
एलोन मस्क जैसे कुछ बड़े नाम खुलेआम कह रहे हैं कि आबादी और बढ़ाओ, वरना पॉपुलेशन डिक्लाइन आ जाएगा। इस वक़्त दुनिया की जो बड़ी से बड़ी बीमारियाँ हैं — चाहे वो बायोडायवर्सिटी लॉस हो, चाहे क्लाइमेट कैटास्ट्रॉफी हो — उसका वास्तविक समाधान सिर्फ़ एक है: जनसंख्या नियंत्रण। तो ये अगर कभी होगा भी कि चाँद पर या मार्स पर ह्यूमन कॉलोनी बनेगी, तो उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ जो सबसे अमीर लोग हैं, वो जाकर के रहने वाले हैं। ग़रीबों के लिए तो यही रहेगा — कि मर जाओ।


प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं कसौली हिमाचल प्रदेश का रहने वाला हूँ, शिमला के पास में ही है बिलकुल। यहाँ पर पिछले कुछ सालों में टूरिज्म बहुत बढ़ गया है। और उससे जॉब्स तो क्रिएट हो रही हैं, परकैपिटा इन्कम भी बढ़ रही है। बल्कि रीसेंटली मैंने एक स्टडी पढ़ी

आचार्य प्रशांत: आदमी की हवस है ‘बने’ रहने की और बने-बने ‘भोगते’ रहने की। बने रहने की हवस के कारण आदमी ज़्यादा-से-ज़्यादा जी रहा है और अपने बाद अपने पीछे बच्चे छोड़कर जा रहा है। भोगने की हवस के कारण आदमी अधिक-से-अधिक उपभोग कर रहा है।

आचार्य प्रशांत: हमारी खुशियाँ खा गयीं पृथ्वी को। जितना हम भोग रहे हैं उतना हमें खिला पाने के लिए पृथ्वी के पास हैं नहीं, तो हम पृथ्वी को ही खा गयें। और हम कम पड़ रहे थे तो हमने अपनी तादाद बढ़ा ली, ताकि हम बहुत सारे हो जाएँ पृथ्वी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को कोटि-कोटि प्रणाम। पिछले दो सालों से आपको सुन रहा हूँ। मेरा सवाल कुछ इस प्रकार से था कि अभी हम लोग देख रहे हैं कि तकनीकी बहुत बढ़ गई है। हम बहुत चरम पर हैं अभी मनुष्यता, और आध्यात्मिक रूप से भी हमारे इर्द-गिर्द बहुत प्रपंच

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मैं अपनी फ्रेंड्स को आपके वीडियोज भेजती हूँ जिसमें जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा नहीं देना है। तो वो मुझसे रिवर्ट

प्रश्नकर्ता: पिछले दो दिन से मेरे को प्रश्न पूछने की इच्छा थी, पर पता नहीं क्या झिझक है, क्या डर है कि पूछ नहीं पा रहा था। पर आज तो जैसा वाक्या हुआ, उससे आज का प्रश्न थोड़ा वैलिड (वैध) भी हो सकता है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैंने आपसे पहले भी

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, मेरी एक कज़न हैं जो पहले से ही एक बच्चे की माँ हैं। और अभी हाल में ही उनसे बात हुई थी तो वो दूसरा बच्चा भी

आज से १ लाख वर्ष पीछे जाओ तो अरबों-खरबों जानवर थे, हज़ारों-लाखों प्रजातियों के; और मनुष्य थे कुछ लाख, अधिक-से-अधिक। अब आदमी हो गए हैं ८ अरब और जानवर बचे हैं (हाथों से कम मात्रा दर्शाते हुए) इतने से!

जहाँ माँस खाना शुरू किया, तहाँ समझ लो कि आप कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाने वालों की कतार में शामिल हो गए। उपभोग के माध्यमों में जो चीज़ ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक उष्मीकरण) के लिए सबसे ज़्यादा घातक है वो है माँस का सेवन। माँस का सेवन समझ रहे हैं सबसे ज़्यादा घातक…

पृथ्वी पर नहीं है इतने संसाधन कि तुम बच्चे पैदा करे ही जा रहे हो, करे ही जा रहे हो। और मैं जो बोलूँगा वो बात बहुत चुभेगी, बता देता हूँ!


प्रश्न: आचार्य जी, वर्तमान जीवन के व्यवहारिक कष्टों पर प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।








यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।

‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।


मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूंद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरह से इतना पानी दिया जाएगा कि पीकर ज़िंदा रह लो। अगर प्लानेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट फॉर्म्स हैं; ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे। किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना।

आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। यह प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है। यह आंतरिक दूषण है, जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है। छोटी सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदइन। और जो चीज भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा?


