
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, क्लाइमेट चेंज का असर जो है अब साफ़-साफ़ दिखने लगा है हम लोगों को। और हम लोग इसका इलाज बहुत सतही तौर पर कर रहे हैं, जैसे कि पेड़ लगाना हो गया और पुराने कपड़े बार-बार पहनना। और कई जगह तो ऐसा भी होता है, मैंने देखा व्हाट्सऐप स्टेटस पर जीमेल डिलीट करने के लिए कह रहे हैं, जो पुराने ज़माने के जीमेल होते हैं।
आचार्य प्रशांत: अच्छा मेल स्टोरेज फ्री कर दो।
प्रश्नकर्ता: जी, बिल्कुल। उसको डिलीट करने के लिए बोल रहे हैं। और वीगन मूवमेंट में ये भी देख रहा हूँ कि मीटलेस मंडे(सोमवार) मना रहे हैं, कि मंडे(सोमवार) के दिन मीट मत खाओ, तो पर्यावरण थोड़ा बचा रहेगा ऐसा। और इतना करके सोच रहे हैं कि ये काफ़ी है। सही है, सही चलेगा अगर ऐसा करते रहे तो। और इसके लिए एक टर्म आया है — ग्रीनवॉशिंग।
जी, तो इसका इलाज क्या है, आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: इलाज क्या है, ग्रीनवॉशिंग टर्म ही बता रहा है ना। जैसे ब्रेनवॉशिंग होता है, जैसे व्हाइटवॉशिंग होता है। व्हाइट वॉश करना माने क्या होता है? कि किसी चीज़ में जो दाग-धब्बे हैं उनको बस छुपा दिया, उसके ऊपर सफेद रंग पोत दिया ताकि जो गड़बड़ थी, वो छुप जाए। ये क्या होती है? व्हाइटवॉशिंग।
ब्रेनवॉशिंग क्या होती है? कि असलियत कुछ और है, पर दिमाग़ में कोई मान्यता भर दी। दिमाग़ में कोई विचार, धारणा भर दिया। किसी चीज़ से पूरा दिमाग़ जो है, ब्रेन है, वो भर डाला ताकि सच्चाई छुप जाए, तो ऐसी ही ग्रीनवॉशिंग है।
ग्रीनवॉशिंग का मतलब होता है कि जो चीज़ पर्यावरण की बहुत कम मदद कर पाएगी या कोई मदद नहीं कर पाएगी, उसको ऐसे प्रदर्शित करना जैसे वो पर्यावरण के लिए बड़ी अच्छी हो, हितकारी हो, ये ग्रीनवॉशिंग कहलाती है।
क्यों?
क्योंकि आम आदमी को और तो कुछ पता है नहीं पर्यावरण के बारे में, पर इतना वो अब हर जगह से सुन रहा है 20 साल से, कि पर्यावरण ख़तरे में है। ठीक है ना? यहाँ तक कि उसके घर के छोटे बच्चे भी उसको बता देते हैं, कि हमने आज अपनी टेक्स्टबुक में पढ़ा कि एनवायरमेंट इज़ इन डेंजर। पर्यावरण ख़तरे में है।
तो ये जो ग्रीन शब्द है, ग्रीन माने इको-फ्रेंडली। ठीक है? इको-फ्रेंडली। जो ग्रीन शब्द है, ये फैशनेबल बन गया है। प्रचलन में आ गया है कि फ़लानी चीज़ ग्रीन है।* तो हर आदमी कहता है कि, “भाई, मुझे भी थोड़ा नैतिक बने रहना है। नीड टू बी ऑन द राइट साइड ऑफ मोरालिटी। तो मैं भी ये दिखाऊँ कि मैं भी इकोलॉजी के लिए, एनवायरमेंट के लिए कुछ कर रहा हूँ।” है ना?
ये एक नए तरीक़े का प्रचलन है, फैशन है, कि ये दिखाना कि देखो मुझ में भी पर्यावरण के प्रति कुछ संवेदनशीलता है। और जो करना, वो ऐसा हो कि शून्य महत्त्व का हो या बहुत कम महत्त्व का हो, पर दिखाना ऐसा जैसे बहुत बड़ा काम कर दिया हो, ये कहलाता है ग्रीनवॉशिंग। एक तरह की धोखेबाज़ी है ये, पाखंड है।
जब मैं छात्र था उस समय पर, ओज़ोन लेयर में बहुत बड़ा छेद हो गया था, एक फुटबॉल स्टेडियम से ज़्यादा बड़ा। और उससे जो अल्ट्रावायलेट रेज़ आती थीं, कैंसर का ख़तरा बढ़ गया था, ये सब था। तो वो होता था ज़्यादातर जो क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स होते हैं, उनके एमिशन से तो वो बैन कर दिए गए और वहाँ पर एक ही कारण था, कि जो सीएफसीज़ होते थे (क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स) — वही कारण था, उनको बैन कर दो। तो वो जो छेद था, उसका बढ़ना रुक गया, वो समस्या सुलझ गई।
वो समस्या कार्बन जैसी नहीं थी, क्योंकि ये जो सीएफसीज़ थे, ये लगातार बने नहीं रहते हैं एनवायरनमेंट में, हवा में, ऐटमॉस्फ़ियर में। तो बहुत छोटी समस्या थी, वो हल कर ली। मैं ये बता किस लिए रहा हूँ? बता इसलिए रहा हूँ कि आज भी मार्केट्स में ऐसे प्रोडक्ट्स आते हैं जिनमें लिखा रहता है — सीएफसी-फ्री! भाई, सीएफसी-फ्री क्या बता रहे हो, सीएफसी तो लीगली बैन है! सीएफसी तो हो ही नहीं सकता तुम्हारे प्रोडक्ट में। तो सीएफसी-फ्री बताकर नंबर किस बात के उठा रहे हो? सीएफसी बताकर श्रेय, क्रेडिट किस बात का ले रहे हो? ये ग्रीनवॉशिंग है एक तरह की, कि जहाँ करा कुछ नहीं है पर क्रेडिट लेना है। क्या बता दिया? सीएफसी-फ्री!
