
नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?





















हमें चेतना होगा, ज़मीनी हक़ीक़त को स्वीकारना होगा, तथ्यों को सम्मान देना होगा। वरना हमारे प्यारे देश को प्रकृति की बड़ी कड़ी सज़ा दुर्भाग्यवश भुगतनी पड़ेगी।


प्रलय जैसी स्थिति जब बनेगी, तो बाक़ी प्राणी किसी तरह अपना गुजारा कर लेंगे। आपका क्या होगा? और अगर वो मरेंगे भी, विलुप्त भी होंगे, तो दर्द सहकर मरेंगे, दुख सहकर नहीं। आपका क्या होगा? ना तो हमारा शरीर इस लायक है कि कुछ सह सके, ना हमारा मन इस लायक है कि कुछ सह सके। हम पृथ्वी की सबसे कमजोर प्रजाति हैं।


एलन मस्क को मनुष्यों की प्रजाति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता क्या? बाक़ी सब जो प्रजातियाँ हैं, वो क्या हैं? हमारे दुश्मन हैं या वो हमारे बच्चे हैं? वो चंद गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं। वो बहुत गिने-चुने विकसित देशों की बात कर रहे हैं, जहाँ पर अब टीएफ़आर इस लेवल पर आ गया है कि पॉपुलेशन स्टेबलाइज़ हो गई है, या माइनर डिक्रीज़ है। कुछ देश हैं बस ऐसे।


प्रश्नकर्ता१: नमस्ते सर। सर, बकरीद आने वाली है तो कल ही मेरे दोस्तों से मेरी बात हो रही थी व्हाट्सएप पर। तो उन्हें मैंने बोला कि भई इस बकरीद पर आप बकरा मत काटना — वो हर बकरीद पर काटते हैं।















प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं कसौली हिमाचल प्रदेश का रहने वाला हूँ, शिमला के पास में ही है बिलकुल। यहाँ पर पिछले कुछ सालों में टूरिज्म बहुत बढ़ गया है। और उससे जॉब्स तो क्रिएट हो रही हैं, परकैपिटा इन्कम भी बढ़ रही है। बल्कि रीसेंटली मैंने एक स्टडी पढ़ी

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जो सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) की जो आज के टाइम में हमको

आचार्य प्रशांत: अगर एक बच्चा पैदा होता है तो वो औसतन अपने जीवनकाल में प्रतिवर्ष अट्ठावन टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करेगा। आज की जो स्थिति है, आज के जो


प्रश्नकर्ता: पिछले बीस-चालीस साल से ऐसा क्यों हो रहा है कि लोगों को राम पसंद आने बहुत कम हो गए हैं? तो आम जनमानस को ख़ासतौर पर जो नई पीढ़ी है उसे तो नहीं ही पसंद आते राम, इधर पिछले बीस-चालीस साल के कुछ प्रसिद्ध गुरुओं ने भी राम का

आचार्य प्रशांत इस वक्त उत्तराखंड में दो सौ से ज़्यादा बाँधों का, डैम्स का निर्माण चल ही रहा है। और उसके अलावा सैकड़ों अन्य किस्म की तथाकथित विकास परियोजनाएँ। और ये सब-के-सब तोड़-फोड़ पर आधारित हैं। उसके अलावा हम रेल लेकर जा रहे हैं, एकदम पहाड़ की छाती तक हमें

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सो मच आचार्य प्रशांत फॉर जॉइनिंग (जुड़ने के लिए आपका बहुत धन्यवाद आचार्य प्रशांत) सर, आपके

