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आदर्श, शिक्षित, सुसंस्कृत उत्तर भारतीय घर || आचार्य प्रशांत
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: तो हमें बेटियों की चिन्ता हो रही है, होनी भी चाहिए। लेकिन बेटियों की चिन्ता का जो कारण आपके पास है, शायद बेटियों पर जो ख़तरा है वो किसी दूसरे कारण से है। जिस कारण से है, उसकी बात कर लेते हैं।

आप जब कहते हैं कि भारत में लड़कियों को, बेटियों को ख़तरा है; आप एक बेटी के बाप हैं, आपकी चिन्ता मैं समझ सकता हूँ, जायज़ है।

भारत में बहुत सारी बेटियाँ सचमुच गायब हुईं हैं! छोटी बच्चियाँ, बहुत छोटी बच्चियाँ, जितना आप सोच नहीं सकते उससे ज़्यादा छोटी बच्चियाँ! पिछले बीस सालों में, वो गायब हुईं हैं, भारतीय बच्चियाँ और खासकर हिंदू बच्चियाँ।

ये चीज़ ऐसी है, जो न जाने कितने दशकों पहले शुरू हुई थी और चलती ही जा रही है। ख़त्म होने का तो छोड़िए, मैं कह रहा हूँ इसकी गति बढ़ती ही जा रही है और हम इसकी कोई बात नहीं कर रहे!

कौन कर रहे हैं लोग ये काम? ये काम कौनसे लोग कर रहे हैं? तो ये काम हमारे उत्तर भारतीय लोग कर रहे हैं, ये काम दक्षिण में नहीं हो रहा और पूरब में नहीं हो रहा है। ये काम दक्षिण में और पूर्व में नहीं हो रहा है। ये काम कहाँ हो रहा है? ये उत्तर भारत में हो रहा है। उत्तर भारत में और साथ में जो पश्चिमी हमारे प्रान्त हैं, जैसे कि गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, वहाँ पर हो रहा है।

कौनसे हुए ये प्रान्त जब हम कह रहें हैं कि जहाँ पर लड़कियों की हत्याएँ हो रहीं हैं? हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र ये वो जगहें हैं। और यही वो जगहें हैं जहाँ सबसे ज़्यादा शोर मचता है कि ‘अरे-अरे-अरे! हमारी हिंदू बेटियाँ ख़तरे में हैं,' और यही वो जगहें हैं जहाँ पर जो हिंदू समाज है वो खुद अपनी बेटियों की हत्या करने में लगा हुआ है!

कौनसे प्रान्त हैं जहाँ बेटियों की हत्याएँ नहीं हो रहीं हैं, जहाँ बेटियाँ सबसे ज़्यादा सुरक्षित हैं बल्कि? वो हैं भारत के पूर्वी जितने प्रान्त हैं, जो नॉर्थईस्ट (पूर्वोत्तर) की सेवेन सिस्टर्स (सात बहनें कहलाने वाले राज्यों का समूह) हैं वो सब छोटे-छोटे प्रान्त, बंगाल भी थोड़ा ठीक है और दक्षिण भारत ठीक है। दक्षिण भारत ठीक है माने तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, केरल, कर्नाटक; ये ठीक हैं। ये सब ठीक हैं।

और वो काम (बेटियों की हत्या) किसने करा है? वो काम करा है पंजाब वालों ने, हरियाणा वालों ने, यू.पी (उत्तर प्रदेश) वालों ने, राजस्थान वालों ने, महाराष्ट्र वालों ने!

इन राज्यों में साझा क्या है देख लीजिए, और इन राज्यों के भी कौनसे लोग हैं जो ये काम कर रहें हैं, (देख लीजिए) — गरीब लोग नहीं ये काम कर रहे, मध्यम वर्ग ये काम कर रहा है। अशिक्षित लोग काम नहीं कर रहे ये, ये पढ़े लिखे लोग (कर रहे हैं)। और हाँ, इसमें एक चीज़ आप और जोड़ सकते हैं–

आय से, जो कमानेवाले लोग हैं वो ये काम कर रहें हैं! शिक्षा से, जो पढ़े-लिखे लोग हैं वो ये काम कर रहें हैं! जाति से, जो अपनेआप को ऊँची जातियों का बोलते हैं वो लोग ये काम कर रहें हैं! देश में, भौगोलिक दृष्टि से जो लोग उत्तर भारत में रहते हैं या पश्चिमी भारत में रहते हैं वो ये काम कर रहें हैं! और गाँवों में ये काम बहुत कम हो रहा है, ये काम शहरों में हो रहा है। बिलकुल ख़तरे में हैं भारत की बच्चियाँ, पर ख़तरा कहाँ से है ये तो समझिए!

