प्रकृति के सारे चक्र क्लाइमेट चेंज से प्रभावित होने जा रहे हैं — ये प्रलय ही है। सब चक्र एक-दूसरे पर आश्रित हैं और फ़ीडबैक लूप्स सक्रिय हो चुके हैं। हम सिर्फ़ मरने नहीं वाले, हम पागल होकर मरने वाले हैं। अनुमान है कि 120 करोड़ लोग अपना घर छोड़कर भागने को विवश होंगे। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विस्थापन होगा। यह वैल्यू सिस्टम की कैटस्ट्रॉफ़ी है; किसको महत्त्व देना है और किसको नहीं — यह हमें पता नहीं है, इसलिए अध्यात्म बहुत ज़रूरी है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम बलराम है। मैं कटनी जिला के मध्य प्रदेश से हूँ। आचार्य जी, मेरा प्रश्न जलवायु आपदा पर समाज की उदासीनता को लेकर है। हम देखते हैं कि तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। बाढ़, भूकंप जैसे तबाही लगातार बढ़ती जा रही हैं लेकिन हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
यही तबाही मेरे गाँव में आई कुछ समय पहले, जो दर्जनों गाँवों को बहाकर ले गई और लोग बेघर हो गए। और आज समस्या ये है कि लोग पलायन करने को तैयार हैं। लेकिन आज हम उसका निराकरण करने के बजाय कामना पूर्ति, कथा-पुराणों में उलझे हुए हैं। तो इससे जलवायु परिवर्तन पर कितना प्रभाव पड़ेगा?
आचार्य प्रशांत: मेंढकों वाली कहानी सुनी है आपने? दो मेंढकों पर प्रयोग हुआ था। तो खौलता हुआ पानी था, किसी तसले वग़ैरह में खौला रहे होंगे, तो उसमें एक मेंढक को डाला। मेंढक ने कहा, “ये क्या चल रहा है!” वो जल्दी से बाहर कूद गया। मेंढक को कितना समय लगेगा पानी से बाहर कूदने में? घुसा और फट से बाहर कूद गया, इतना ही है।
खौलता पानी, “पागल हो गए हो!” बच गया। बच गया क्योंकि बाहर वो जिस तापमान में पहले था और फिर भीतर पानी के जिस तापमान का उसे अनुभव हुआ, उनमें यकायक बहुत ज़्यादा अंतर आ गया। है ना? तो उसको पता चल गया, “ये तो भारी अंतर है।” अंतर अचानक से आया, तो उसको अनुभव में आया, वो