या ऐसे समझ लो कि मीट का पैकेट है, और उस पर लिखा हुआ है, इको-फ्रेंडली! इको-फ्रेंडली क्यों लिखा है? क्योंकि वो लोग पहले उसमें प्लास्टिक की भी रैपिंग करते थे। अब वो प्लास्टिक की नहीं कर रहे हैं। तो उन्होंने कह दिया कि ये हमारा इको-फ्रेंडली हो गया। कैसे हो गया? अंदर तो मीट है, जो सबसे ज़्यादा पर्यावरण के लिए ख़तरनाक है। वो चीज़ अंदर है। पर ऊपर एक छोटी सी चीज़ कर दी, कि थोड़ा सा प्लास्टिक हटा दिया और क्या कह दिया? कि "हम भी इको-फ्रेंडली हैं। हम भी इको-फ्रेंडली हैं।" बात समझ में आ रही है?
या कि कोई कंपनी ने बोल दिया कि "साहब, हम फलाने तरीक़े से इको-फ्रेंडली हो गए।" कैसे इको-फ्रेंडली हो गए, कुछ भी। क्या क़दम उठाती हैं कंपनियाँ आमतौर पर अपने आप को इको-फ्रेंडली दिखाने के लिए?
श्रोता: रिसाइक्लिंग करवाने देंगे।
आचार्य प्रशांत: हाँ, कि हमारे यहाँ पर जो ऑफ़िस वेस्ट होता है, हम उसकी ऐसे रिसाइक्लिंग कर देते हैं। और ये कंपनी भी बोलने लग गई कि "हम भी इको-फ्रेंडली हैं।"
हक़ीक़त ये है कि तुम्हारा जो कोर वर्क है ऐज़ अ कंपनी, ऐज़ ऐन ऑर्गेनाइज़ेशन, तुम्हारा काम ही है इकोलॉजी का डिस्ट्रक्शन। लेकिन तुम्हारे जो एम्प्लॉईज़ आते हैं, उनका जो वेस्ट होता है ऑफ़िस में, उसकी तुमने रिसाइक्लिंग करवा कर के इतना बड़ा एक बैनर छपवा दिया। अपने आप को सर्टिफ़िकेट दे दिया कि "तुम भी इको-फ्रेंडली हो," ये सब कहलाता है, ग्रीनवॉशिंग।
दूसरे को बेवकूफ़ बनाना या ख़ुद को बेवकूफ़ बनाना, ये जताकर के कि "हम भी पर्यावरण की चिंता करते हैं।" ग्रीनवॉशिंग में जो एक बहुत बड़ी चीज़ होती है, वो होती है — पेड़ लगाना कि "हम तो पेड़ लगाते हैं, हम तो पेड़ लगाते हैं।" और आम आदमी के मन में अभी भी ये कहीं से भावना बैठी हुई है, कि क्लाइमेट चेंज को पेड़ लगाकर रोका जा सकता है, या कि पेड़ लगाने से क्लाइमेट चेंज के रुकने का कुछ संबंध है। बहुत, बहुत कम संबंध है।
पेड़ लगाना, बहुत बड़ी ग्रीनवॉशिंग है। और ये मुश्किल नहीं होना चाहिए देखना, क्योंकि जितनी भी बातें हमें बताई जा रही हैं कि "ये करो तो क्लाइमेट चेंज रुकेगा, वो करो तो क्लाइमेट चेंज रुकेगा" ऐसा है, वैसा है; वो सारी बातें कितना कार्बन फुटप्रिंट रखती हैं, ये आप तुरंत इंटरनेट से जान सकते हो। और आप ये भी जानते हो कि दुनिया का कार्बन एमिशन कितना है और कितना घटाना है। सारे आँकड़े मौजूद हैं। उसमें कोई बहुत भारी गणित नहीं लगनी है, सीधा-सीधा प्लस-माइनस का हिसाब है। जोड़ लो या गुणा कर लो या भाग दे दो, सब दिख जाएगा। सब पता है तुम्हें।
लेकिन हम जानना ही नहीं चाहते। क्यों नहीं जानना चाहते? ताकि छोटी चीज़ को भी हम बड़ा प्रदर्शित कर सकें और उसका श्रेय ले सकें।
एक पेड़ आप लगाते हो। अगर वो पेड़ बचा रहा, उसके बचने की संभावना, ये जो आम आदमी जो पेड़ लगाता है उस पेड़ की प्रजाति के नेटिव होने की संभावना, और फिर उसके बचे रहने की संभावना — 5% से 10% होती है। आपने पेड़ लगा दिया, वो 20 साल लगता है उसको पूरा एक मदमस्त वृक्ष बनने में, इतना समय लगता है। अब कुछ प्रजातियाँ ऐसी भी होती हैं, जो मान लो 10 साल में ही पूरा एकदम वयस्क वृक्ष बन जाएँ, पर उसके इतना बचे रहने की संभावना ही 5% से 10% है। वो नहीं बचा रहेगा।
बचा भी रहेगा, तो ज़रूरी नहीं कि आपने सही प्रजाति लगाई हो। सब कुछ ठीक चला, प्रजाति भी सही थी, बचा भी रह गया तो 20 साल बाद वो जो पेड़ है, वो प्रति वर्ष 20 किलो कार्बन डाइऑक्साइड सोखेगा। और जो आम भारतीय है, मध्यमवर्गीय जो भारतीय है, ये प्रति वर्ष 5000 किलो कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है।
