तुम तय कर सकते हो कि कल से इससे बात नहीं करनी? क्या तुम साँस लेना छोड़ सकते हो तय करके? हमारे रिश्ते नफ़ा-नुक़सान के आधार पर होते हैं, तभी तो हम तय करके उन्हें तोड़ते हैं। जो तय करके टूटी दोस्ती है, वह तय करके हुई भी होगी। और तय करके जो कुछ भी होता है, वह स्वार्थ के कारण ही होता है!
पत्नी है तुम्हारी, २८ साल की हमसफर है। अच्छा ही लगेगा उसे, अगर तुममें प्रगति देखेगी, तुममें गहराई देखेगी, तुममें शीतलता देखेगी, तुम्हारे ध्यान को पाएगी कि और मजबूत हो रहा है। तुम्हारे प्रेम को पाएगी कि और मीठा हो रहा है। अच्छा ही लगेगा उसे।
अगर कामवासना मनुष्यों में मात्र प्राकृतिक होती तो सीमित होती, जैसे कि सब प्रजातियों में होती है, पर असीमित वासना है | इतनी विक्षिप्त वासना मन से आ रही है। मन को चाहिए आध्यात्मिक शान्ति, जिसकी तलाश मनुष्य विपरीत लिंगी में करता है| सबको परम चाहिए, जो आख़िरी है सबको वो चाहिए। आप पहले समझो कि आप कौन हो और आपको क्या चाहिए।
‘आइ लव यू' कहने के लिए पहले ‘आइ’ को जानना होगा | तुम ठीक हो जाओ उसके बाद सामने वाले के दस चेहरे तुम्हारे लिए समस्या नहीं रह जाऍंगे। अभी तुम्हें उसके दस चहरों से इसलिए समस्या हो रही है क्योंकि तुम्हारे भी अपने दस चेहरे हैं। ‘आइ’ की, ‘मैं’ की, ‘अहम्’ की, अपनी बात हम नहीं करना चाहते। |‘यू’ ऐसे है, ‘यू’ ऐसे है, प्रेम ऐसा है। अरे वो ‘यू’ तो बहुत-बहुत बाद में आता है, शुरुआत किससे होती है? ‘आइ’ से। इस ‘आइ’ को ठीक करो पहले।
प्रश्नकर्ता: एक व्यक्तिगत स्थिति है। जिन्होंने पूछा उनका नाम नहीं लूँगा। कह रहीं हैं- मैं २८ साल की हूँ और शादी को दो साल हुए हैं। पति बहुत प्यार करते हैं हमारी लव मैरेज हुई थी। सालभर पहले तक राहुल (पति का नाम) बड़े एक्साइटेबल माने चंचल, जल्दी उत्तेजित हो…
प्रश्नकर्ता: बचपन से ही घर में इन्हें शिक्षा ये दी गयी है कि अच्छे बनकर रहो और सबके साथ अच्छाई करो। बत्तीस वर्ष उम्र के इतने सालों में अपनी समझ से अच्छाई ही अच्छाई करी है। और नतीज़ा इनको हमेशा बुरा मिला है। जिनके लिए भी अच्छा करा, उनसे बदले…
प्रश्नकर्ता: मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन की छात्रा हूँ। मैं ग्यारह साल से प्रेम में हूँ। मेरे साथी हमेशा स्पेस देते हैं। वह भी सत्य के खोजी है। मैं उसे कभी मना नहीं करती मगर जब कभी बिना बताए शिविरों में आ जाता है तो मैं उसको बहुत तकलीफ़ देने लगती हूँ, जैसे…
आचार्य प्रशांत: आचार्य विनोबा भावे के जीवन से एक घटना है। वो युवा ही थे अभी और जीवन का अर्थ खोजने की कोशिश कर रहे थे। तो कहते हैं — यूँही एक दिन उन्होंने ट्रेन पकड़ ली और उत्तर भारत की ओर आ गये। हिमालय जाना चाहते थे, उससे पहले…
आचार्य जी, मेरा प्रश्न…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरी गर्लफ्रेंड (प्रेमिका) क्रिस्चियन (ईसाई) हैं, काफ़ी समय से मैं उसे आपसे मिलवाना चाहता हूँ पर असमर्थ हो रहा हूँ। मैं उसके साथ बाइबिल भी पढ़ता हूँ और समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि आपकी शिक्षाएँ हूबहू भगवान क्राइस्ट (ईसा मसीह) से मिलती हैं, पर…