
कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?
























शरीर भी 80-90% एक महिला का एक पुरुष जैसा ही होता है। किडनी, लिवर, हार्ट इसमें क्या जेंडर देख के होता है ट्रांसप्लांट?और खून और दवाइयाँ और वैक्सीन्स, दाँत ये सब जेंडर देख के चलते हैं क्या? तो पहली बात तो चेतना, दोनों की ही चेतना मनुष्य की चेतना है मुक्ति माँगती है। दोनों का आईक्यू लगभग एक जैसा होता है दोनों जीवन में वास्तव में एक ही महान लक्ष्य के लिए पैदा हुए हैं रही शरीर की बात तो शरीर भी 80- 90% भाई एक ही है। ये तो काम वासना का जलवा है कि हमको दूसरे के शरीर में बस वही चीज़ें दिखाई देती हैं जो हमसे विपरीत है।




















आचार्य प्रशांत: वैदिक धर्म से ज़्यादा साफ़, सुंदर, अंधविश्वास से रहित, तथ्यों और सत्यता से परिपूर्ण कोई धर्म है नहीं। लेकिन उसी हिंदू-धर्म को अंधविश्वासों का, कुरीतियों का, एक गर्हित संस्कृति का गढ़ बना दिया गया है; सत्य, आत्मा और ब्रह्म की तो कोई बात ही नहीं। उसकी जगह हिंदू





प्रश्नकर्ता: आज हमारे साथ मौजूद है एक ऐसी सख्सियत जिन्हें हम गुरु, हमारे टीचर,
35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?
एक महिला खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतती है, लेकिन उसे ऑनलाइन हैरसमेंट, फ़ेक अकाउंट्स और आपत्तिजनक तस्वीरों का सामना करना पड़ता है। सदियों की वर्जनाओं ने हमें स्त्री को सिर्फ़ देह के तल पर देखने का आदी बना दिया है, उसकी काबिलियत या गहराई से कोई सरोकार नहीं रहता। यही पैटर्न गाड़ी, नौकरी और शादी जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में भी दिखता है। यह कोई विकृति नहीं, बल्कि इन्हीं वर्जनाओं की स्वाभाविक परिणति है।
पीरियड्स से महिलाएं कमजोर नहीं होतीं, फिर भी यह मान्यता सदियों से चली आ रही है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हर ऐसी मान्यता के पीछे किसी का डर या स्वार्थ छुपा होता है। सिर्फ तर्क या जानकारी से बदलाव नहीं आता, जब तक हम खुद अपने भीतर के इस डर या स्वार्थ को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव न करें। असली आज़ादी वहीं से शुरू होती है जहां हम मूर्खता की बातों को पीछे छोड़ना सीखते हैं और सोच-समझकर संगति का चुनाव करते हैं।
स्त्री-पुरुष के रिश्तों में समस्या केवल आकर्षण या कामना की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें दोनों एक-दूसरे को अपनी इच्छाओं का साधन बना लेते हैं। पुरुष स्त्री को शरीर और स्त्री पुरुष को धन, सुरक्षा या सुविधा के माध्यम के रूप में देखने लगती है। इससे निर्भरता, कुंठा और संघर्ष पैदा होते हैं। स्वस्थ संबंध के लिए आत्मज्ञान, स्पष्टता, समानता, स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं की विवेकपूर्ण जाँच ज़रूरी है। साथ ही, रिश्तों के बने-बनाए सामाजिक मॉडलों पर पुनर्विचार करना और किसी भी व्यक्ति को अपनी मुक्ति का साधन न बनाना आवश्यक है।