जब तक वो पेड़ बड़ा होगा, तब तक 20 साल में आपने 5000 × 20 (5000 किलो कार्बन डाइऑक्साइड प्रति वर्ष, 20 सालों तक), तो 5000 × 20 कितना होता है? आपने 1,00,000 किलो कार्बन डाइऑक्साइड एमिट कर रखी होगी। और पेड़ सोखता है 20 किलो प्रति वर्ष।
आपने 1 लाख किलो पहले ही एमिट कर रखी है, और उसके बाद आप 5000 किलो प्रति वर्ष और एमिट कर रहे हो, और भारत एक विकासशील देश है इसीलिए साल दर साल आपका एमिशन बढ़ा ही जा रहा है। आज अगर आप 5000 किलो एमिट कर रहे हो (मैं एक भारतीय मध्यमवर्गीय व्यक्ति को ले रहा हूँ), आप आज अगर 5000 किलो एमिट कर रहे हो, तो जैसे आपके लक्षण हैं आप 20 साल बाद कम से कम 20,000 किलो एमिट कर रहे होगे। और पेड़ बेचारा सोखेगा एक साल में 20 किलो, वो भी तब अगर जी गया 20 साल।
लेकिन एक पेड़ लगाकर आप अपने आप को फन्ने खां मानते हो। आप कहते हो, “देखा, मैंने पाँच पेड़ लगाए।” तुम्हारे पाँच पेड़ लगाने से क्या हो जाएगा? और तुम पेड़ ऐसी जगह लगा रहे हो जहाँ सींचने के लिए पानी भी पंप चढ़ाकर आता है। माने, सींचने के लिए पानी भी कार्बन एमिशन से आता है। जहाँ तुम पेड़ लगा रहे हो, तुम लगाओगे तो सींचोगे। जंगल में पेड़ होता है, तो सींचना नहीं पड़ता है।
तुम्हारे इस पेड़ लगाने की कोई हैसियत है?
लेकिन लोग बड़े पर्यावरण-मित्र बने जा रहे हैं, पेड़ लगा-लगा के। तुम 5 नहीं, तुम 20 नहीं, तुम 100 पेड़ भी लगा दो, तुम 500 पेड़ भी लगा दो, उससे भी कुछ नहीं होगा। जो तुम्हारी पूरी जीवनशैली है वही जंगलों को काटने पर आधारित है। एक बार थोड़ा गणित कर लेना।
पृथ्वी इस वक़्त, पृथ्वी माने इंसान जो पृथ्वी पर है; इस वक़्त जितना कार्बन डाइऑक्साइड आ गया है वातावरण में तो आ ही गया है; उसके ऊपर से, प्रतिवर्ष 56 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट वातावरण में हम जोड़ रहे हैं। जो पहले से है, वो तो है ही, हम उसकी नहीं बात कर रहे। जो पहले से ही हमने करतूत कर डाली उसको हटाओ, उसके ऊपर से 56 गीगाटन प्रतिवर्ष हम जोड़ रहे हैं। जितना जोड़ रहे हो, बस वही ना जोड़ो इसके लिए कितने पेड़ लगेंगे, एक बार लगा लो हिसाब।
56 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड तुम प्रतिवर्ष वातावरण में जोड़ रहे हो, और एक पेड़ 20 किलो कुल सोखता है। तो तुम्हें कितना जंगल चाहिए, ज़रा लगाओ हिसाब। जितना तुम्हें जंगल चाहिए, पृथ्वी पर उतनी जगह ही नहीं है। हर इंसान को इतने पेड़ लगाने पड़ेंगे कि वो फिर एक बाग-बग़ीचा नहीं, हर इंसान को एक बहुत बड़ा विशाल जंगल लगाना पड़ेगा। तब भी तुम जितना एमिशन कर रहे हो, तब भी तुम नहीं रोक सकते।
पेड़ लगाना तो किसी तरीक़े से समस्या का हल है ही नहीं, हाँ ग्रीनवॉशिंग है। तुम अपनी नज़र में पवित्र, पाक-साफ़ बन जाओगे, कि “मैंने कुछ तो किया।” तुमने कुछ किया नहीं, तुम समस्या सुलझा नहीं रहे हो, तुम ही समस्या हो। ये जो पेड़ लगा रहे हैं ना, क्यों? क्योंकि ये असली समस्या से लोगों का ध्यान भटका रहे हैं।
असली समस्या है कि तुम जैसी ज़िंदगी जी रहे हो, वो वनों के विनाश पर आधारित है, और ये बात तुम देखना नहीं चाहते।
तुम्हारी जो ज़िंदगी है, 10 मिलियन हेक्टेयर प्रति वर्ष। 10 मिलियन हेक्टेयर, समझो इतना जंगल प्रतिवर्ष पृथ्वी से साफ़ किया जा रहा है। वो किसके लिए किया जा रहा है वो हमारे लिए ही तो किया जा रहा है। हम जैसी ज़िंदगी जी रहे हैं, जो हमारी मान्यताएँ हैं, जो हमारी हसरतें हैं, जो हमें “बनना” है, उसके लिए ही जितना जंगल है अभी पृथ्वी पर उसमें से 10 मिलियन हेक्टेयर प्रतिवर्ष साफ़ कर दिया जाता है। एक बार नहीं — हर साल। इस साल, फिर अगले साल, फिर अगले साल, फिर अगले साल, फिर अगले साल। वो किसके लिए साफ़ हो रहा है? बंदरों के लिए? हाथियों के लिए?
