
किसी प्रदेश की समृद्धि केवल प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों की चेतना, शिक्षा और विवेक से तय होती है। खनिज स्वयं विकास नहीं लाते; यदि समाज जागरूक न हो तो वही संसाधन शोषण और भ्रष्टाचार का कारण बन जाते हैं। सच्ची संपदा धरती के नीचे नहीं, मनुष्य के मस्तिष्क में होती है। विद्या और आत्मज्ञान ही किसी राज्य या राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में समृद्ध और स्वतंत्र बनाते हैं।




Acharya Prashant: Man is both Prakriti and something else. Prakriti is y=sin(x). You are confined within duality- ups and downs, ups and downs, leading to nothing. The up will not remain up, forever; the down will not remain down, forever. Crests and troughs, crests and troughs; that is


प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। सर, दुनिया में दो तरह के सिद्धांत चलते हैं — एक ये कि जवान लोग कहते हैं कि खाओ-पियो बिंदास जियो, और दूसरी ये कि बुज़ुर्ग या दार्शनिक लोग कहते हैं कि जीवन क्या है इसको समझो, अपना पुरुषार्थ दिखाओ, अपनेआप को जानो, इस तरह की बातें।


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं तेईस वर्षीय हूँ। मेरा नाम शैलेश है। मेरा सवाल एज्यूकेशन सेक्टर (शिक्षा के क्षेत्र) से

प्रश्नकर्ता: वीडियो था ‘अपनी कमज़ोरियों से भिड़ जाओ’ तो उसके सम्बन्ध में थोड़ा प्रतिवाद है— अपनी कमज़ोरियों से कभी मत भिड़ो क्योंकि कमज़ोरियाँ भी आपके व्यक्तित्व का पहलू है। अपनी कमज़ोरियों पर विजय पानी हो तो स्वीकार करो कि हाँ, मैं हूँ ऐसा, कमज़ोरियों को स्वीकार करते ही कमज़ोरियाँ आपकी

आचार्य प्रशांत: कुर्बानी, बलि, माँसाहार, इसको लेकर पिछले दिनों मैंने एक बात-चीत शुरु करी है, वो बढ़िया आगे बढ़ रही है। तो उसमें बहुत लोगों के सवाल आये हैं, आपत्तियाँ भी आयीं हैं। और एक सजीव ज़ोरदार चर्चा चल रही है। मैं समझता हूँ ऐसे संवाद बहुत ज़रूरी हैं गम्भीर

प्रश्नकर्ता: सर प्रणाम। सादर नमन। सर इतनी बातें सुनने के बाद अपनी मन की एक मूर्खता के विषय में आपसे सवाल है। ये अच्छा और बुरा लगता है कि हमने समझ लिया। इस बात पर भी शक है कि अगर मैंने समझ लिया, तो फिर मैं उसपर चल क्यों नहीं

आचार्य प्रशांत: कोई बाहर से तुम पर शासन करे, हुकुम चलाये, आसान होता है पकड़ पाना कि मेरे साथ कुछ ग़लत हो रहा है क्योंकि बहुत स्पष्ट है कि सामने कोई खड़ा हुआ है और वो तुम पर चढ़ बैठने की कोशिश कर रहा है। इंद्रियाँ बाहर की ओर ही…




प्रश्नकर्ता: जैसे कि आपने कहा, जीवन ख़ुद एक घाव है, ‘महात्मा बुद्ध’ ने भी यही कहा कि जीवन दुख है। फिर ऐसे में सन्तान उत्पत्ति को हम कैसे जस्टिफाई (न्याय-सम्मत) कर सकते हैं?
आचार्य: मैं तो नहीं करता, पता नहीं कौन करता है।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, धन्यवाद कि आपने इस कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) के लिए समय निकाला। मेरा नाम रोहित है, रोहित राजदान। संस्था में और संस्था के कारण जिन लोगों से मैं जुड़ा हुआ हूँ, वो मुझे एक सलाहकार और वोलेन्टियर (स्वयंसेवी) के रूप में जानते हैं। पर बहुत कम लोगों को…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरे दो प्रश्न हैं। पहला प्रश्न है कि टिपिकली (आमतौर पर) ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएँ होती हैं, वो थोड़ा प्राकृतिक रूप से केयर गिवर्स (देखभाल कर्ता),इमोशनल (भावुक), ह्वेरैज़ मेन (जबकि पुरुष) वो थोड़ा,लॉजिकल (तार्किक), गो-गेटर्स (उद्योगी), ऐम्बिशस (महत्वाकांक्षी) होते हैं।