तो अमर्त्य सेन ने इसपर रिसर्च (अनुसंधान) करी थी, लेकिन वो रिसर्च सिर्फ़ भारत पर नहीं थी, उन्होंने कहा था कि एक करोड़ नहीं, सौ मिलियन माने दस करोड़ महिलाएँ गायब हैं आबादी से, उनकी हत्या कर दी गयी है, गर्भ में ही मार दिया या पैदा होते ही मार दिया। कहाँ से? भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और नॉर्थ अफ्रीका मिलाकर के दस करोड़!

अब वो दस करोड़ का आँकड़ा बहुत बड़ा हो जाता है और भारत से बाहर का है। मैं सिर्फ़ भारत की बात कर रहा हूँ क्योंकि अभी सवाल उठा था भारत की बच्चियों के बारे में। मैं भारत की बच्चियों की बात कर रहा हूँ, भारत की बच्चियाँ इतनी (एक करोड़ से ज़्यादा— बोर्ड पर आंकड़े दिखाते हुए) सिर्फ़ पिछले बीस साल में! तो कोई ये न कहें कि भारत ने सिर्फ़ अपनी एक करोड़ बेटियों को मारा है। एक करोड़ बेटियों को मारा है, बोलिए— सिर्फ़ बीस साल में मारा है! और अगर आज़ादी के पिछहत्तर साल लोगे, तो भारत ने दो-तीन-चार न जाने कितने करोड़ अपनी बेटियाँ मार दीं हैं।

इसमें एक चीज़ और देखिए कि वो कितने बड़े परिवारों में हैं? और बिलकुल सीट-बेल्ट (कुर्सी की पेटी) बाँध लीजिए क्योंकि बहुत ज़ोर से चौंकने वाले हैं।

जितनी छोटी होती है परिवार की संख्या, उतना ज़्यादा उसमें लड़कियाँ मारी जा रही हैं। मतलब ये कि अगर घर में सिर्फ़ एक या दो बच्चे हैं, तो ऐसे घर में जो सेक्स रेशियो (लिंग अनुपात) है, मान लीजिए एक से दो ले लीजिए, मुझे इसके लिए डेटा (आँकड़े) चाहिए होगा, डेटा बताइए।

प्रश्नकर्ता: दो हज़ार ग्यारह के सेनसस (जनगणना) के हिसाब से…

आचार्य: ये दो हज़ार ग्यारह का है।

प्र: अगर हर घर में एक बच्चा है।

आचार्य: अच्छा! एक से दो नहीं, एक ही बच्चा है।

प्र: जी, तो सेक्स रेशियो (लिंग अनुपात) है सात सौ बयासी।

आचार्य: सात सौ बयासी! सात सौ बयासी का मतलब समझते हैं क्या हुआ? हज़ार में कितनी मार दीं लड़कियाँ? सात सौ बयासी मतलब? हज़ार लड़कों पर सात सौ बयासी लड़कियाँ। हज़ार लड़कों पर सात सौ बयासी लड़कियाँ।

तो कितनी मार दीं लड़कियाँ? दो सौ? फ़िर से बोलिए, हज़ार में दो सौ अठारह, (तो) सौ में कितनी? बाईस। इक्कीस दशमलव आठ, सौ में से बाईस लड़कियाँ मार दीं!

प्र: सर, इसमें एक बात और है कि जो नेचुरल बर्थ रेट (प्राकृतिक जन्म दर) होता है..

आचार्य: हाँ उसमें थोड़ा अन्तर होता है पर अभी हम उसको एक साधारण तरीके से लेते हैं। तो नेचरल बर्थ रेट होता है, तो वो ऐसा नहीं होता कि सौ लड़कों पर सौ ही लड़कियाँ पैदा होंगी, वो ऐसा होता है कि अगर सौ लड़कियाँ पैदा हो रहीं हैं, तो प्रकृति ने ही ऐसा कर रखा है कि उसपर एक-सौ-पाँच लड़के पैदा होते हैं।

अगर सौ लड़कियाँ पैदा होती हैं, तो ये प्राकृतिक व्यवस्था है पूरे विश्व में, कि उसपर लड़के एक-सौ-पाँच पैदा होते हैं। क्यों पैदा होते हैं? क्योंकि लड़कियाँ प्रकृति ने ज़्यादा मज़बूत बनायी हैं, वो प्रकृति का प्रेफर्ड जेन्डर (पसंदीदा लिंग) होती है।

तो ये जो लड़के पैदा होते हैं, इन्हें प्राकृतिक मृत्यु थोड़ी ज़्यादा आती है। तो जब बच्चे छोटे होते हैं एकदम, तो उनमे जो रेशियो (अनुपात) मिलेगा, कहीं पर भी, अगर कोई उनके साथ अन्याय न हुआ हो, तो वो मिलेगा एक-सौ-पाँच और सौ का, एक-सौ-पाँच क्या? लड़के, और सौ क्या? लड़कियाँ।