वो पेड़ हमारे लिए काटे जा रहे हैं।
और जब तक हम जीवन का जो दर्शन लेकर बैठे हैं, जीवन की जो कामना लेकर बैठे हैं, "सफल-सुखी जीवन" क्या होता है इसकी जो मान्यता है, जो छवि लेकर बैठे हैं, जब तक आपकी वही रहेगी, तब तक जंगल कटता रहेगा। तुम लाखों पेड़ कटवाने वाले, तुम एक पेड़ लगाकर अपने आप को अपराध से बरी कर लेना चाहते हो? ये ग्रीनवॉशिंग है। और कर भी लेते हैं, बड़ी नैतिक उनमें अकड़ आ जाती है। कहते हैं, “ये देखो।” संस्था के लोग भी बोलते हैं, कई बार आते हैं बोलते हैं, “तुम लोग तो बस क्लाइमेट चेंज की बात करते हो, हमको देखो हमने दो पेड़ लगाए हैं।”
हम क्लाइमेट चेंज की बात इसलिए करते हैं, ताकि तुम जैसे लोग, जो दो पेड़ लगाकर अपने आप को बरी कर लेते हैं, तुम्हें फिर से अपराधी घोषित किया जा सके। असली दोषी कौन है, समझो। दुनिया का अधिक से अधिक कार्बन एमिशन, तुम कर ही नहीं रहे हो। तुम क्या कह रहे हो, कि “मैं एसी कम चलाऊँगा या पंखा कम चलाऊँगा, तो कार्बन एमिशन कम हो जाएगा।” तुमसे हो ही नहीं रहा है। जिनसे हो रहा है, वो तुम्हारे पूज्य बैठे हैं। तुमने उनको देवता ही मान लिया है।
ज़्यादा से ज़्यादा कार्बन एमिशन करने वाले और करवाने वाले, दुनिया के 1% और अधिक से अधिक कह लो तो 5% सबसे धनी लोग हैं, वो हैं — धनी, ताकतवर। ये लोग हैं जो कार्बन एमिशन करते हैं।
मैं तुमको बरी नहीं कर रहा, कि फिर “जब वो करते हैं, तो हमारा तो उसमें कोई योगदान नहीं, तो हम क्यों सुनें।” मैं कह रहा हूँ, वो इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि तुमने उनको छूट दे रखी है करने की। वो इसलिए कर पा रहे हैं, क्योंकि तुम ही उन्हीं की बनाई चीज़ें ख़रीदते हो। तुम्हारे ही दिए गए पैसे से मुनाफ़ा कमाकर और ज़्यादा कार्बन एमिशन करते हैं। वो सिर्फ़ उद्योगपति नहीं हैं, वो नेता भी हैं।
उद्योगपति इतना फल-फूल नहीं सकता बिना नेता से साठगाँठ के। और ये नेता वही है जिसको तुम वोट देते हो। और सिर्फ़ बात उसे पैसा देने की नहीं है, तुम उसे पैसा ही नहीं दे रहे हो, तुम उसे दिल देते हो, तुम उसे इज़्ज़त देते हो, तुमने उसे आदर्श बनाया है, तुम उसके जैसा बनना चाहते हो।
उस दिन मैं बता रहा था, कि दुनिया का एक धनी आदमी एक दिन में अपने प्राइवेट जेट से जितना कार्बन एमिशन कर देता है, एक दिन में भी नहीं दो घंटे में; एक धनी आदमी अपने प्राइवेट जेट से दो घंटे में जितना कार्बन एमिशन कर देता है, एक औसत ऐवरेज भारतीय को 2500 साल लगेंगे उतना कार्बन एमिशन करने में।
औसत भारतीय, गरीब भारतीय नहीं बोल रहा। एक औसत भारतीय 2500 साल में एमिशन करे, और वो एक अमीर आदमी दो घंटे अपना जेट चला दे — बराबर हो गया। और तुम सोच रहे हो कि तुम ये पंखा कम चलाओगे और एसी कम चलाओगे, तो इससे हो जाएगा? बिल्कुल, पंखा कम चलाना चाहिए, मैं नहीं कह रहा हूँ और चलाओ, मैं नहीं कह रहा हूँ कि गाड़ी में और धुआँ निकालो, मैं नहीं कह रहा हूँ ये सब। मैं नहीं कह रहा हूँ कि और पेट्रोल जलाओ पर मैं तुमको बता रहा हूँ कि असली अपराधी कौन है, ये जाने बिना अपराध रोक कैसे लोगे?