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य प्रशांत जी! हमारे लिए समय निकालने के लिए। अभी जैसे हम लोग देख रहे हैं कि कोरोना काल चल रहा है और जीवन का भी काफ़ी लॉस (हानि) हुआ है, जीवनी का भी काफ़ी लॉस हुआ है। ये क्या एक कलेक्टिव मॉर्निंग (सामूहिक शोक) जो हो रही…
जलवायु संकट पर बहस अक्सर नीतियों और तकनीक तक सिमट जाती है, पर दुनिया की आबादी, उत्पादन, कार्बन और तापमान के ग्राफ़ साथ रखें तो एक ही रेखा दिखती है। धरती को दो चीज़ें मार रही हैं: बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता उपभोग। दोनों एक ही वृत्ति से निकलते हैं, ख़ुद को न जानना और बाहर जाकर भोगना। जंगल घट रहे हैं, जीव-जंतु मिट रहे हैं। जब तक करने वाला नहीं बदलेगा, नीतियाँ कैसे बदलेंगी? क्या समाधान हमारे ही हाथ में है?
जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।
जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।
जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।
‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।
रेस्टोरेंट में जाकर बैठो, वहाँ मेन्यू आता है; उसमें लाल निशान वाले इतने सारे होते हैं; क्या बुरा नहीं लगता? सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता हूँ, तो वहाँ पर झटका मीट, हलाल मीट। छोटे शहरों की ओर चले जाओ, तो वहाँ तो पूरे के पूरे बकरे लटक रहे हैं। जिस इंसान में थोड़ी भी जागृति है, वह जैसे-जैसे इस दुनिया को देखेगा, वैसे-वैसे बिल्कुल पगलाता जाएगा। कहेगा, "ये दुनिया है? ये जीने की जगह है? यहाँ क्यों जिए?" पर जीना है। दुनिया में आग लगी हुई है, तो आग बुझाने के लिए जीना है।
मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूंद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरह से इतना पानी दिया जाएगा कि पीकर ज़िंदा रह लो। अगर प्लानेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट फॉर्म्स हैं; ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे। किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना।
आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। यह प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है। यह आंतरिक दूषण है, जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है। छोटी सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदइन। और जो चीज भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा?
दुनिया में किसी देश में उतनी खराब जलवायु नहीं है, जितनी भारत में है, और भारत में कहीं भी उतनी खराब नहीं, जितनी दिल्ली में है। यहाँ साँस नहीं ली जाती, यहाँ का पानी गंदा है, लेड, मर्करी सब मिले हुए हैं पानी में। जीना मुश्किल होने वाला है सबका, बस कुछ पर असर आज ही पड़ जाएगा, कुछ पर चार साल बाद पड़ेगा। जब तक आपको पता चलेगा कि यह असर इर्रिवर्सिबल है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, आप कुछ नहीं कर पाओगे।
पृथ्वी नहीं गर्म हो रही है, हम भीतर से तप रहे हैं, अपनी कामनाओं में। आग लगी हुई है हमारे भीतर — और भोग लूँ, और भोग लूँ, मुझे और कंज़म्पशन करना है। ये जो हमारे भीतर आग लगी हुई है ना, ये ग्लोबल वार्मिंग के रूप में हमें दिखाई दे रही है। कचरा बाहर नहीं फैल रहा है, कचरा हमारे भीतर है। और जब तक इंसान के भीतर के कचरे को साफ़ नहीं करोगे, बाहर कचरे को रोकने का कोई तरीका नहीं है।
अरे होगा कोई आमरण अनशन कर रहा होगा, हमें क्या लेना-देना?” तुम्हें ये लेना-देना कि तुम भूखे मरने वाले हो क्लाइमेट चेंज से। खेतों में फसलें उगनी बंद होने वाली हैं, और जिनकी वजह से खेतों में फसलें उगनी बंद होंगी, उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। उनके पास बहुत पैसा है। अपनी आमदनी का वो खाने पर एक या दो प्रतिशत खर्च करते हैं बस, उनके पास इतना पैसा है। वो दो प्रतिशत पहले खाने पर खर्च करते थे, अब तीन प्रतिशत खर्च कर लेंगे, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
