वातावरण में तापमान बढ़ने के कारण धरती पर तरह-तरह के अनिष्ट होते हैं। लेकिन फिर भी आदमी वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि गैसों का उत्सर्जन किए ही जा रहा है, जो वातावरण के तापमान को बढ़ाती हैं। इसे रोकने के लिए कई अभियान चल रहे हैं, पर उनमें से कोई भी अभियान सफल होता दिखाई नहीं दे रहा, क्योंकि उसका सीधा संबंध आदमी के भोग से है। इसे रोकने का एक ही तरीक़ा है—या तो भोग कम कर दो, या फिर भोगने वालों की संख्या कम कर दो।
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आचार्य प्रशांत: औद्योगिक क्रान्ति से पहले दो-सौ-सत्तर, दो-सौ-अस्सी पीपीएम कार्बन डाईऑक्साइड होती थी। अभी बताइएगा कितनी होगी? अभी साढ़े-चार सौ।
उन्नीस सौ सत्तानवे, में क्योटो प्रोटोकॉल के आसपास के वर्षों की बात कर रहा हूँ, से लेकर अभी तक ही क़रीब-क़रीब पचास प्रतिशत इज़ाफ़ा हो गया है कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर में। और ये तब है जब सन् १९९७ में सब देश मिले ही इसलिए थे क्योटो में, क्योंकि स्पष्ट हो चुका था कि कार्बन डाईऑक्साइड और बाक़ी ग्रीन हाउस गैसें बहुत बड़ा ख़तरा हैं। उसके बाद भी १९९७ से लेकर अभी तक क़रीब-क़रीब पचास प्रतिशत की वृद्धि हो गई है इन गैसों के स्तर में, इतना बढ़ गई हैं। और वृद्धि हो ही नहीं गई है, प्रतिवर्ष वृद्धि अभी हो ही रही है।
हम कितनी बड़ी समस्या के सामने खड़े हैं, उसको जानने के लिए बस इतना समझ लीजिए कि अगर हमको स्थिति को नियन्त्रण में लाना है, तो हर आदमी अधिक-से-अधिक साल में दो टन कार्बन डाईऑक्साइड इक्विवैलेंट (बराबर) का उत्सर्जन कर सकता है।
भाई, कार्बन डाईऑक्साइड आदमी से ही तो पैदा हो रही है न? दुनिया में कार्बन डाईऑक्साइड जहाँ से भी उत्सर्जित हो रही है अन्तत: आदमी के लिए ही है वो जगह। भई, फ़ैक्ट्री से भी निकाल रही है तो उस फ़ैक्ट्री के उत्पाद का उपभोक्ता कौन है? आदमी। तो हम ये थोड़े ही कहेंगे कि फ़ैक्ट्री ने वातावरण को गन्दा कर दिया! उस फ़ैक्ट्री के माल का जो लोग उपभोग करेंगे, उन्होंने गन्दा किया न? फ़ैक्ट्री में चेतना या जान तो है नहीं, फ़ैक्ट्री की अपनी तो कोई मंशा है नहीं। तो दुनिया से जितनी भी कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित होती है, वो सब किनके लिए हो रही है? इंसानों के लिए हो रही है।