लड़कियों को बचपन से निर्भर बनाना उनकी क्षमता नहीं, उनकी स्वतंत्रता छीनता है। आर्थिक, बौद्धिक और व्यावहारिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक सम्मान और सुरक्षा का आधार है। समाज अक्सर उन्हें रूप, भावनाओं और दूसरों पर आश्रित रहने तक सीमित कर देता है, जबकि उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता आज़ादी है। जो भी शिक्षा, कौशल या संघर्ष स्वतंत्रता की ओर ले जाए, उसी पर पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए; बाकी सब उसके बाद है।
स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक निर्भरता से ऊपर उठने का साहस भी है। दूसरों की राय, सुरक्षा के नाम पर लगाए गए बंधन और सामाजिक भय तभी प्रभावी होते हैं जब व्यक्ति उन पर निर्भर हो। गरिमा और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की शक्ति देती हैं। शांति, सम्मान और स्वतंत्र जीवन के लिए कभी-कभी सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
आर्थिक निर्भरता, भावनात्मक आघात और घरेलू हिंसा के बीच व्यक्ति अक्सर अपनी वास्तविक समस्या को पहचान नहीं पाता। रिश्ते कई बार प्रेम से अधिक मजबूरी और निर्भरता पर टिके होते हैं। आत्मनिर्भरता व्यक्ति को भय और विवशता से मुक्त कर सही निर्णय लेने की शक्ति देती है। दूसरों की सहायता करने से पहले स्वयं को सुरक्षित, स्वतंत्र और सशक्त बनाना आवश्यक है, क्योंकि स्वतंत्रता के बिना न संबंध स्वस्थ हो सकते हैं और न जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय।
आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।
महिला का सबसे ज़्यादा अपमान तो खुद महिला करती है। नाम है ‘शक्ति’ और जीवन है पूरा ‘अशक्त’। अगर लड़की इतनी ही बुरी चीज़ है, तो आप क्यों लड़की हो? आप खुद जिस लिंग की हो, आप उस लिंग के प्रति भी अपमान से भरी हुई हो। पाँच करोड़ महिलाएँ भारत की आबादी से गायब हैं। इनकी हत्या करी गयी है। इससे बड़ा नरसंहार कोई होगा। ये सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए देश में, बहस में, मीडिया में। लेकिन इसकी कोई बात नहीं करना चाहता। क्योंकि ये नारीसंहार है, इसीलिए इसे नरसंहार भी नहीं माना जाता।
आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।
आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्री के लिए तो बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।
वो सब बातें, कि “माँ से ऊँची जगह तो भगवान की भी नहीं होती,” वग़ैरह-वग़ैरह। सुना है न खूब? न पढ़ी-लिखी हो, न उसमें कोई गुण हो, न संसार को जानती हो, न अध्यात्म को जानती हो; ऐसा इंसान अगर गर्भधारण कर ले, तो क्या वो भगवान के बराबर हो जाएगा? अगर पुरुष का पहला धर्म बाप बनना नहीं है, तो स्त्री के लिए मातृत्व पहली चीज़ कैसे हो गई? आप एक मनुष्य हैं, महिला बाद में हैं। आपका भी अपने प्रति वही कर्तव्य है, जो एक पुरुष का होता है: चेतना को उसकी ऊँचाइयों तक पहुँचाना।