अगर कोई NCR में रह रहा है लगातार, तो उसकी उम्र से दस–पंद्रह साल गए — निश्चित रूप से गए। हमको सिखाया नहीं गया है कि क्या कीमती है। गुड लाइफ़ इसमें नहीं है कि हवा साफ़ है, पानी साफ़ है, सेहत अच्छी है, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने को मिल रहा है। गुड लाइफ़ इसमें है कि तुम मेरा माल खरीदो। जब तक हम वो सीमा नहीं तय कर देते कि भाई, इससे ज़्यादा कंज़म्प्शन की किसी भी आदमी को ज़रूरत नहीं है, तब तक ये AQI वगैरह बढ़ता ही रहेगा। लोग बस ये कहते हैं कि “मैं तो नहीं मरा न, और अभी तो नहीं मरा न; आगे मरेंगे तो देखा जाएगा।
तुम कैसे शुद्ध सात्त्विक ज़िंदगी जी लोगे? संभव ही नहीं है। सड़क पर चल रहे हो न? सड़क पर खून है। वो सड़क ऐसे ही नहीं बन गई। सड़क पर ही चलते हो न? भोजन ही खाते हो न? भोजन में खून है। तुम कैसी सात्त्विक ज़िंदगी जी रहे हो? झूठ! हवा में साँस ले रहे हो न? हवा में धुआँ है। और वो धुआँ किस चीज़ का है? वो लाशों का धुआँ है। तुम किस सात्त्विक ज़िंदगी की बात कर रहे हो? लेकिन हमें ये बर्दाश्त करना पड़ेगा, हम गुनाह में शरीक हैं।
ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ यह भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का हो। ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चले और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर और प्रेम हो।
आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक स्तर से 50% ज़्यादा हो गई है। ऐसा पाँचवें महाविनाश के बाद कभी नहीं हुआ। इसे छठा महाविनाश माना जा रहा है। सिर्फ़ तापमान नहीं बढ़ने वाला, तापमान की रेंज ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ने वाली है। यदि औसत तापमान 3 डिग्री है तो पीक 8–10 डिग्री बढ़ेगा। हर प्रजाति तापमान पर निर्भर होती है। तापमान बदल दोगे तो पूरी प्रजाति ही नष्ट हो जाएगी। यदि पूर्ण विध्वंस होगा तो वह आपने तय किया है और आप चाहो तो उसका समाधान भी हो सकता है।
पिछले एक हज़ार साल में मानवता के सामने जलवायु परिवर्तन से बड़ी कोई समस्या नहीं आई है। दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा एक-दो प्रतिशत प्रिविलेज्ड आबादी करती है और इसी ने सबको नशे में डाल रखा है। सारा काम अमीरों ने किया है, और गरीब भुगत रहे हैं। यह मानव की उपभोग-प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न संकट है। ज़िंदगी की एक समझ चाहिए, जिसकी शिक्षा हमें नहीं दी जा रही। हम अपने आपको नहीं जानते और यही वजह है कि इंसान अब इस हालत में पहुँच गया है कि बचना बड़ा मुश्किल हो गया है।
पृथ्वी पर आज तक पाँच बार महाविनाश हो चुका है। महाविनाश माने सारे जीव जंतुओं का संपूर्ण नाश।इतिहास में 5 बार पृथ्वी का तापमान बेहिसाब बढ़ा, और ग्रह पर जीवन ही समाप्त हो गया।
और अब, छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!और इस छठे महाविनाश का कारण भी…
प्रकृति के सारे चक्र क्लाइमेट चेंज से प्रभावित होने जा रहे हैं — ये प्रलय ही है। सब चक्र एक-दूसरे पर आश्रित हैं और फ़ीडबैक लूप्स सक्रिय हो चुके हैं। हम सिर्फ़ मरने नहीं वाले, हम पागल होकर मरने वाले हैं। अनुमान है कि 120 करोड़ लोग अपना घर छोड़कर भागने को विवश होंगे। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विस्थापन होगा। यह वैल्यू सिस्टम की कैटस्ट्रॉफ़ी है; किसको महत्त्व देना है और किसको नहीं — यह हमें पता नहीं है, इसलिए अध्यात्म बहुत ज़रूरी है।