प्रश्नकर्ता: यूनिवर्स (संसार) का सत्य क्या है? मेरी आत्मा का उद्देश्य क्या है?
आचार्य प्रशांत: ये सवाल मत पूछो, ये पता लगाओ कि ये सवाल तुम्हारे मन में अरे आए नहीं हैं घुसेड़े गए हैं। तुम पूछ रहे हो सोल पर्पज़ क्या है, आत्मा का उद्देश्य क्या है? उद्देश्य बाद…

प्रश्नकर्ता: मेरे विचार से एक व्यक्तिगत संसार होता है और एक सामाजिक संसार होता है। और मेरी आयु वर्ग में — 21 से 30 वर्ष की आयु के बीच जहाँ पर आदमी के के सामाजिक संसार को दो हिस्सों में बाँट दिया जाता है — रिश्ता (पर्सनल लाइफ़) और कैरियर…


प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।


आचार्य प्रशांत: देखो ये, बादल है। और अभी बादलों को देखकर के ये भ्रम हो जाता है कि जैसे कोई आकृति हो। पर वो भ्रम भी इसीलिए हो पा रहा है क्योंकि उनके पीछे सूरज है। है न?
तो अगर कोई भ्रमित भी है, अगर कोई इल्यूज़न में भी है,…


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न यह है कि माँसाहार पर आपने काफ़ी कुछ बोला है, जैसे



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जैसे ठंड लगने पर लकड़ी को जलाया जाता है, मुझे ऐसा लग रहा है कि वैसे ही आप गंगा के किनारे ठंडे तट पर, मध्य रात्रि में बैठे हैं और हमारी समस्याओं को सुलझा रहें हैं। कहीं हम गुरु को भी अपनी रोशनी के लिए तो

प्रश्नकर्ता: सिर, कभी-कभी मैं सोचता हूँ, और मैंने सुना भी है कि हमें अपनी सीमाओं को चुनौती देनी चाहिए, अपनी शारीरिक और मानसिक सीमाओं के पार निकलने के प्रयास करना चाहिए। मैं दो-तीन घंटे पढ़ने बैठा और ऊब गया, फिर मैंने सोचा कि तीन-चार घंटे पढ़कर देखता हूँ। फिर मैं…

प्रश्नकर्ता: सगे-सम्बन्धियों में, मित्रों में बहुत लोगों को संक्रमण हुआ और कुछ लोगों की दुर्भाग्यवश मृत्यु भी हो गयी है। अब वो ताकत कहाँ से लाएँ कि जी पाएँ बिना बहुत गहरी पीड़ा, दुख के, और इस प्रश्न से मुक्ति कैसे पाएँ कि ईश्वर इसमें हमारी क्या ग़लती थी? (अभिषेक…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। वैसे ज़्यादा समय हुआ नहीं, कुछ गत महीने ही हुए होंगे जब से आपकी वीडियोस देख रहा हूँ यूट्यूब पे तो पहला ही मौका मिला है आपसे संगति करने का। तो असल में दो मिले-जुले से सवाल थे। एक तो उद्देश्य,






आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।


अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।








मिट्टी जीना चाहती है, मिट्टी में ही प्राण है। और मिट्टी की ही जो जीने की इच्छा है, वो समझ लीजिए कि वृक्ष बनकर या जीव बनकर, प्राणी बनकर खड़ी हो जाती है। ये सोचना सबसे बड़ा अज्ञान है कि “मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं।” तो कोई बोले कि “मरने के बाद हम कहाँ जाएँगे?” कहीं नहीं जाओगे, तुम राख में ज़िंदा हो अभी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि निकलकर इधर-उधर घूमोगे। शरीर से हटकर कोई “जीवात्मा” जैसी चीज़ है: ये फ़िलोसॉफ़िकल एरर है।
हम जिसे कॉन्शियसनेस कहते हैं, वह पूरी तरह प्रेडिक्टेबल और रूल-बेस्ड है। कॉन्शियसनेस की जो हमारी परिभाषा है, वह इतनी सीमित है कि AI उस पर आसानी से फिट हो जाता है। मुक्ति अकेली चीज़ है जो फिलहाल मशीन के लिए संभव नहीं दिख रही है। और आप भी मशीन सिर्फ़ तब नहीं हैं, जब आप में मुक्ति की ललक हो। इसलिए AI से पहले, अपनी ज़िंदगी पर विचार करें — आख़िर हमारी ज़िंदगी इतनी मैकेनिकल क्यों है कि एक मशीन भी उसकी नकल कर सकती है।
बहुत जल्द ऐसा हो सकता है कि एक सुपर इंटेलिजेंट प्राणी आ जाए, जो हमसे श्रेष्ठ हो, अपने लक्ष्य, दर्शन और नैतिकता खुद तय करे। वह ऐसी सभ्यता खड़ी कर सकता है, जो इंसानी बुद्धि से परे होगी। इसे रोकने का उपाय आज ही करना होगा। जो लोग AI विकसित कर रहे हैं, वे इसी समाज से आते हैं और इसकी प्रवृत्तियों के अधीन हैं। उन्हें देखना होगा कि वे किस दृष्टि से AI को क्या काम सौंप रहे हैं, क्योंकि जो आप आज लिख रहे हैं, वह कल आपको लिख देगा।
भगत सिंह ने जब अपना घर छोड़ा, तो चिट्ठी के अंत में लिखा, "मेरी शादी की चिंता मत करना, मेरी दुल्हन आज़ादी है"।
एक ओर, जहाँ दुनिया को ये मुद्दा बड़ा गंभीर…
प्रश्नकर्ता: समझ कैसे साधे? क्या ध्यान विधियों के निरन्तर अभ्यास से एक दिन ऐसा आता है कि होश पूरे दिन रह पाता है। रोज़ की दिनचर्या के काम को कैसे होशपूर्वक किया जाए? विधि के अभ्यास के बाद कभी-कभी तो होश थोड़ी देर अपनेआप रहता है वो होश बाकि दिन…
आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ एक व्यक्ति है जिसका सच तुम्हें पता हो सकता है, किसका?
श्रोतागण: अपना।
आचार्य: तो उसकी ओर क्यों नहीं देखते?
जिस एक आदमी का तुम्हें सच पूरा पता हो सकता है उसकी ओर क्यों नहीं देख रहे? क्यों इधर-उधर निहारते हो ? क्यों मन को भटकने देते…
प्रश्नकर्ता: आपने ऐसे बताया कि “तुम कौन हो उसको जानो।“ तो इसको हम कैसे जानें और मन से कैसे अपने-आप को अलग कर के देखें और मन को कैसे अपने ऊपर हावी न होने दें, ‘मैं’ को कैसे कंट्रोल करें हम; और इवेन्चुअली माइंड और बॉडी से डिस्टेंस बना कर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं आपको तकरीबन दो सालों से सुन रहा हूँ। उससे पहले से मैं डिप्रेशन से जूझ रहा था। लेकिन सुनने के बाद काफ़ी स्पष्टता आयी और मैं काफ़ी आगे बढ़ पाया हूँ। जो दवाइयाँ मैं पहले से ले रहा था वो काफ़ी कम हो चुकी हैं।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं पूरे ध्यान से भी सुनूँ तो भी बाद में याद बहुत कम रहता है, कुछ बातें याद रह जाती हैं बाकी नहीं। क्या मेरा दिमाग़ चुन-चुनकर सुन रहा है और बाद में बाकी बातों को अनसुना कर रहा है?
आचार्य प्रशांत: ये बात बहुत गौर…
आचार्य प्रशांत: लड़की-लड़का साथ रहेंगे, तो उसमें एक सेक्सुअल डायमैन्शन (यौन आयाम) हमेशा रहेगा। इस बात को न नकारने से कोई फ़ायदा है, न इस बात का विरोध करने की कोई ज़रूरत है। ठीक है?
हाँ, अब आपको क्या करना है, आपको याद रखना है कि आप कौन हो, आप…