‘मुझे किसी की फीलिंग्स नहीं हर्ट करनी है। मुझसे मम्मी-पापा के आँसू नहीं देखे जाते। मैं गिल्टी फील करने लगती हूँ।’ गिल्टी फील करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है लेकिन सही वजह से गिल्टी फील करो न। असली गलती यह है कि आप अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। न ज्ञान है, न कला है, न कौशल है, न अनुभव है, कुछ नहीं है, दुनिया देखी नहीं है। महिला वग़ैरह आप बहुत बाद में हैं, सबसे पहले आप इंसान हैं और इंसान होने का मतलब ही होता है कि चेतना होना।
धन माने जिसकी अपनी कोई चेतना नहीं। धन माने जो सदा किसी और के स्वामित्व में रहेगा, वो धन है। धन कभी बोल नहीं सकता कि मैं अपने हिसाब से खर्च होऊँगा। धन ऐसा बोल सकता है? धन माने वो जो किसी की प्रॉपर्टी है। और अगर आपको किसी का इस्तेमाल अपने हिसाब से करना है, तो बहुत ज़रूरी है कि उसकी चेतना उससे छीन कर उसे ऐसे ही जड़ बना दो। बात ये नहीं है कि स्त्री पराया धन है, कि अपना धन है — वो धन क्यों है? किसी का धन नहीं है वो, वो एक स्वतंत्र चेतना है, मनुष्य है।
तुम बात-बात पर यदि निर्भर रहो, ‘पैसे दे दो, सुरक्षा दे दो,’ तुम्हें क्या लगता है, जो कोई तुम्हें यह सब कुछ देगा, तुमसे इनकी कीमत नहीं वसूलेगा? जिस लड़की के कदम खुले आकाश में नहीं निकले, जिसने दुनिया नहीं नापी, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जिसका मन खुला हुआ नहीं है, सबसे ज़्यादा संभावना उसी लड़की के शोषण की है। घर के बाहर निःसंदेह खतरा है, पर घर के भीतर और बड़ा खतरा है। सुरक्षा तुम्हें सबसे ज़्यादा पिंजड़ों में मिलती है, पर फिर पिंजड़ों में तुम उड़ भी नहीं सकते। भूलना नहीं इस बात को।
ये जो विमेन बॉक्सिंग रिंग है, ये सिर्फ़ एक रिंग नहीं है, ये उस संघर्ष की निशानी है, जो महिलाओं ने बहुत शताब्दियों तक किया है। ‘मिलियन डॉलर बेबी’ फ़िल्म है जिसमें एक महिला बॉक्सर चैंपियन कह रही है कि “मुझे मृत्यु तक मंज़ूर है, लेकिन गरिमाहीन जीवन मंज़ूर नहीं है।” महिला की उन्नति पर सिर्फ़ महिला की उन्नति निर्भर नहीं करती; पुरुष, राष्ट्र और पूरा विश्व भी इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि महिला अपने आप को महिला से ज़्यादा मनुष्य जानना शुरू करे।
अगर आपको कोई छेड़ रहा हो लड़का और मैं आकर के वहीं पर सशरीर उस लड़के को रोक दूं और उसको भगा दूं तो आपको लगेगा आचार्य जी ने मदद करी। लेकिन अगर मैं ऐसा माहौल पैदा कर रहा हूं कि जिसमें यह छेड़ाछाड़ी की घटनाएं घटे ही कम तो बात उतनी साफ-साफ पता नहीं चलती। ऐसा लगता नहीं कि कुछ हुआ। लेकिन असली महत्व का काम तो यही है कि सारी बदतमीजियां मन से पैदा होती हैं और मन को ही साफ करना पड़ेगा। लेकिन इस प्रक्रिया में समय लग सकता है। तो जो टैक्टिकल एक्शन होता है, जो तत्काल करना होता है, वो चीज यह नहीं होती।