हम शायद वह आख़िरी पीढ़ी हैं, जो मौसमों को कुछ सामान्य देख पा रहे हैं। सेलिब्रिटी, क्रिकेटर, पॉलिटिशन, या रिलिजस फ़िगर — इन सबका मूल्यांकन इनके कार्बन फुटप्रिन्ट से होना चाहिए। एक बिलियनेयर का जेट दो घंटे में उतना एमिशन करता है, जितना एक भारतीय हज़ारों साल में करेगा। इनके एमिशन से हज़ारों प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। पृथ्वी जल रही है, मासिव एक्सटिंक्शन हो रहा है। अमीर मौज कर रहे हैं, आम आदमी मर रहा है। Operation 2030 ही क्लाइमेट चेंज रोकने का एकमात्र तरीक़ा है, क्योंकि आत्मज्ञान का अभाव ही क्लाइमेट चेंज है।
‘ग्रीनवॉशिंग’ का मतलब होता है कि जो चीज़ पर्यावरण की बहुत कम मदद कर पाएगी, उसको ऐसे प्रदर्शित करना जैसे वो पर्यावरण के लिए बड़ी हितकारी हो। ये एक तरह की धोखेबाज़ी है। पेड़ लगाना बहुत बड़ी ग्रीनवॉशिंग है। पेड़ लगाने से नहीं होगा; ग्रीनवॉशिंग मत करो। तुम दो काम बहुत घातक कर रहे हो — प्रोडक्शन और पॉपुलेशन; ये बरकत नहीं है, ये पृथ्वी का नाश है। कुछ और मत करो; बस प्रोडक्शन और पॉपुलेशन कम करो — ये है क्लाइमेट क्राइसिस का इलाज।
नेता, सेलिब्रिटीज, क्रिकेटर और इंडस्ट्रियलिस्ट, जो आबादी के शीर्ष 0.01% हैं, वही इस ग्रह को तबाह करने के ज़िम्मेदार हैं। इनके प्राइवेट जेट और लाइफस्टाइल से millions of tons कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है, जो इस कार्बन क्राइसिस का असली कारण है। पर आम आदमी को गुनहगार बताया जा रहा है—उसे कहा जा रहा है बल्ब कम जलाओ, रिसाइक्लिंग करो। असली समाधान यही है कि इन शीर्ष लोगों के consumption पर रोक लगे, नहीं तो आम आदमी 55–60 डिग्री तापमान में पागल होकर मरेंगे।
तो उन्होंने मुझे सीधा ये बोला कि भाई, हम…
क्लाइमेट चेंज, न्यूक्लियर डिज़ास्टर — ये सब ख़तरे इंसान के लिए हैं, पर अपनी फ़िक्र हम नहीं करते क्योंकि उसके लिए सबसे पहले स्वीकार करना पड़ेगा कि हमारे ऊपर ख़तरा है, और हमें ठीक होने की ज़रूरत है। हम बहुत तेज़ी से एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें हर आदमी पागल होगा — बाहर से स्वस्थ होगा और भीतर-ही-भीतर साइको। प्रकृति के विनाश की चिंता मत करो, अपने विनाश की चिंता कर लो। प्रकृति अपने आप को पुनर्जीवित कर लेगी — ये इंसान है जो वापस नहीं आएगा।
क्लाइमेट चेंज की समस्या इंसान की आबादी और इंसान के उपभोग के कारण है। और इन दोनों समस्याओं के केंद्र में आदमी की पाश्विक वृत्ति है। उस वृत्ति को न सरकारें हटा सकती हैं, न वैज्ञानिक हटा सकते हैं, उस वृत्ति को सिर्फ़ अध्यात्म हटा सकता है। इसलिए जब तक आध्यात्मिक तल पर इस समस्या को संबोधित नहीं किया जाएगा, तब तक संपूर्ण पृथ्वी और मानव जाति के बचने की कोई संभावना नहीं है।
पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”
मोहन: इतने दिनों से कहाँ था? दिखाई नहीं दिया?
सोहन: भाई! घूमने गया था। पास के हिल स्टेशन तक मस्त 4 लेन रोड बनी है!
मोहन: अच्छा, वही जो पहाड़ काटकर और पेड़ों को जलाकर बनी है?
सोहन: तुझे क़ानून नहीं पता? विकास के लिए जो पेड़ कटते हैं, उसकी…
जितनी देर में हम बात कर रहे हैं, जितनी देर में लोगों ने ये बात सुनी होगी थोड़े कुछ चंद मिनट उतनी देर में गई। अब हमें कभी उनके दर्शन नहीं होंगे गए। अब ऐसा भी नहीं है कि किसी और जन्म में वो लौट कर आएँगी। वो इतिहास बन गई वो कभी नहीं लौट कर आने की है। ये हम कर रहे हैं और इस भयानक तबाही से हम गुजर रहे हैं।
जंगलों की कटाई, पेड़-पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, प्लास्टिक से सागर भर जाना—ये सब हमारे भीतर की हिंसा और बर्बादी का प्रतिबिंब हैं। जब तक इंसान के भीतर की सफ़ाई नहीं होगी, पर्यावरण की तबाही नहीं रुकेगी। बाहरी स्वच्छता, आंतरिक स्वच्छता की छाया है। अगर 1% लोग जागरूक हो जाएँ, तो ये 99% अपने आप ठीक हो जाएँगे क्योंकि ये जिधर हवा बहेगी, उधर ही बह निकलेंगे। इसलिए बस 1% जागरूक लोग चाहिए जो दिशा तय करें।