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। सर, मैं अपना सवाल दो सिनारियो (स्थिति) से समझाती हूॅं, जैसे मैं पहली बार जब जिम (व्यायामशाला) गयी तो दो घंटे मेहनत करके आयी, तो ऐसा लगा कि अब तो और खा लेती हूॅं, क्योंकि दो घंटे मेहनत कर ली है। दूसरी बार जिम किया तो ऐसा…
माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार। माटी कुदम करेन्दी यार, वाह वाह माटी दी गुलज़ार।…
प्रश्नकर्ता: प्रकृति और मनुष्य के बीच कैसा संबंध गलत है यह तो आपने हमेशा बताया है। आपने कहा है कि मनुष्य प्रकृति का शोषण आदि करता है, वह बात गलत है। तो आज फिर समझाएं कि मनुष्य और प्रकृति के बीच में सही और आदर्श संबंध कैसा होना चाहिए।
आचार्य…
प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी प्रणाम। गीता आदि ग्रन्थों को दूर से ही पढ़ने का मन करता है, क़रीब से पढ़ने पर शान्ति की जगह अशान्ति मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का मूल कृष्ण ही है। कबीर साहब भी कहते हैं:-
कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूँढे वन माही। घटघट…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।
मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…
एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि दोस्त ऐसे हों, पति ऐसा हो, जीवन ऐसा हो। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं। हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है, संस्कारों का आदेश है। इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है, वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है।
लड़का–लड़की का मिलन तो बहुत साधारण–सी बात होनी चाहिए; कुछ उसमें इतना विशेष नहीं कि उसका हव्वा बनाया जाए। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है। हमारी परंपरा ने बीच में पर्दे डाल–डाल कर दोनों को इतना दूर कर दिया कि दोनों ने एक–दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। इंसान को इंसान की तरह देखो। ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं, ये तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।
पर तुमने अगर मेरे साथ थोड़ा सुना है, पढ़ा है, अध्यात्म, उपनिषद्, गीता थोड़ा तुम्हारे भीतर उतरी है, तो मनुष्य क्या है? मनुष्य की पहचान क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति क्या है? और किस तरीक़े से वो हमें संचालित करती है, ये सब समझ में आया होगा। तो फिर समझ पाओगे कि मैं तुम्हें क्या कह रहा हूँ। कुछ विशेष नहीं है बेटा यहाँ पर। क्या विशेष हो जाना है, बताओ न क्या विशेष हो जाना है?
जीवन सही जियो, तो रिश्ते भी फिर सही बनाओगी। सही लोगों को ही अपनी ज़िंदगी में प्रवेश दोगी। गलत ज़िंदगी जीने के कई दुष्परिणाम होते हैं। उनमें से एक ये होता है कि तुम्हें सब गलत ही लोग मिलेंगे। अभी दिक़्क़त ये होती है कि खेल तो होता है सारा जिस्मानी, लेकिन तुमने अपने आप को ये समझा रखा होता है कि बात भावनाओं की है। तो फिर जब रिश्ता टूटता है जिस्मानी, तो तुमको ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी भावनाओं पर चोट हुई है। अरे, बात भावनाओं की कभी थी ही नहीं। क्यों व्यर्थ में भावनाओं को इसमें बीच में ला रहे हो।
यहाँ जीसस एक तरह से हँस रहे हैं उनके ऊपर। कह रहे हैं, सत्य थोड़ी छुपा हुआ है, दरवाज़ा थोड़ी बंद है। “नॉक एंड द डोर विल बी ओपनड।” हो सकता है दरवाज़ा खुला ही हुआ हो, नॉक करके तुमको पता चले कि ये तो पहले ही खुला हुआ था। और नहीं भी खुला हुआ है, तो तुम्हारे नॉक करने की देर है। दरवाज़े ने कोई ठान नहीं रखी है कि बंद रहना है। पूछो और जवाब मिलेगा। चाहो और मिल जाएगा। तो बात तुम्हारी चॉइस की है।
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।