पृथ्वी नहीं गर्म हो रही है, हम भीतर से तप रहे हैं, अपनी कामनाओं में। आग लगी हुई है हमारे भीतर — और भोग लूँ, और भोग लूँ, मुझे और कंज़म्पशन करना है। ये जो हमारे भीतर आग लगी हुई है ना, ये ग्लोबल वार्मिंग के रूप में हमें दिखाई दे रही है। कचरा बाहर नहीं फैल रहा है, कचरा हमारे भीतर है। और जब तक इंसान के भीतर के कचरे को साफ़ नहीं करोगे, बाहर कचरे को रोकने का कोई तरीका नहीं है।


अगर कोई NCR में रह रहा है लगातार, तो उसकी उम्र से दस–पंद्रह साल गए — निश्चित रूप से गए। हमको सिखाया नहीं गया है कि क्या कीमती है। गुड लाइफ़ इसमें नहीं है कि हवा साफ़ है, पानी साफ़ है, सेहत अच्छी है, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने को मिल रहा है। गुड लाइफ़ इसमें है कि तुम मेरा माल खरीदो। जब तक हम वो सीमा नहीं तय कर देते कि भाई, इससे ज़्यादा कंज़म्प्शन की किसी भी आदमी को ज़रूरत नहीं है, तब तक ये AQI वगैरह बढ़ता ही रहेगा। लोग बस ये कहते हैं कि “मैं तो नहीं मरा न, और अभी तो नहीं मरा न; आगे मरेंगे तो देखा जाएगा।

काम ज़रूरी होते हैं, रिज़ल्ट पर हमारा हक़ नहीं होता। जब फ्रस्ट्रेशन में समय बीत रहा हो, तो तुरंत याद आना चाहिए कि यार, इतना भी समय कहाँ है कि मैं उदास हो पाऊँ। और अगर मेरे पास ये समय है, तो मैं ये समय अपने असली काम से चुरा रही हूँ। काम ज़रूरी है, तो जो कुछ तुम्हारे पास है, सब दे दो न उसको। इतना थक जाओ कि फ्रस्ट्रेट होने के लिए भी एनर्जी न बचे।



![[गाँधी जयंती विशेष] मत मानों उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-8e708d2d-a5df-48cf-92ec-50fbf0d40a8a/30/image.jpg)