जो हमें कहा जाता है कि "इंडियन वूमन की तो बात ही दूसरी होती है। वह तो होती ही कमज़ोर है, भावुक बहुत होती है।" नहीं, कमज़ोर नहीं होती। और उसका प्रमाण यह है कि उसने गोरी महिलाओं को हराया है। और किस मैदान में? भावना के मैदान में नहीं, खेल के मैदान में। जूझती हुई लड़की ज़्यादातर लोगों को पसंद नहीं आएगी, क्योंकि अगर वो क्रिकेट में या बैडमिंटन में जूझ सकती है, तो फिर वो समाज से भी जूझ सकती है। लड़की को तो जुझारू होना ही पड़ेगा, क्योंकि बहुत-बहुत ज़्यादा संभावना है कि वो जहाँ भी जाएगी, उसको माहौल प्रतिकूल ही मिलेगा।
प्रकृति ने ही स्त्री को ऐसा बना दिया है कि उसका देह से बड़ा सरोकार रहता है और उसमें आसक्ति, मोह और ममता पुरुष से कहीं ज़्यादा प्रबलता से मौजूद रहते हैं। यह स्थिति तब और भी बुरी हो जाती है, जब उसे समाज भी संस्कारित कर देता है कि तुम्हारा गहना तो लज्जा और ममता ही हैं। ये चीज़ स्त्रियों ने आत्मसात् कर ली है, अब वो बंधनों का चुनाव ख़ुद कर लेती हैं। अगर स्त्री की ही सहमति न हो, तो पुरुष इतने समय तक और इतनी आसानी से उसको दबाकर नहीं रख पाएगा।
ऋषियों ने कहा कि देखो, बाण से छूटा हुआ तीर तो लौट के नहीं आता न। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो भविष्य में अपना फल दिखाएँगे ही। अब ये किया था आपने, आपने छोड़ दिया। छोड़ने के तुरंत बाद आपको पता चल गया कि गलती हो गई, तो क्या होगा? अब तो वो जिसको लगना है लगेगा। यही बात मुँह से निकले शब्द से होती है।
पुरुष रिश्तों में कठोर और शोषक रहे हैं, आप भी कठोर और शोषक हो जाएँ, तो आप आधुनिक नहीं हो गईं। आधुनिकता के नाम पर सेक्शुअलिटी का वेपनाइज़ेशन खूब चल रहा है। मुआवज़ा उगाहने की माँग को छोड़िए। मुआवज़े की ज़िंदगी जियोगे, तो आत्मसम्मान खो बैठोगे। बिल्कुल हो सकता है कि आपके पति, पिता, भाई, परंपरा, समाज ने आपका नुकसान किया हो। लेकिन इनको दोष देते रहने से कुछ नहीं होने वाला। अपनी ज़िंदगी अपने हाथों में लीजिए। ख़ुद भी मुक्त जियो और दूसरे को भी मुक्ति दो।
लड़की को यह रोल असाइन ही नहीं किया गया कि उसका शरीर मज़बूत रहे — ताकि वह भी दमखम से कभी लड़ सके। यह काम समाज ने उसे दिया ही नहीं। और समाज की जो बात है, लड़की ने उसे बहुत गहराई से स्वीकार कर लिया है — बिना सवाल उठाए, बिना विरोध किए। अगर सेल्फ-कॉन्सेप्ट ही कमज़ोरी पर आधारित है, तो आप अपने शरीर को कभी एक सीमा से ज़्यादा मज़बूत होने ही नहीं देंगे। इसमें आपको क्या महिला सशक्तिकरण मिलने वाला है?
महिला दुनिया के हर उस काम में बराबर हो सकती है, जहाँ मनुष्य देह नहीं, चेतना है। वो ज़बरदस्त बॉम्बिंग कर सकती है। वो बेस्ट फाइटर पायलट हो सकती है। पर उससे कहो, “नहीं, तुम्हें दुश्मन की सीमा में घुसकर मुक्कों से मारना है।” तो वो ये नहीं कर पाएगी, क्योंकि मुक्का देह है और फाइटर प्लेन दिमाग है। महिला का पहला बंधन तो उसकी देह ही है। देह से स्वार्थ मत बाँधो। अपने शरीर को न तो अपनी पूँजी मानो, न अपना हथियार। ज्ञान शरीर से बहुत ऊँची बात है।
