नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: कल रात दो बजे एक महिला का ईमेल आया है। उन्होंने आपकी एक पुस्तक पढ़ी है दुर्गा सप्तशती और उससे उन्होंने जिज्ञासा भेजी है, काफ़ी लंबी-चौड़ी, अंग्रेज़ी में। तो वो कह रही हैं कि देवी के जो सारे स्वरूप हैं, चाहे वो महाकाली हों, महालक्ष्मी हों या महासरस्वती, वो जब असुरों का संहार करती हैं तो उसके बाद प्रकृति अपने शीतल स्वरूप में वापस आ जाती है। जैसे बताते हैं कि हवा का प्रवाह शीतल हो जाता है, नदियों का बहाव ठीक हो जाता है, तो उसी से जुड़े हुए दो सवाल हैं। पूछ रही हैं कि असुर भी प्रकृति का ही रूप है और देवी भी प्रकृति का ही रूप है, तो क्या ये प्रकृति अपने आप से ही लड़कर स्वयं को बचाने की कोशिश नहीं कर रही है? मैं दोबारा पढ़ूँ?
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, समझ गए, समझ गए। ठीक है। और कुछ है, या ये ही है?
प्रश्नकर्ता: हाँ, उसके अलावा एक और प्रश्न है। कह रही हैं कि मानवता के बचे रहने के लिए प्रकृति को विस्तार लेने देना, उसे बचाना, फ़िज़ूल नहीं है क्या? क्योंकि प्रकृति जितना विस्तार लेगी, उतना ही अटैचमेंट और डिस्ट्रकशन और भी बढ़ते रहेंगे।