असली अपराधी हैं वो लोग जो तुम्हारे भाग्यविधाता बनकर बैठे हुए हैं — इंडस्ट्रियलिस्ट बनकर, पॉलिटिशियन बनकर, सेलिब्रिटी बनकर। ये हैं असली अपराधी। और ये बोलकर दोहरा रहा हूँ, मैं तुमको बरी नहीं कर रहा। मैं तुमको बता रहा हूँ, कि इंडस्ट्रियलिस्ट को पैसा भी तुम देते हो और इज़्ज़त भी तुम देते हो, और नेता को वोट तुम देते हो। तो तुम इस तरह से अपराधी हुए।
तुम्हारा अपराध ये नहीं है कि तुम ख़ुद एमिशन ज़्यादा करते हो। तुम्हारा अपराध ये है कि जो एमिशन करते हैं, तुम उनका समर्थन करते हो। समर्थन ही नहीं करते, तुम उन्हें सम्मान देते हो। सम्मान ही नहीं देते, तुम उनको पूजते हो। तुम कभी नहीं पूछते कि तुम्हारा जो फेवरेट सेलिब्रिटी है, उसका कार्बन फुटप्रिंट कितना है? ये तुम्हारा अपराध है। चुनाव होते हैं, कोई तुमसे वोट माँगने आता है, तुम उससे कभी नहीं पूछते, "तुम्हारे मेनिफेस्टो में कार्बन कहाँ है?" ये तुम्हारा अपराध है।
बड़े नेता जी अपना बड़ा जलसा, बड़ा काफ़िला, बड़ा हेलीकॉप्टर दिखाकर तुमको प्रभावित, इंप्रेस कर ले जाते हैं, और तुम नहीं पूछते कि इसका कार्बन फुटप्रिंट कितना है। ये तुम्हारा अपराध है। तुम जितनी बड़ी चीज़ देखते हो, तुम उतना इंप्रेस होते हो। जितनी बड़ी चीज़ देखो — इंडस्ट्रियल ऐक्टिविटी में, ह्यूमन कंस्ट्रक्शन में, तुम्हें उतना पूछना चाहिए, “पर ये तो पृथ्वी की तबाही है।” ये तुम्हारा अपराध है।
तुम्हारे सपने क्या हैं, ये उद्योगपति, अमीर, सेठ तय कर रहा है। ये तुम्हारा अपराध है कि तुम अपने सपनों को उनकी कठपुतली बना देते हो। तुम कहते हो "वो जैसे हैं, वैसे ही मुझे होना है।" सेलिब्रिटी तय करता है कि तुम्हारे विचार और भावनाएँ कैसे होंगी। ये तुम्हारा अपराध है।
डायरेक्टली तुम अपराधी नहीं हो, कि तुमने बहुत एमिशन कर दिया। औसत भारतीय बस 2000 किलो एमिशन करता है, इसलिए मैंने मध्यमवर्गीय को कहा था कि 5000 किलो। औसत भारतीय बस 2000 किलो एमिशन करता है, ये बहुत कम है। इतना कम एमिशन अगर पूरी दुनिया करने लगे, तो क्लाइमेट चेंज की समस्या ख़त्म हो जाए। तो मैं औसत भारतीय को गुनहगार कैसे ठहरा दूँ? वो तो बेचारा कुछ एमिशन कर ही नहीं रहा है। लेकिन वो फिर भी अपराधी है, इनडायरेक्टली अपराधी है।
तुम इंस्टाग्राम में जिसको देख रहे हो ना, उसी ने तुम्हें बर्बाद किया है। तुम अपने सेलिब्रिटी को देखते हो, उसी ने तुम्हें बर्बाद किया है। बस ये है कि तुम्हें बर्बाद करके वो अमेरिका उड़ जाएगा, लंदन उड़ जाएगा, उड़ गया है। क्लाइमेट चेंज की सबसे बड़ी गाज भारत पर गिरनी है। वो भारत में रहेगा ही नहीं बर्बाद होने को। वो तुम्हें भारत में छोड़ के ख़ुद उड़ गया, फुर हो गया।
ग्रीनवॉशिंग मत करो, पेड़ लगाने से नहीं होगा।
अभी आज ही, ये मुझे गुलशन ये डॉक्यूमेंट दिखा रहा था। ये कुछ आँकड़े हैं। कोई विशेष आँकड़े नहीं हैं, बहुत साधारण आँकड़े हैं। सबको पता होने चाहिए। इंटरनेट से ही निकाले इन्होंने।
एक पेड़ तुम्हारा कितने किलो सोखता है? “20 किलो।” 20 किलो हमने माना है कि वो ऐसा पेड़ है जो दमदार पेड़ होते हैं। जो अब दिल्ली और हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जो पेड़ पाए जाते हैं हमारे दुबले-पतले बेचारे, कुपोषित पेड़, ये तो 10–15 किलो भी प्रतिवर्ष ना सोख पाएँ। ये जो हमने काँटों वाले और छोटी पत्तियों वाले, ये बबूल-कीकर लगा रखे हैं ये थोड़ी बहुत सोखते हैं। इनमें तो पत्ते ही नहीं ये क्या सोखेंगे। और ये लोग जो ट्रांसऐटलांटिक फ्लाइट लेते हैं, 20 किलो पेड़ का था और जो ट्रांसऐटलांटिक फ्लाइट लेते हैं एक फ्लाइट राउंड-ट्रिप — एक टन, सिर्फ़ एक फ्लाइट।
एक टन कितना होता है? “1000 किलो।” माने जो तुमने पेड़ लगाया है बेचारा, 50 साल में उसने जितनी कार्बन डाइऑक्साइड सोखी होती, उतनी फ्लाइट न्यूयॉर्क से लंदन गई, लंदन से वापस आई, 50 साल का पेड़ का काम ख़त्म हो गया। और तुम अभी भी खुश हो रहे हो, "हम तो पेड़ लगाते हैं, पेड़ लगाने से हो जाएगा।”