इतिहास में महिलाओं के सैकड़ों उदाहरण हैं, जो बहुत ऊँचा गईं — विज्ञान के क्षेत्र में देखें तो मैरी क्यूरी, खेल के क्षेत्र में देखें तो पी. वी. सिंधु। जिस भी क्षेत्र में महिला को देखो, अग्रणी हैं — वह लेखिका, खिलाड़ी, राष्ट्रपति हो सकती है; वो कुछ भी हो सकती है। वो इन सब में कुछ भी ना हो, तो भी एक सरल इंसान हो सकती है। महिला भी मनुष्य है, और किसी भी मनुष्य की तरह उसके जीवन के लक्ष्य वही होने चाहिए, जो एक मनुष्य को शोभा देते हैं, गरिमा देते हैं।
अब ये कहना तो नासमझी होगी कि महिला के जीवन में अनिवार्य रूप से किसी पुरुष को होना ही नहीं चाहिए लेकिन महिला किसी पुरुष के लिए नहीं बनी है। महिला एक मनुष्य है, और उसका जन्म इसलिए नहीं हुआ है कि वो किसी पुरुष को अपने जीवन के केंद्र पर ही रख डाले। महिला अगर मनुष्य है, तो किसी भी मनुष्य की तरह उसके जीवन के लक्ष्य वही होने चाहिए, जो एक मनुष्य को शोभा देते हैं, गरिमा देते हैं।
स्त्रियाँ भावना को अपना हथियार और देह को अपनी पूँजी समझती हैं। इन्हीं दो के कारण वो इतिहास में लगातार पीछे रही हैं और गुलाम रही हैं। जबकि स्त्री को प्रकृतिगत कुछ गुण मिले हुए हैं, जो पुरुष के पास नहीं होते। स्त्री में धैर्य और समर्पण ज़्यादा होता है, महत्वाकांक्षा कम होती है — ये बड़े गुण हैं। इस गुण के कारण वो किसी भी काम में बहुत आगे जा सकती हैं। देह सजाने की जगह अपने व्यक्तित्व में ऐसी रोशनी लाइए कि दुनिया को आपकी ओर देखना पड़े।
आजकल की जो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं, बोलती हैं कि धर्म का मतलब ही है नारी शोषण। नहीं, ऐसा नहीं है। धर्म के केंद्र पर जो ऋषि बैठे हैं, उन्होंने अपनी ओर से कभी भेदभाव नहीं किया। यह भेदभाव उस समाज ने किया है, जो कृषि और बाहुबल आधारित था। आज सौभाग्य की बात यह है कि महिलाओं के लिए ऊर्जा बाजुओं से नहीं आती, मस्तिष्क से आती है। तो परम आवश्यक है कि उनके हाथ मजबूत रहें और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहें।
स्त्री घर की धुरी है, घर का केंद्र है। तुमने अगर उसको बंधन में रख दिया, अशिक्षित रख दिया, तो पूरा घर बर्बाद होगा। लड़कियों में ये भावना बचपन से ही डाल दी जाती है कि तुम्हारी ज़िन्दगी तो दूसरों के लिए है। सबके लिए आप जो सबसे ऊँची सेवा कर सकती हैं, वो है आपकी शिक्षा। आप अगर अज्ञान और अँधेरे में रहेंगी, तो किसी का भला नहीं होने वाला है। पर-निर्भरता आपको कहीं का नहीं रहने देगी।
जो आश्रित महिलाएँ हैं, इनको सबसे बड़ी सज़ा यह मिलती है कि इनका अध्यात्म की तरफ़ बढ़ने का रास्ता बिल्कुल रोक दिया जाता है। परमेश्वर की ओर कैसे बढ़ोगे अगर पति ही परमेश्वर है? जो कैद में है, उसके लिए साधना है — दीवारों को तोड़ो और बाहर आओ। बाहर निकलकर कोई नया ज्ञान, कला, या कोई कुशलता सीखो।
एक लड़की की बचपन से परवरिश ही ऐसे की जाती है कि देह ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। देह दिखाकर पति मिल गया, और देह ही दिखाकर अगर बॉस भी मिल जाता है, नौकरी मिल जाती है, तो क्या अनर्थ हो गया? सबसे पहले तो महिला को मनुष्य बनना पड़ेगा। जिस दिन वह देखने लगेगी कि ऐसे जीने में कोई ज़िंदगी नहीं, कोई गरिमा नहीं, उसी दिन यह खत्म होगा। ज़िंदगी में हर वो विषय, जो आपको मनुष्य की बजाय महिला बनाता हो, उसे नकार दीजिए।
