
प्रश्नकर्ता: आप बोलते हो कि नॉनवेज नहीं खाना चाहिए, पर जब वाइल्ड एनिमल्स हर्बीवोरस को खाते हैं, तो उनको बुरा नहीं लगता होगा, हर्बीवोरस को?
आचार्य प्रशांत: तुम डॉग नहीं हो न? तुम जैकाल भी नहीं हो, तुम वूल्फ भी नहीं हो। तो वाइल्ड एनिमल हर्बीवोर को, रैबिट को या किसी को भी, उसको खाने दो न।
वो बेचारा तो एनिमल है, उसको तो कुछ समझ ही नहीं, उसको तो नेचर ने जैसा प्रोग्राम करा, बेचारा करेगा। उसके पास कोई चॉइस ही नहीं है। पर तुम तो इंटेलिजेंट हो। तुम्हारे पास चॉइस है न? है न?
कोई बोले कि, “पर शेर भी तो हिरण को खाता है।” अरे, शेर तो नंगा सो जाता है, तुमने कपड़े क्यों पहने हैं? शेर तो ब्रश भी नहीं करता है और खुले में पॉटी कर आता है। तुम शेर नहीं हो, बेटा। तो उधर वाले एग्ज़ाम्पल तुम्हारे ऊपर नहीं चलते।
पर तुम तो छोटे हो, बड़े-बड़े लोग ये एग्ज़ाम्पल देते हैं। कहते हैं, “बट नेचर में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।” और पहले तो पूँछ दिखाओ। तुम टाइगर हो, इसलिए तुम जाकर बफ़ेलो को खाना चाहते हो, तो पूँछ दिखाओ। और अगर तुम टाइगर हो या वूल्फ हो, तो ये ट्विटर अकाउंट क्यों चला रहे हो? जंगल में तो नहीं होता सोशल मीडिया, पर तुम तो इंस्टाग्राम चलाते हो।
अपने स्वार्थ को जस्टिफ़ाई करने के लिए तुम जानवरों के गंदे एग्ज़ाम्पल दे रहे हो। तुम अगर जानवर का एग्ज़ाम्पल दे रहे हो, तो फिर जानवर जैसे ही हो जाओ न। जानवर तो शादी भी नहीं करते। जानवर स्कूल भी नहीं जाते, जानवर जॉब भी नहीं करते। जानवरों का बैंक अकाउंट भी नहीं होता। जानवर के पास लैंग्वेज नहीं होती। जानवर शहरों में नहीं रहते। जानवरों के पास पक्के घर नहीं होते।
लेकिन जब मांस खाने की बात आती है, तो हम कहते हैं, “जानवर भी तो खाते हैं।” तो तुम्हें भी अगर जानवर की तरह ही मांस खाना है, तो पहले तो जंगल जाओ, ये घर छोड़ो। और फिर जंगल जाकर जानवर की तरह; पहले तो कपड़े फाड़ो इसके। शेर कपड़े पहनता है क्या? फिर? उसके अलावा, जानवर कभी पका के खाता है? जानवर को अगर मांस खाना होता है, तो ख़ुद ही मारता है और कच्चा ख़ुद ही फाड़ के खाता है। तुम वैसे ही बकरा फाड़ के खा के दिखा दो। पहले तो पकड़ के ही दिखा दो।
जानवर तो बड़ी मेहनत करता है। शेर इतना दौड़ेगा, इतना दौड़ेगा, तब हिरण को पकड़ेगा। तुम दौड़-दौड़ के एक मुर्गा पकड़ के दिखा दो। अब ये, “खाली पेट सो जाते हैं, बेहतर है।” भूख मर जाएगी मुर्गा पकड़ने भर में।
अब ये सब तुम्हें किसने सिखाया? ये स्कूल में चलता है, ये। हर्बीवोर, ओमनीवोर, कार्निवोर? गंदी बातें मत पढ़ना, वो झूठ पढ़ाया जा रहा है तुम्हें। उसमें देखा ही नहीं जा रहा है कि तुम जानवर नहीं हो, तुम एक कॉन्शस बीइंग हो। ठीक है? वो फूड चेन के नाम पर तुमको झूठ पढ़ा रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: मेरा स्पोर्ट्स से रिलेटेड क्वेश्चन है। मेरे पापा और मैं साथ में बैडमिंटन खेलते हैं, और कभी-कभी मैं ओवर-एक्साइटेड हो जाती हूँ। और ओवर-एक्साइटेड क्यों होती हूँ? और जब ओवर-एक्साइटेड हो जाती हूँ, तो मेरा कॉक छूट जाता है। ऐसा क्यों होता है?
आचार्य प्रशांत: जब आपको खेलने से ज़्यादा स्कोर की चिंता होती है। हम जब शटल से ज़्यादा अपोनेंट को देख रहे होते हो, तब शटल तो छूट ही जाएगी न।
जब आप खेल रहे हो, तो मतलब खेलने से होना चाहिए। खेलने में स्कोर क्या आएगा, आपका अपोनेंट आपसे इम्प्रेस होगा कि नहीं होगा, ये सब नहीं आना चाहिए दिमाग में। ओवर-एक्साइटमेंट कुछ नहीं होता। कम्पीटिंग प्रायोरिटीज़ होती हैं। कोई खेलता है खेलने के लिए, और कोई खेलता है किसी को इम्प्रेस करने के लिए, टूर्नामेंट जीतने के लिए, मेडल पाने के लिए। उसकी अलग प्रायोरिटीज़ हैं। उसे खेलने से कम मतलब है और दूसरी चीज़ों से ज़्यादा मतलब है।
अब वो खेल रहा है, वहाँ पर कोई बैठकर ऑडियंस में देख रहा है, तो उसकी एक आँख उसको देख रही है कि मैं इम्प्रेसिव लग रहा हूँ कि नहीं। “अच्छा-अच्छा, मैं खेल रहा हूँ, तो कोई मेरी फोटो खींच रहा है।” तो वो स्मैश मारते वक़्त भी ऐसे दिखेगा। ऐसे ऊपर उछल गया और देख रहा है, “फोटो खींचोगे?” फिर स्मैश मारेगा। तो अब शटल तो छूट ही जाएगी ना।
आ रही है बात समझ में?
जब खेलो, तो खेलो। खेलने से क्या मिलेगा, क्या नहीं मिलेगा, या कोई क्या सोचेगा, इससे कुछ मतलब नहीं।