ये कौन सी सोच है, किस दुनिया में जी रहे हो कि पेड़ लगाने से हो जाएगा। मैं पेड़ काटने को नहीं कह रहा हूँ, कुर्तक मत करने लग जाना। मैं बस ये बता रहा हूँ कि पेड़ तो मौजूद हैं। कहाँ? जंगलों में। प्रकृति तो पेड़ों को ख़ुद पैदा करती है और बढ़ाती है, जंगल तुमने थोड़ी लगाए थे। ऐसी ज़िंदगी मत जियो कि जंगल कटे, ये तुम्हें करना है।
और जंगलों से बाहर अगर पेड़ लगाते हो तो पेड़ वैसे भी जी नहीं पाता। सड़क किनारे तुम पेड़ लगा दो, उस पेड़ की दुर्दशा देखी है। दिल्ली वग़ैरह में जाओ, नोएडा में देखो वहाँ सड़क किनारे जो पेड़ लगे हैं, उनकी क्या बेचारों की दयनीय हालत है। पेड़ भी वहीं पनपते हैं जहाँ उनका कुनबा है, परिवार है। जंगल में पेड़ पनपते हैं। और तुम ज़िंदगी जो जी रहे हो, जंगल को काट के जी जा रही है।
बच्चा पैदा किए जा रहे हो। बच्चा पैदा हुआ है, कहाँ से घर आएगा उसके लिए? वो पैदा हुआ है तो अब और उसके लिए अन्न चाहिए, खेत कहाँ से आएगा? ये सब जगह कहाँ से आनी है? जंगल काट के ही तो आएगी। पर तुम कह रहे हो, "एक पेड़ लगा देंगे, तो हो जाएगा!" ज़िंदगी जी रहे हो जंगल कटने वाली और कह रहे हो पेड़ लगा दूँगा।
पेड़ मत लगाओ, वो कारण रोको जिन कारणों से जंगल कटते हैं। तुम ख़ुद जाकर कुल्हाड़ी लेकर जंगल नहीं काटते, पर तुम्हारी ज़िंदगी, तुम्हारा दर्शन, तुम्हारे चुनाव ऐसे हैं कि जंगल कटते हैं।
तुम्हारे पास पैसा आ जाता है, तुम कहते हो "मैं भी मांस खाऊँगा।" भारत में जैसे-जैसे पैसा बढ़ने लगा है, वैसे-वैसे मांसाहार बढ़ने लगा है। यही है ना?
तुम्हें मालूम है दुनिया का 70% जो अन्न पैदा होता है, वो जानवरों को खिलाने के लिए पैदा होता है ताकि वो जानवर काटे जाएँ, फिर मांसाहार के लिए। तुमको मांसहार करना है तो अब जंगल कटेगा। जंगल कटेगा ताकि खेत निकले, खेत निकले ताकि अन्न पैदा हो, अन्न पैदा हो ताकि जानवर खिलाया जाए, फिर उस जानवर को काट के तुम खाओगे। और तुम कह रहे हो, "मैं पेड़ लगा दूँगा और साथ में चलो आज चिकन खाते हैं।" जो चिकन खा रहा है, वो पेड़ लगा रहा है, तो बड़ा पाखंडी है।
जो बहुत खुशी मनाता है कि चलो और एक बच्चा घर में आ गया, वो पेड़ लगा रहा है, तो बड़ा पाखंडी है। जो अमीरों की पूजा करता है और कहता है, “यही मेरा रोल मॉडल है, देखो कैसे ये अपने प्राइवेट यॉट में चलता है या जेट में चलता है, या इतना बड़ा इसने अपने लिए महल बनवा लिया है।” जो अमीरों की पूजा करता है और अमीर ही बनना चाहता है, और फिर एक पेड़ लगा रहा है, वो बड़ा पाखंडी है।
ये तो बोला ही था मैंने, "10 मिलियन हेक्टेयर जंगल प्रतिवर्ष कट रहा है इंसान के अरमानों के लिए।" और तुम अपने अरमानों को बड़ी कीमती चीज़ मानते हो। बोलते हो, "मेरे सपने, मेरा भविष्य, मेरे सपन सलोने, मुझे पूरे।" और तुम्हारे सब सपनों में सिर्फ़ कंजम्प्शन, भोग माने एमिशन ही शामिल है। और फिर तुम कह रहे हो, "मैं पेड़ लगाऊँगा।"
तो ये कैलकुलेशन करी थी, कि जितना ग्लोबल एमिशन है, और ये 56 गीगाटन मैंने बोला था यहाँ 36 ही लिया, चलो इतना भी ले लें। कह रहे इसके लिए तुमको, जितना आप एक्सेस एमिशन कर रहे हो, जितनी पहले की कार्बन डाइऑक्साइड है — एक्सेस, वो नहीं सोखनी है। जो सिर्फ़ एक्सेस एमिशन है, अगर उसको ऑफसेट करना है, उसको सोखना है तो उसके लिए आपको प्रतिवर्ष 3.6 ट्रिलियन ट्रीज चाहिए।
जाओ लगाओ।
पेड़ लगा-लगा के क्लाइमेट चेंज रोकना चाहते हो ना? तो प्रतिवर्ष 3.6 ट्रिलियन पेड़ लगाने पड़ेंगे।
क्या रे शाम्भा, एक ट्रिलियन कितना होता है?
“सरकार, 1000 बिलियन।"
हैं? 1000 बिलियन। ये बिलियन कितना होता है?
“सरकार, 100 करोड़।"
अरे तो देसी में बताओ ना, ये ट्रिलियन कितना हुआ?
"सरकार 10 अरब।"
हट!
