जलवायु संकट पर बहस अक्सर नीतियों और तकनीक तक सिमट जाती है, पर दुनिया की आबादी, उत्पादन, कार्बन और तापमान के ग्राफ़ साथ रखें तो एक ही रेखा दिखती है। धरती को दो चीज़ें मार रही हैं: बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता उपभोग। दोनों एक ही वृत्ति से निकलते हैं, ख़ुद को न जानना और बाहर जाकर भोगना। जंगल घट रहे हैं, जीव-जंतु मिट रहे हैं। जब तक करने वाला नहीं बदलेगा, नीतियाँ कैसे बदलेंगी? क्या समाधान हमारे ही हाथ में है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
ह्यूमन पॉपुलेशन ग्रोथ, कंसन्ट्रेशन ऑफ़ एटमॉस्फ़ेरिक सी.ओ.2, ग्लोबल जी.डी.पी. ग्रोथ, ग्लोबल इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन और एटमॉस्फ़ेरिक टेम्परेचर राइज़। इनके graphs अगल-बगल रख के देखिएगा क्या पता चलता है।
सारे curves जब आप अगल-बगल रख के देखेंगे 1750 से लेकर के 2020 तक तो आपको क्या दिखाई देगा? ये सारे curves बिल्कुल एक हैं, एकदम एक हैं।
बात बहुत सीधी है। दो चीज़ें हैं जो मार रही हैं हमारे ग्रह को, हमारी प्रजाति को, सारी प्रजातियों को। पहला जनसंख्या और दूसरा कंज़म्पशन, पॉपुलेशन एंड कंज़म्पशन। इतना सीधा मामला है। बहुत ज़्यादा इसमें साइंस चाहिए भी नहीं है। हमारी स्पीशीज़ ने अपनी आबादी बढ़ा-बढ़ा के, बढ़ा-बढ़ा के और भोग-भोग के सब कुछ बर्बाद कर डाला।
ज़ाहिर सी बात है अगर कुछ समाधान अभी भी हो सकता है, जिस हद तक अब संभावना बची है। वरना एक बार फ़ीडबैक साइकिल सक्रिय हो गए तो बचने की संभावना कम होने लग जाती है। अगर कुछ संभावना अभी भी है बचने की तो वो यही है कि यही दोनों चीज़ें कम करो। क्या? आबादी और