जितनी जनसंख्या है, उसको बनाए रखना मूर्खता है। इसलिए जनसंख्या का गिरना ख़तरा नहीं, उत्सव की बात है। बड़े-बड़े कैपिटलिस्ट आबादी बढ़ाने की बात इसलिए करते हैं क्योंकि लोग कम हो जाएंगे, तो उनका माल कौन खरीदेगा? आने वाला समय आबादी का नहीं, बुद्धिबल का है, क्योंकि एक जगा हुआ व्यक्ति सौ सोते हुए लोगों पर भारी पड़ता है। इसलिए बधाई का पात्र वह नहीं, जिसके हाथ में बच्चा है, बल्कि वह है, जिसके हाथ में किताबें हैं।
समाधान तो बहुत सरल…
मैं होटल से निकल रहा था …
साहब!
जानवर भी कौन से बचे हैं बताइए? जो मनुष्य के…
प्रश्नकर्ता: पशुओं का परिवार नियोजन कैसे करें, और क्या नियोजन करना सही है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति इस बात से बिलकुल सरोकार नहीं रखती कि तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता क्या है। उसको सरोकार बस इस बात से होता है कि जीव कितने हैं। जीवन की गुणवत्ता क्या है, इससे प्रकृति को…
पहली बात तो ये कि - बच्चे मत पैदा करो। अगर ये उम्मीद कर रहे हो कि दुनिया में आठ-सौ करोड़ लोग हैं आज - जो कि…
जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।
जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।
जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।
ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?
तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।
रेस्टोरेंट में जाकर बैठो, वहाँ मेन्यू आता है; उसमें लाल निशान वाले इतने सारे होते हैं; क्या बुरा नहीं लगता? सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता हूँ, तो वहाँ पर झटका मीट, हलाल मीट। छोटे शहरों की ओर चले जाओ, तो वहाँ तो पूरे के पूरे बकरे लटक रहे हैं। जिस इंसान में थोड़ी भी जागृति है, वह जैसे-जैसे इस दुनिया को देखेगा, वैसे-वैसे बिल्कुल पगलाता जाएगा। कहेगा, "ये दुनिया है? ये जीने की जगह है? यहाँ क्यों जिए?" पर जीना है। दुनिया में आग लगी हुई है, तो आग बुझाने के लिए जीना है।
दुनिया में किसी देश में उतनी खराब जलवायु नहीं है, जितनी भारत में है, और भारत में कहीं भी उतनी खराब नहीं, जितनी दिल्ली में है। यहाँ साँस नहीं ली जाती, यहाँ का पानी गंदा है, लेड, मर्करी सब मिले हुए हैं पानी में। जीना मुश्किल होने वाला है सबका, बस कुछ पर असर आज ही पड़ जाएगा, कुछ पर चार साल बाद पड़ेगा। जब तक आपको पता चलेगा कि यह असर इर्रिवर्सिबल है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, आप कुछ नहीं कर पाओगे।
अरे होगा कोई आमरण अनशन कर रहा होगा, हमें क्या लेना-देना?” तुम्हें ये लेना-देना कि तुम भूखे मरने वाले हो क्लाइमेट चेंज से। खेतों में फसलें उगनी बंद होने वाली हैं, और जिनकी वजह से खेतों में फसलें उगनी बंद होंगी, उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। उनके पास बहुत पैसा है। अपनी आमदनी का वो खाने पर एक या दो प्रतिशत खर्च करते हैं बस, उनके पास इतना पैसा है। वो दो प्रतिशत पहले खाने पर खर्च करते थे, अब तीन प्रतिशत खर्च कर लेंगे, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
कितनी बार सोचा कि ये रील आख़िरी होगी, बस यहीं पर रुक जाना है, और रात के 3:00 बज गए, 4:00 बज गए। क्या करोगे आप बहुत स्क्रॉलिंग करके, या टीवी, या एक-एक घंटा नहाकर, या दो-दो घंटा खाकर? कुछ नहीं है, बैठे हुए हैं; ऐसे ही, ऐसे ही, ऐसे ही — ‘हाँ भाई, दो चाय और ले आओ।’ जब पता चल गया है कि क्या सही है, तब अपने आप को उसको सौंपना पड़ेगा, शत-प्रतिशत। ये आर्किमिडीज़ जैसी हालत है कि कपड़े पहनना भूल गए; दिनभर काम में डूबे रहे, वापस गए, बस चित्त पड़ गए। पर चूँकि वो चीज़ एक कीमत माँगती है, तो वो 1% लोगों को ही मिलती है।
भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?
तुम कैसे शुद्ध सात्त्विक ज़िंदगी जी लोगे? संभव ही नहीं है। सड़क पर चल रहे हो न? सड़क पर खून है। वो सड़क ऐसे ही नहीं बन गई। सड़क पर ही चलते हो न? भोजन ही खाते हो न? भोजन में खून है। तुम कैसी सात्त्विक ज़िंदगी जी रहे हो? झूठ! हवा में साँस ले रहे हो न? हवा में धुआँ है। और वो धुआँ किस चीज़ का है? वो लाशों का धुआँ है। तुम किस सात्त्विक ज़िंदगी की बात कर रहे हो? लेकिन हमें ये बर्दाश्त करना पड़ेगा, हम गुनाह में शरीक हैं।
मैनचेस्टर से जाकर पूछो कि गांधी का वहां क्या नाम था और क्या छवि थी। गांधी कहते थे कि यह सब व्यापारी हैं, सभी पैसे के भूखे हैं। इन्हें भारत से जो पैसा मिल रहा है, भारत को लूट-लूट कर के लंदन मोटा रहा है। मैं भारत की लूट रुकवाऊंगा।…
ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ यह भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का हो। ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चले और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर और प्रेम हो।
प्रेम भी इच्छा ही है, वो बहुत ऊँचे स्तर की इच्छा है। प्रेम नहीं आया, इच्छा ही कम कर ली तो मुर्दा हो गए।
रिश्ते फिर से याद रखिए, आपको अपने बंधन दिख रहे हैं तो उससे रिश्ता बनाइए, जो आपको चुनौती देता हो, आपके सामने आईने की तरह खड़ा होता हो, आपको आपकी बेड़ियाँ दिखा देता हो कि देखो अपने गले को, इसमें बेड़ियाँ ही बेड़ियाँ हैं। आपको अपने बंधन दिख रहे हों तो उससे रिश्ता बनाइए जो आपकी आज़ादी में सहायक हो। और आपको अगर दूसरे के बंधन दिख रहे हैं तो उसके सामने आईना बन के खड़े हो जाइए। यही राइट रिलेशनशिप है। इसके अलावा कुछ नहीं होती।
आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

चेतना को मिटाने या दबाने के प्रयास को हिंसा कहते हैं। चेतना को समर्थन और सम्मान देना ही अहिंसा है। दैत्य स्वयं तो अचेत है ही, ये चैतन्य जीव की चेतना पर आक्रमण के लिए भी आतुर है, तो अब देवी क्या करें? अगर चेतना को बचाना है तो सबसे पहले उसका वध करना पड़ेगा जो चेतना के विरुद्ध खड़ा है। हिंसा हुई या नहीं हुई, यह इससे नहीं नापा जा सकता कि खून बहा कि नहीं बहा, बल्कि इससे नापना होगा कि आपका मन चेतना के साथ है या चेतना के ख़िलाफ़ है।

आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक स्तर से 50% ज़्यादा हो गई है। ऐसा पाँचवें महाविनाश के बाद कभी नहीं हुआ। इसे छठा महाविनाश माना जा रहा है। सिर्फ़ तापमान नहीं बढ़ने वाला, तापमान की रेंज ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ने वाली है। यदि औसत तापमान 3 डिग्री है तो पीक 8–10 डिग्री बढ़ेगा। हर प्रजाति तापमान पर निर्भर होती है। तापमान बदल दोगे तो पूरी प्रजाति ही नष्ट हो जाएगी। यदि पूर्ण विध्वंस होगा तो वह आपने तय किया है और आप चाहो तो उसका समाधान भी हो सकता है।

प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।

पिछले एक हज़ार साल में मानवता के सामने जलवायु परिवर्तन से बड़ी कोई समस्या नहीं आई है। दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा एक-दो प्रतिशत प्रिविलेज्ड आबादी करती है और इसी ने सबको नशे में डाल रखा है। सारा काम अमीरों ने किया है, और गरीब भुगत रहे हैं। यह मानव की उपभोग-प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न संकट है। ज़िंदगी की एक समझ चाहिए, जिसकी शिक्षा हमें नहीं दी जा रही। हम अपने आपको नहीं जानते और यही वजह है कि इंसान अब इस हालत में पहुँच गया है कि बचना बड़ा मुश्किल हो गया है।

पृथ्वी पर आज तक पाँच बार महाविनाश हो चुका है। महाविनाश माने सारे जीव जंतुओं का संपूर्ण नाश।इतिहास में 5 बार पृथ्वी का तापमान बेहिसाब बढ़ा, और ग्रह पर जीवन ही समाप्त हो गया।
और अब, छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!और इस छठे महाविनाश का कारण भी…

प्रकृति के सारे चक्र क्लाइमेट चेंज से प्रभावित होने जा रहे हैं — ये प्रलय ही है। सब चक्र एक-दूसरे पर आश्रित हैं और फ़ीडबैक लूप्स सक्रिय हो चुके हैं। हम सिर्फ़ मरने नहीं वाले, हम पागल होकर मरने वाले हैं। अनुमान है कि 120 करोड़ लोग अपना घर छोड़कर भागने को विवश होंगे। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विस्थापन होगा। यह वैल्यू सिस्टम की कैटस्ट्रॉफ़ी है; किसको महत्त्व देना है और किसको नहीं — यह हमें पता नहीं है, इसलिए अध्यात्म बहुत ज़रूरी है।

हमें चेतना होगा, ज़मीनी हक़ीक़त को स्वीकारना होगा, तथ्यों को सम्मान देना होगा। वरना हमारे प्यारे देश को प्रकृति की बड़ी कड़ी सज़ा दुर्भाग्यवश भुगतनी पड़ेगी।

हर वो चीज़ जो हमारे भीतर के "जानवर" को अच्छी लगती है, वह तुरंत प्रसिद्ध हो जाती है। आप लोकप्रिय होना चाहते हो? कोई बहुत अच्छा या ऊँचा काम मत करना—कोई एकदम घटिया काम कर दो, तुरंत पॉपुलर हो जाओगे। कोई ऐसा काम करो जो एकदम ही गिरे हुए तल का हो। ऊँचा काम करोगे, तो लोगों को समझ में नहीं आएगा, दिखाई भी नहीं देगा और लोग डर भी जाएँगे—क्योंकि ऊँचाई खतरा होती है और ऊँचाई कुर्बानी मांगती है। कौन ऊँचा चढ़े? श्रम भी बहुत लगता है। तो बिल्कुल, कोई एकदम साधारण या साधारण से भी नीचे का कुछ करने लगो, लोग आकर्षित हो जाते हैं आपकी ओर।

हम शायद वह आख़िरी पीढ़ी हैं, जो मौसमों को कुछ सामान्य देख पा रहे हैं। सेलिब्रिटी, क्रिकेटर, पॉलिटिशन, या रिलिजस फ़िगर — इन सबका मूल्यांकन इनके कार्बन फुटप्रिन्ट से होना चाहिए। एक बिलियनेयर का जेट दो घंटे में उतना एमिशन करता है, जितना एक भारतीय हज़ारों साल में करेगा। इनके एमिशन से हज़ारों प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। पृथ्वी जल रही है, मासिव एक्सटिंक्शन हो रहा है। अमीर मौज कर रहे हैं, आम आदमी मर रहा है। Operation 2030 ही क्लाइमेट चेंज रोकने का एकमात्र तरीक़ा है, क्योंकि आत्मज्ञान का अभाव ही क्लाइमेट चेंज है।