इसमें किसी तरह का कोई धार्मिक पक्ष नहीं है कि लड़की को पराया मानो, उसे घर से विदा करो। आप जीवन भर अपनी लड़की को अपने घर रख सकते हैं और यह बात पूरी तरह धार्मिक है। इसमें कोई अधर्म नहीं हो गया। आज आर्थिक तौर पर लड़की-लड़का दोनों बराबर हैं। यदि बराबर हैं तो लड़का भी आ सकता है उसके यहाँ रहने के लिए। कुछ समय वो आ जाए रहने, कुछ समय वो चली जाए। बाकी समय दूर-दूर रहो, अलग रहो, ज़्यादा शांति रहेगी।
तो जो लोग इस बच्ची के देह पर या शक्ल पर अभद्र टिप्पणियाँ कर रहे हैं, उनको पता भी नहीं है कि उनकी उन टिप्पणियों का स्रोत क्या है। इसलिए उठ रही है क्योंकि तुम्हारे घरों में, गली-मोहल्लों में और शहरों में, वास्तव में स्त्रियों के लिए कोई ऊँचा स्थान नहीं है। तुमने उनको यही बना रखा है, घर की सजावट की चीज़ें, घर का सेवक और ये मत कहिएगा ये पुरानी बात है। आज भी बहुत सारे धर्म गुरु और कथा वाचक जो बातें कहते हैं उसमें सुनिए कि महिलाओं के लिए क्या संदेश रहता है कि अगर महिला ने पति की थाली में खा लिया तो पति मर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। लेकिन पति की जूठी थाली में अगर महिला खाएगी तो स्वर्ग पाएगी और पति के अगर पाँव दबाएगी तो घर में लक्ष्मी आएगी। अगर उसे पति के पाँव ही दबाने है तो बोर्ड टॉप करके क्या कर लेगी!
आचार्य प्रशांत: तो हमें बेटियों की चिन्ता हो रही है, होनी भी चाहिए। लेकिन बेटियों की चिन्ता का जो कारण आपके पास है, शायद बेटियों पर जो ख़तरा है वो किसी दूसरे कारण से है। जिस कारण से है, उसकी बात कर लेते हैं।
आप जब कहते हैं कि भारत…
लड़की को पढ़ाई के लिए दो-सौ किलोमीटर दूर भेजना हो तो यही माँ-बाप और भाई कन्नी काट जाते हैं, और ब्याह कर वो दो-हज़ार किलोमीटर दूर जा रही हो इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। और पढ़ाई के लिए जाएगी तो किसी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहेगी, सुरक्षा में रहेगी, हॉस्टल…
कोई किसी के लिए मुफ़्त में कुछ नहीं करता। सिर्फ़ जीवनमुक्त ही किसी के लिए मुफ़्त में कुछ कर सकता है। अगर आपके पति साधारण व्यक्ति हैं, तो वे मुफ़्त में आपको कुछ नहीं दे रहे होंगे। कुछ-न-कुछ व्यापार चल रहा होगा। लेन-देन में जो फँस गया, वह मुक्त कहाँ से हो पाएगा? बस इतना कमा लो कि तुम्हारी रोटी कर्ज़ की न हो।
हेमलेखा की कहानी बड़ी अनूठी है। श्री दत्तात्रेय द्वारा रचित त्रिपुरा रहस्य में उनकी कहानी पढ़ने को मिलती है। एक तपस्वी ऋषि की पुत्री, विद्वत्ता ऐसी कि ऋषिगण आनंदित हो जाते, सौंदर्य ऐसा कि राजे मोहित हो जाते।सभी को हैरान कर देता हेमलेखा का विवेक। शारीरिक सुंदरता का उसे कोई घमंड नहीं था और राजाओं द्वारा विवाह के बदले सुख-सुविधाओं का लालच दिए जाने पर उसका सिर्फ़ एक उत्तर हुआ करता, जो खुशी सिर्फ़ पलभर की है, उसे आप खुशी कैसे मान लेते हैं?