“सरकार, मैंने आपका नमक खाया है।”
तो फिर सही जवाब दे। कितना हुआ? अरब में कितना हुआ 1 ट्रिलियन? कितना हुआ?
“सरदार, शायद 100 अरब?"
अब गोली खा। 100 अरब भी नहीं, कुछ और ज़्यादा! इतने पेड़ लगाने पड़ेंगे पृथ्वी पर। जाओ लगाओ। और खुश हो रहे हो कि हमने अपने आँगन में एक नमूना नींबू का पेड़ लगा दिया, इससे हमारी क्लाइमेट रिस्पॉन्सिबिलिटी पूरी हो गई। कोई नींबू का लगा रहा है, कोई अमरूद का, कोई मनीप्लांट लगाकर खुश हो रहा है, कि "अरे देखो हम क्लाइमेट चेंज रोक देंगे ये लगा के!"
हर साल अगर क्लाइमेट चेंज से लड़ना है, पुराना हिसाब नहीं, सिर्फ़ जो तुम करेंट में एमिशन कर रहे हो, उनको ऑफसेट करना है तो 3.6 ट्रिलियन ट्रीज लगाने पड़ेंगे। जाओ लगाओ, और नहीं तो बंद करो ये पेड़बाज़ी। जो असली कारण हैं, उस पर ध्यान दो।
बहुत सारे इसमें इन्होंने बातें लिखी हैं, आँकड़े लिखे हैं, पर इनमें से ऐसा कोई भी नहीं है जो बड़ा गुप्त हो। ये सारी बातें तो आपको भी मिल जाएँगी। कोई आपके सामने आता है किसी चीज़ को इको-फ्रेंडली बता करके, कर लो ना उसी समय पे गूगल। पूछ लो कि कितना इको-फ्रेंडली है ये जो दिखा रहे हैं मुझे। और अब तो फैशन है इको-फ्रेंडली दिखाना। फैशन पर चल के क्लाइमेट क्राइसिस नहीं रुकने वाली।
अध्यात्म इसको ऐसे कहेगा। मैं अध्यात्म और विज्ञान दोनों की दृष्टि से बता देता हूँ। बोलो पहले क्या सुनना है — अध्यात्म या विज्ञान?
श्रोता: विज्ञान।
आचार्य प्रशांत: विज्ञान, चलो ठीक है। एंट्रॉपी जानते हो क्या होती है? एंट्रॉपी कहती है कि तुम कुछ भी करो, एक सिस्टम में डिसऑर्डर बढ़ता ही बढ़ता है। एक सिस्टम हमेशा ज़्यादा डिसऑर्डर की तरफ़ मूव करता है। ठीक है? तो तुम गंदगी फैलाओगे तो भी डिसऑर्डर बढ़ेगा, और तुम गंदगी समेटोगे तो भी बढ़ेगा।
इसको ऐसे समझो, कि तुम हीटिंग करोगे तो भी कार्बन एमिशन होगा। और हीटिंग हो गई तो अब कूलिंग करनी है, तो भी कार्बन एमिशन होगा। तुम कुछ भी करोगे, एंट्रॉपी बढ़ेगी ही बढ़ेगी। तुम कुछ भी करोगे, कार्बन एमिशन बढ़ेगा ही बढ़ेगा।
तो फिर एक ही तरीक़ा है — तुम कुछ मत करो, प्रकृति को अपना काम करने दो। कार्बन क्राइसिस तुम्हारे कुछ करने का नतीजा है। तुम सोच रहे हो, "अब मैं कुछ और करके उसका समाधान कर लूँगा।" नहीं, नहीं, नहीं। आपसे गुज़ारिश बस ये है कि आप बैठ जाइए, आप कुछ मत करिए। प्रकृति समाधान स्वयं निकाल लेगी। आप कुछ मत करिए, आप जो कर रहे हो बस वो करना बंद करो।
कोविड के दिनों में देखा था ना — आसमान साफ़ हो गया था, हवा साफ़ हो गई थी। शहरों की सड़कों पर हिरण घूमते नज़र आने लगे थे। लोग कह रहे हैं, "ये क्या हो रहा है, हिरण हाईवे पर!" हाईवे छोड़ दो, शहरों की सड़कों पर हिरण दिख रहे हैं, खरगोश कूद रहे हैं, कुछ और आ रहा है। वो भी मौज मना रहे थे। दो ही चार महीने में ये हो गया।
आप कुछ मत करो, कृपा करके आप समाधान करने की कोशिश मत करो। जिसको बोलते हैं ना पनौती, आप पनौती हो। आप समस्या बढ़ाओगे तो समस्या बढ़ेगी। आप समाधान करोगे तो समस्या और बढ़ेगी।
आप कुछ मत करो। प्रकृति स्वयं कर लेगी। स्वयं कर लेगी, तुम मत करो।
तो फिर हम क्या करें? "नेति-नेति" — अध्यात्म में आ गए। "नेति-नेति" — जो कर रहे हो, करना बंद करो। क्या? पहली बात, जो ग्रोथ ऑब्सेशन है, वो बंद करो, तुम्हें और ग्रोथ नहीं चाहिए। जिस स्तर पर ये विश्व पहुँच चुका है पर कैपिटा कंजम्प्शन में, तुम्हें और नहीं चाहिए। तुम्हें रिडिस्ट्रिब्यूशन चाहिए।
अगर पूरे विश्व का जीडीपी ले लो तो आज जितना है, उसे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है, भैया, मत बढ़ाओ बल्कि घटा दो। तो गरीबों का क्या होगा? गरीब, गरीब इसलिए नहीं है कि विश्व में अभी वेल्थ नहीं है या प्रोडक्शन नहीं है। गरीब, गरीब इसलिए है क्योंकि कुछ लोगों ने उसको?
