पिछले एक हज़ार साल में मानवता के सामने जलवायु परिवर्तन से बड़ी कोई समस्या नहीं आई है। दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा एक-दो प्रतिशत प्रिविलेज्ड आबादी करती है और इसी ने सबको नशे में डाल रखा है। सारा काम अमीरों ने किया है, और गरीब भुगत रहे हैं। यह मानव की उपभोग-प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न संकट है। ज़िंदगी की एक समझ चाहिए, जिसकी शिक्षा हमें नहीं दी जा रही। हम अपने आपको नहीं जानते और यही वजह है कि इंसान अब इस हालत में पहुँच गया है कि बचना बड़ा मुश्किल हो गया है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: गरीबों की जान बचाने के लिए हम अपने होटल्स थोड़ी बंद कर देंगे। गरीबों की जान बचाने के लिए हम जीडीपी ग्रोथ थोड़े ही दाँव पर लगा देंगे, जीडीपी बड़ी बात है। जीडीपी बहुत बड़ी बात है और किसी की जान जाती है, ख़ासकर अगर वो अशक्त है, दुर्बल है, तो क्या हो गया? जीडीपी बड़ी बात है।
डाटा के क्षेत्र में बड़ा नाम है — हन्ना रिची। उनकी किताब है और लेख वग़ैरह भी लिखती रहती हैं। उनके समर्थन में बिल गेट्स जैसे लोग हैं, वो बोलते रहते हैं काफ़ी। तो उनकी किताब अगर आप पढ़िए और बिल गेट्स, एलन मस्क और इस तरह के और भी जो लोग हैं, उनकी बातों पर ध्यान दीजिए। वैसे कहते हैं न, रीडिंग बिटवीन द लाइन्स, थोड़ा-सा समझिए कि कहना क्या चाह रहे हैं। वो कह रहे हैं, ये ग्रह तो हमारे उपभोग के लिए था, हमारे उपभोग से अगर ये बर्बाद होता है तो हो, हम अपने लिए सुरक्षित आश्रय तैयार कर लेंगे, चाहे इसी प्लैनेट पर, चाहे किसी और प्लैनेट पर जाकर के।
बाक़ी मर रहे हैं, वो इसलिए मर रहे हैं बिकॉज़ दे आर नॉट फिट इनफ़ टू सर्वाइव। ये इनका रुख़ है। ये कह रहे हैं, "साहब, हमारे पास पूँजी भी है, हमारे पास




