कोविड से इतना दर्द मिला, पर सुधरे नहीं हम || आचार्य प्रशांत, XLRI के साथ (2021)

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य प्रशांत जी! हमारे लिए समय निकालने के लिए। अभी जैसे हम लोग देख रहे हैं कि कोरोना काल चल रहा है और जीवन का भी काफ़ी लॉस (हानि) हुआ है, जीवनी का भी काफ़ी लॉस हुआ है। ये क्या एक कलेक्टिव मॉर्निंग (सामूहिक शोक) जो हो रही है, ये लोग है, ये एक बड़े परिवर्तन की तरफ़ भी इशारा कर रहा है?
आचार्य प्रशांत: देखिए! वो बड़ा परिवर्तन तो तभी आएगा जब हमें ये समझ में आये कि ये आपदा अकस्मात बिलकुल नहीं थी। लेकिन अभी जिस तरह की चर्चा चल रही है, वो जो पूरा वार्तालाप है, कोरोना के इर्द-गिर्द; वो मुझे तो बहुत उम्मीद नहीं देता कि हम थोड़ा भी सचेत हो रहे हैं।
'राजनैतिक दृष्टि से कौन उत्तरदायित्व है इसकी बात हो रही है, कौन से देश ने क्या किया इसकी बात हो रही है? क्या ये चीन की साजिश थी? वहाँ पर फॉसी का इसमें क्या रोल था? क्या ट्रंप ने जो कहा था, वो बात बिलकुल सही थी? किस प्रदेश में टीकाकरण किस गति से चल रहा है? क्या टीकाकरण के आँकड़ों से छेड़छाड़ की गयी है? क्या मौत के आँकड़े जितने प्रकाशित हुए उससे चार गुना ज़्यादा थे?' इन सब विषयों में हमारी ज़्यादा रुचि है। जो मूलभूत कारण रहा है इस त्रासदी का उसकी बात करता मुझे कोई दिखाई नहीं देता। और त्रासदी का जो मूलभूत कारण है वो निकट भविष्य में ही ऐसी कई अन्य त्रासदियाँ खड़ी करने वाला है।
हम अपने दुख से भी कुछ सीखने को जैसे राज़ी ही नहीं हो रहे। आपने कहा कि एक, एक संयुक्त विषाद है, दुख है, पीड़ा है। नहीं, पीड़ा तो है लेकिन क्या हम उस पीड़ा के मर्म तक जा रहे हैं, क्या हम ये समझना चाहा भी रहे हैं कि वो पीड़ा आयी ही क्यों?
उदाहरण के लिए कोई कह रहा है कि अगर ऑक्सीजन सिलेंडर चार घंटे पहले मिल जाता तो मेरे भाई बच जाते। तो एक तल पर ये बात सही भी है कि अगर ऑक्सीजन सिलेंडर थोड़ा जल्दी मिल जाता तो शायद वो बच जाते।



