आचार्य प्रशांत: कुर्बानी, बलि, माँसाहार, इसको लेकर पिछले दिनों मैंने एक बात-चीत शुरु करी है, वो बढ़िया आगे बढ़ रही है। तो उसमें बहुत लोगों के सवाल आये हैं, आपत्तियाँ भी आयीं हैं। और एक सजीव ज़ोरदार चर्चा चल रही है। मैं समझता हूँ ऐसे संवाद बहुत ज़रूरी हैं गम्भीर मुद्दों पर, तो कुछ जो बातें उठी हैं उनको मैं अभी लेता हूँ।
प्रश्नकर्ता: सत्य तो ये है कि "जीव जीवस्य भोजनम्"। और वनस्पतियाँ भी तो प्राणवान हैं। माँस और वनस्पति बस दो अलग-अलग नाम हैं। सत्य यही है कि दोनों एक प्रकार से एक से जीव ही हैं।
आचार्य: "जीव जीवस्य भोजनम्"। कह रहे हैं, ‘जीव जीव का भोजन बनता है।’ पहली बात तो इन्होंने ये कही, और दूसरा कह रहे हैं, ‘वनस्पतियों में, पेड़-पौधों में भी तो जान होती है तो पेड़-पौधे हों या पशु-पक्षी हों, सब एक बराबर हैं क्योंकि सब जीव हैं।’ ‘जीव, जीव का भोजन बनता है और सब जीव एक समान ही होते हैं’ तो तुम भी तो एक जीव हो न, और तुम्हारा भाई भी एक जीव है, सब इंसान भी जीव हैं, माँ-बाप भी जीव हैं, हमारे बच्चे भी जीव हैं, सब जीव हैं उनको क्यों नहीं खा जाते? अगर बात इतनी सीधी होती कि एक जीव दूसरे जीव का आहार है। और सब जीव बराबर हैं तो कोई भी जीव फिर खाया जा सकता है।
मैं कह रहा हूँ, पहला जीव तो तुम खुद ही हो खुद को क्यों नहीं खा जाते? खुद को खाकर बोलो "जीव जीवस्य भोजनम्"। एक जीव ने स्वयं को ही खा लिया है। जीव ने जीव को खा लिया। "जीव जीवस्य भोजनम्" क्यों नहीं बोलते? क्योंकि बात इतनी सीधी नहीं है कि "जीव जीवस्य भोजनम्"। तुम देखते हो कौनसा जीव खाने लायक है, कौनसा जीव खाने लायक नहीं है। तुम चुनाव करते हो, तुम कहीं पर एक सीमा खींचते हो कि साहब ये जो जीव है ये मैं खाऊँगा और ये जो जीव है ये मैं नहीं खाऊँगा।
ये जो चुनाव की बात है न चुनना, किसी चीज़ को ‘हाँ’ बोलना और किसी चीज़ को ‘न’ बोलना। ये चेतना का काम है, कॉन्शियसनेस