कुल 4000 मिलियन हेक्टेयर हमारे पास जंगल है पृथ्वी पर, और लगभग पिछले 10 सालों में ही हमने उसमें से 500 हटा दिया। सबसे ज़्यादा कहाँ हटाया जाता है, मालूम है? गरीब देशों में — जैसे भारत। 2015 से 2020 के बीच जिन देशों में सबसे ज़्यादा फॉरेस्ट कवर हटाया गया, उनमें से एक भारत है। एक लंबे अरसे तक पृथ्वी के 50% क्षेत्र पर जंगल थे। अभी कितने हैं? 30%। ये पृथ्वी ऐसे चल ही नहीं सकती। क्या समाधान है इसका? जब तक हम इंसान को ही नहीं बदलेंगे, हम देश और पॉलिसीज़ को कैसे बदल सकते हैं?
इंसान के भीतर जो यह भाव है कि मैं एक इंसान हूँ जो पैदा हुआ है भोगने के लिए, जो दुनिया से अलग अपने हित साध सकता है, दूसरों को बर्बाद कर के खुशी पा सकता है, जब तक इंसान के भीतर ये चीज रहेगी तब तक इसका मुकाबला करना बहुत मुश्किल है
वातावरण में तापमान बढ़ने के कारण धरती पर तरह-तरह के अनिष्ट होते हैं। लेकिन फिर भी आदमी वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि गैसों का उत्सर्जन किए ही जा रहा है, जो वातावरण के तापमान को बढ़ाती हैं। इसे रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं, पर उनमें से कोई भी अभियान सफल होता दिखाई नहीं दे रहा, क्योंकि उसका सीधा संबंध आदमी के भोग से है। इसे रोकने का एक ही तरीक़ा है—या तो भोग कम कर दो, या फिर भोगने वालों की संख्या कम कर दो।
जंगल बायोडायवर्सिटी का केंद्र होते हैं। इतना तो हम समझते हैं। आप जब जंगल काटोगे तो वहां जो जिस दिशा में भाग सकता है भागेगा, ये भी समझते हो। ज्यादातर कहीं कोई भागेंगे बचेंगे नहीं। अब हिरण कहां को जाके बचेगा? वो मरेगा। हाथी कहां जाएगा? मरेगा। पर जंगल में कुछ ऐसे हैं जो नहीं मरेंगे बल्कि वो खुश हो जाएंगे कि जंगल कट गया। वो कौन है जानते हो? वो वायरस हैं। आप जंगल काटोगे पेड़ नहीं रहा तो उनको नया होस्ट मिल गया। कौन? जंगल काटने वाला। वो पहले पेड़ में रहता था या कहीं और रहता था वो आप में रहेगा।
Technology अधिक-से-अधिक इतना ही करती है कि मशीन की Efficiency बढ़ा देती है। अगर Technological Development उनके हाथों में है जिनका मन अभी भोगवाद और लालच से मुक्त नहीं है, तो हर प्रकार का तकनीकी विकास आत्मघातक ही होगा। असली समस्या ये है कि हमें भोगना है, हम प्रेम का अर्थ भी भोग समझते हैं। जब मन बदलेगा, तभी दुनिया में हो रही क्षति बदलेगी। ये बहुत बड़ी भ्रान्ति है कि तकनीकी विकास दुनिया को बचा लेगा।
बहुत सारा उपभोग (consumption) इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमें यह नहीं पता कि हमें ज़िंदगी में करना क्या है, हम कौन हैं और ज़िंदगी का उद्देश्य क्या है। भीतर लगातार एक बेचैनी बनी रहती है। हम उपभोग के द्वारा उस बेचैनी को मिटाने की कोशिश करते हैं। इस उपभोग की प्रवृत्ति के कारण उत्सर्जन (emission) तेजी से बढ़ता है। और यह उपभोग की प्रवृत्ति तो किसी आध्यात्मिक माध्यम से ही कम की जा सकती है। इसलिए जलवायु संकट (Climate Crisis) का केवल आध्यात्मिक समाधान हो सकता है।
आचार्य प्रशांत: तो हमें बेटियों की चिन्ता हो रही है, होनी भी चाहिए। लेकिन बेटियों की चिन्ता का जो कारण आपके पास है, शायद बेटियों पर जो ख़तरा है वो किसी दूसरे कारण से है। जिस कारण से है, उसकी बात कर लेते हैं।
आप जब कहते हैं कि भारत…
दुनिया की सारी समस्याएँ बस एक वजह से हैं—हम न सिर्फ़ अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं, बल्कि प्रति व्यक्ति उपभोग भी बढ़ाए जा रहे हैं। बच्चे यूँ ही नहीं पैदा हो रहे हैं; लोगों को एक झूठी संस्कृति का प्रसार करके बच्चे पैदा करने पर मजबूर किया जा रहा है। ज़्यादा नहीं, अगले बीस साल यदि बच्चे न पैदा हों, तो सब ठीक हो जाएगा क्योंकि आबादी बढ़ाने की इच्छा और ज़्यादा-से-ज़्यादा उपभोग की इच्छा, दोनों एक ही स्रोत (मन) से निकलती हैं।
आचार्य प्रशांत: मैं जो बोलूँगा वो बात बहुत चुभेगी बहुत लोगों को, एकदम बरछी जैसी लगेगी, लेकिन बता देता हूँ। इस समय पृथ्वी पर बच्चा पैदा होने से ज़्यादा अशुभ काम दूसरा नहीं है। मातम का काम है यह अगर एक भी बच्चा और पैदा हो रहा है। पर हमारी…