लेकिन जब तक वो बच्चे तीन-चार साल की उम्र तक पहुँचेंगे, वो बराबर हो जाएगा, क्योंकि लड़के जेनेटिक्ली (आनुवांशिक रूप से) लड़कियों की अपेक्षा कमज़ोर होते हैं, तो लड़के ज़्यादा मरते हैं लड़कियाँ कम मरती हैं।पर अभी इस चर्चा के लिए, अभी यही मान लीजिए कि हज़ार लड़कों पर हज़ार लड़कियाँ हैं।

तो हम कह रहें हैं सात सौ बयासी हैं, सात सौ बयासी पर हमने कहा दो सौ अठारह लड़कियाँ मारी गयीं। दो सौ अठारह मत मानिए, दो सौ मान लीजिए। दो सौ।

अगर घर में सिर्फ़ एक बच्चा है, तो बहुत-बहुत ज़्यादा सम्भावना है कि वो लड़का ही होगा। कैसे होता है ऐसा? क्योंकि प्रकृति तो लड़के-लड़की लगभग समान अनुपात में पैदा करती है? ऐसा कैसे होता है कि अगर घर मे़ सिर्फ़ एक बच्चा है तो हज़ार लड़कों पर सिर्फ़ सात सौ बयासी लड़कियाँ होती हैं। कहाँ गयी वो लड़कियाँ बाकी? वो मार दीं गयीं। आगे?

प्र: यदि घर में दो बच्चें हैं, तो सेक्स रेशियो (लिंग अनुपात) है सात सौ बीस।

आचार्य: एक पे सात सौ बयासी है।

प्र: जी।

आचार्य: दो पर सात सौ बीस? और कम हो गया है?

प्र: जी।

आचार्य: और?

प्र: यदि तीन बच्चे हैं, तो है आठ सौ चौदह। और यदि चार बच्चे हैं तो नौ सौ चौवालिस।

आचार्य: चार बच्चे हैं तो नौ सौ?

प्र: चवालिस, नौ सौ चौवालिस। और यदि पाँच बच्चे हैं तो है एक हज़ार पाँच, और इसके बाद भारत का जो पूरा ओवरऑल (औसतन) सेक्स रेशियो था, (वर्ष) दो हज़ार ग्यारह सेन्सस (जनगणना) के हिसाब से वो था आठ सौ नब्बे।

आचार्य: औसत आ गया आठ सौ नब्बे का। इसे (आंकड़े) देखते ही आप लोगों को क्या समझ में आ रहा है? आपलोग बोलिए। लीजिए, आंसर (उत्तर) माइक में बोलिए।

प्र: न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) में हमें ज़्यादा होते हुए दिख रहा है, क्योंकि फिफ्थ (पाँचवे) तक आया तब तक उसकी आय कम भी हो गयी है और...

आचार्य: हम बोलते हैं शिक्षा से इन्सान बेहतर होता है, शिक्षा से बेहतर हो रहा है क्या? पढ़े-लिखे लोग ज़्यादा मार रहें हैं। हम बोलते हैं पैसा आ जाता है, तो इन्सान की सोच थोड़ी आधुनिक और परिपक्व हो जाती है, मैच्योर एंड मॉर्डन (आधुनिक और परिपक्व) हो जाती है, ऐसा हो रहा है क्या? पैसा आ रहा है, शिक्षा आ रही है, इन्सान और मार रहा है अपनी लड़कियों को।

हम कहते हैं भारत दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र है, अब तो ये भी बोलने लगे हैं कि ‘इन्डिया इज़ नाव अ मैच्योर डेमोक्रेसी' (भारत अब एक परिपक्व लोकतंत्र है), पिछहत्तर साल हो गये भई आज़ादी के!

एक मैच्योर डेमोक्रेसी (परिपक्व लोकतंत्र) में मीडिया, जो सबसे बड़ा मुद्दा है उसको छुपाकर रखता है क्या? पूछिए? बताइए? और आपको कौन-से मुद्दे चटाता है मीडिया दिन-रात? ये भी देखिए!