कोई नहीं कहता कि बहन को पढ़ाना है, लिखाना है। ‘आचार्य जी, भाई हूँ, धर्म निभाना है, बहन को स्वावलम्बी बनाना है। बहन अपने पैरों पर खड़ी हो, आज़ाद हो जाए’, कोई आता ही नहीं। क्या समस्या है? ‘बहन की शादी।’ अरे! बहन से पूछ तो लो, शादी वगैरह ये उसका निजी मसला है। निजी कुछ समझते हो? *प्राइवेट*, *पर्सनल* (व्यक्तिगत) *मैटर* (मसला) है ये। या तुम ज़बरदस्ती उसको कहोगे कि ले इसके साथ बाँध रहा हूँ, अब एक कमरे में घुस जा, सुहागरात मना?
ज्ञान है आपकी असली ताकत; आपका कौशल आपकी असली ताकत है; आपने दुनिया कितनी देखी है, ये आपकी असली ताकत है। अगर शरीर की भी सुंदरता की बात करनी है तो शरीर की सुंदरता है शरीर की ताकत, फिटनेस। शरीर ताकतवर रखो, फिट रखो।
इन्होंने पिछड़े वर्ग व महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया, लेकिन अधिकतर लोग इन्हें भूल चुके हैं। इन्होंने आधुनिक भारत के सबसे बड़े शिक्षा आंदोलनों में से एक को, फलने-फूलने की ज़मीन दी, लेकिन आज लोगों को उनका नाम भी नहीं पता। इन्हें भारत की पहली मुस्लिम महिला अध्यापिका…
22 अगस्त 1907 को जर्मनी में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इन्होंने भारत का झंडा फहराया था।
आज़ादी से 40 साल पहले, भारत का झंडा फहराने वाली वे पहली भारतीय बनी। अधिकतम समय उन्होंने भारत से बाहर ही बिताया लेकिन उन्हें आज भी 'भारतीय क्रांति की जननी' कहा जाता है।
हम…
उन्होंने भारतीय स्त्रियों को दयनीय स्थिति से बाहर निकालने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर व्यक्ति दृढ़ निश्चय कर ले तो गरीबी, अभाव, व दुर्दशा की स्थिति पर विजय प्राप्त करके वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।…
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कह रहे हैं कि आप कहते हैं कि महिलाओं का कमाना उनकी आन्तरिक और भौतिक प्रगति के लिए ज़रूरी है, पर हमारी प्राचीन देवियाँ जैसे माँ सीता, देवी अनुसुइया, यहाँ तक कि साध्वियाँ जैसे मीराबाई भी कभी कमाती तो नहीं थीं, तो क्या वो सब…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! ये मेरा पहला सत्र है आपके साथ में, और पहली बार भी। बात करने का मौक़ा भी मिल गया। तो मैं बहुत खुश हूँ इस बात को ले के। सवाल इस प्रकार जब मैं आयी थी यहाँ पर तो मैं लेकर नहीं आई थी। मेरा एकमात्र…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। जो सवाल मैं पूछना चाहती थी, वह सवाल किसी दोस्त ने ही पूछ लिया। एक बहुत गर्व की बात लगती है और हर्ष की बात है कि हमारे जो चैनल्स हैं, उसके सब्सक्राइबर्स और व्यूअर्स की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बहुत खुशी होती है…
आचार्य प्रशांत: जो ये सारा छवि बचाने का खेल है, ये माल के लालच का खेल है।
ये जो पूरी बात ही है कि समाज में अपनी छवि अच्छी रहे, इज्ज़त ऊँची रहे, समझिए अच्छे से, कि वो बात पूरे तरीक़े से भौतिक है, मटेरियल है। भौतिक है, मटेरियल है।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जहाँ से मैं आती हूँ उस समाज में जनमानस के बीच ऐसी धारणा हैं कि एक स्त्री को पुरुष की अधीनता में रहकर जीना चाहिए। स्त्री के अस्तित्व को पूरे तरीक़े से एक कोने में रख दिया जाता है। यह समझा जाता है कि…
आचार्य प्रशांत जी आपका बहुत बहुत स्वागत है। सर,…