मैं कहा करता हूँ, जो भी मीडिया चैनल दुनिया के सबसे बड़े मुद्दों की बात करने की जगह आपके सामने सनसनीख़ेज़ और चटपटी और मसालेदार, टुच्ची ख़बरें लेकर के आये, जान लीजिए कि ये सुनने लायक, देखने लायक, पढ़ने लायक है नहीं।

प्र२: नमस्ते आचार्य जी, मैं गुजरात से आयी हूँ। गुजरात में काफी ज़्यादा कन्ज़रवेटिव एनवायरमेन्ट (रूढ़िवादी माहौल) रहता है।

वहाँ स्त्रियाँ ही हैं, जो स्त्री का जीवन है वो ख़राब कर रहीं हैं। जैसे, मेरी सास ही मुझे बोलती है कि अब बच्चा कर लो। तो इसी वजह से बोलती है कि ‘मैंने भी दो-तीन कर लिये हैं, तू भी एक-दो कर ले।' तो ये ऐसा हो गया है कि 'मैंने भी कर ही लिया है, मैं भुगत रही हूँ, अब तुम भी कर लो।’

मैं तो वही बोल देती हूँ कि ‘आपने किया है तो इसका मतलब नहीं है कि मुझे भी करना है।' और कभी मेरे ससुर नहीं बोलते हैं कि 'आप बच्चा कर लो,' सास ही बोलती है।

तो जैसा आपने बताया है कि ये स्त्रियाँ ही हैं, जो स्त्री का जीवन है वो ख़राब कर रहीं हैं और वही हमें समझना है।

और ये ज़्यादातर हाउज़ वाइव्स (गृहणियाँ) ही बोलती हैं जॉब (नौकरी) करने वाले को कि ‘कैसे छोटे बाल रखती है, देर रात तक मीटिंग में रहती है, हस्बैंड (पति) खाना बनाते हैं’ इत्यादि— तो इन सबको इग्नोर (उपेक्षा) करना ही मुझे लगता है अध्यात्म है?

आचार्य: देखिए, जहाँ कहीं भी रूढ़िवादिता ज़्यादा होगी वहाँ स्त्रियों की दुर्दशा होगी। जहाँ कहीं भी रूढ़िवादिता, परम्परावादिता ज़्यादा होगी, वहाँ स्त्रियों की दुर्दशा होगी ही होगी, हत्या भी होगी उनकी, उनके ख़िलाफ अपराध भी होंगे। और जहाँ कहीं मुक्त विचार होगा, मुक्त वातावरण होगा, वहाँ पर महिलाओं की हर तरीके से तरक्की होगी।

न्यूज़ीलैंड की महिला प्रधानमंत्री रहीं, उनके बारे में आप जानते ही हैं, हाल तक थीं। वहाँ की संसद में पचास प्रतिशत से थोड़ी-सी ज़्यादा हैं महिलाएँ। खुले विचारों का देश है।

वहाँ जो पुरानी लकीर है, वही नहीं पीटी जा रही कि पुराने रास्ते चलने हैं, पुराने रास्ते पर चलना है, पुराने रास्ते पर चलना है। अध्यात्म का अर्थ पुराना रास्ता नहीं होता, अध्यात्म एकदम नई चीज़ होता है। लेकिन हम क्या करते हैं कि हम परम्परा को मानने लग जाते हैं कि परम्परा ही तो धर्म है।

परम्परा धर्म नहीं होती। धर्म बिलकुल अलग बात होती है। आप पीढ़ियों से जो करते आ रहे हो, उसको थोड़े ही धर्म बोलते हैं। जहाँ कहीं भी ये सब चलेगा न कि पीढ़ियों से जो होता आ रहा है वही करना है, वहाँ महिलाओं की दुर्दशा ही होगी।

दुनिया में ऐसे सिर्फ़ छह देश हैं, जहाँ की संसद में महिलाओं की भागीदारी पचास प्रतिशत की है और वो सब के सब वही देश हैं जहाँ विचार की पूरी छूट है, जहाँ अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है, जहाँ महिलाओं को हर तरीके से, कानूनी तरीके से भी और सामाजिक, मानसिक तरीके से भी पूरी आज़ादी है अपनी पसंद का जीवन जीने की।

और उन देशों में क्राइम रेट (अपराध दर) भी कम है और उन देशों में पॉल्यूशन (प्रदूषण) भी कम है, वो देश डेवेलपमेन्ट (विकास) के सारे इंडिकेटर्स (सूचकांक) पर सबसे आगे भी हैं। जिन देशों में महिलाओं की तरक्की हो रही है, उन देशों में ये पाया गया है कि हर तरीके से देश की तरक्की हो रही है।

और जिन देशों ने धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण अपनी महिलाओं को ही दबा दिया है, वो देश हर तरीके से पिछड़े हैं और पिछड़ते ही जा रहें हैं और मुझे डर ये लग रहा है कि हमारा भारत भी क्या उन्हीं देशों में शामिल हो रहा है?

जहाँ कहीं भी रूढ़िवादिता, परम्परावादिता ज़्यादा होगी, वहाँ स्त्रियों की दुर्दशा होगी ही होगी, हत्या भी होगी उनकी, उनके ख़िलाफ अपराध भी होंगे। और, जहाँ कहीं मुक्त विचार होगा, मुक्त वातावरण होगा, वहाँ पर महिलाओं की हर तरीके से तरक्की होगी।

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