श्रोता: दबा रखा है।
आचार्य प्रशांत: अपने हाथ में ले रखा है, दबा रखा है। जो कि पागलपन का सबूत है। अभी मैं कम्युनिटी पर ही पढ़ रहा था, कि अगर जंगल में एक बंदर ऐसा हो कि वो जंगल भर के फल अपने पास इकट्ठा कर ले, और उसकी वजह से बाक़ी सब बंदर भूखे मरने लग जाएँ, तो आप कहोगे, "ये जो बंदर है, ये मानसिक रोगी है। इसका या तो इलाज कराओ या इसको मार दो। इसकी वजह से बाक़ी सब बंदर मर जाएँगे।"
पर यही काम जब कोई इंसान करता है, तो तुम कहते हो, "ही इज़ सक्सेसफुल। लेट्स एडमायर हिम।" दुनिया भर के संसाधन इसने अपनी तिजोरी में भर लिए हैं, बाक़ी सब गरीब अब भूखे मर रहे हैं। अब ये इंसान सफल कहला रहा है।
गरीब इसलिए नहीं है कि दुनिया में प्रोडक्शन की कमी है या वेल्थ की कमी है। गरीब इसलिए है क्योंकि कुछ मनहूस लोगों ने नियम-कायदों की कमियों का फायदा उठाते हुए ज़्यादा से ज़्यादा दौलत अपने पास भर ली है। इसलिए दुनिया में गरीबी है। तुम्हें और प्रोडक्शन नहीं चाहिए। जिस स्तर पर अभी ग्लोबल प्रोडक्शन है, उतना काफ़ी है, बल्कि उसको और कम करो और कम करो। बस ये तय करो, ये निश्चित करो, कि जो प्रोडक्शन हो रहा है, वो चंद लोगों द्वारा होल्ड नहीं किया जा रहा।
होल्डिंग समझते हो? कब्ज़े में कर लेना, भंडारण कर लेना। कम प्रोडक्शन में भी चल जाएगा। "नेति-नेति" — वेदान्त कहता है। जो कर रहे हो, बस वो करना बंद करो। तुम्हें और प्रोडक्शन नहीं चाहिए। एक — प्रोडक्शन कम करो। एक — पॉपुलेशन कम करो, ये है क्लाइमेट क्राइसिस का इलाज। कुछ और मत करो, जो कर रहे हो फिलहाल, बस वो करना बंद कर दो। बाक़ी काम प्रकृति स्वयं कर देगी।
तुम दो काम बहुत घातक कर रहे हो — एक प्रोडक्शन, एक पॉपुलेशन।
और कार्बन एमिशन क्या होता है? प्रपोर्शनल टू बोथ प्रोडक्शन एंड पॉपुलेशन। तो दोनों को अगर पी मानो, प्रोडक्शन को भी और पॉपुलेशन को भी। तो जो कार्बन एमिशन है, वो प्रपोर्शनल टू पी स्क्वायर हो जाता है। और हम चाहते हैं, हमारी मान्यता ये है कि खुशहाली तब आई जब पॉपुलेशन भी बढ़ी और प्रोडक्शन भी बढ़ा। और प्रोडक्शन माने कंज़म्प्शन। जो प्रोड्यूस होगा, वो कंज़्यूम भी तो होगा।
एक घर में आठ-दस बच्चे हों और बहुत पैसा आ जाए, तो आप यही तो कहोगे "क्या खुशहाल घर है! क्या बरकत है!" वो बरकत नहीं है, वो पृथ्वी का नाश है। प्रोडक्शन कम करो, पॉपुलेशन कम करो। और उसके लिए भी तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। बस बढ़ाओ मत।
लोग अपनी आयु, अपनी अवधि पूरी करके स्वयं ही चले जाते हैं। तुम्हें कुछ नहीं करना है। बस बढ़ाओ मत।
विज्ञान से भी समझाया, अध्यात्म से भी समझाया, "नेति-नेति" से भी समझाया, और एंट्रॉपी से भी समझाया। और ग्रीनवॉशिंग के फरेब में मत पड़ो, कि "मैंने ये कर दिया, मैंने अब ये अपनी डाइट में से ये चीज़ हटा के ये कर ली।" जो भी तुम कर रहे हो अपनी डाइट में, एक बार देख तो लो कि उसका कार्बन इम्पैक्ट कितना है। और फिर ये देख लो, कि हम एक्सेस कार्बन डाइऑक्साइड कितनी एमिट कर रहे हैं। और हमें तो जाना है नेट ज़ीरो पर। और नेट ज़ीरो का मतलब, कि कोई ऐडिशन नहीं करेंगे अब हम कार्बन डाइऑक्साइड में, जितनी है उतनी पड़ी रहे।
हमें तो वहाँ जाना है, नेट ज़ीरो। नेट ज़ीरो हो के भी 2–3 डिग्री बढ़ जाएगा। नेट ज़ीरो भी हमने कोई बहुत तीर नहीं मार लिया। लेकिन आप खुश हो जाते हो। आप कहते हो, "मैं फलाने ब्रांड की जींस नहीं, फलाने ब्रांड की जींस पहन रहा हूँ। सी आई एम इको-सेंसिटिव!"
एक बार देखो तो, कि उससे कितना फ़र्क़ पड़ेगा। जिन चीज़ों से वास्तव में फ़र्क़ पड़ना है, उन चीज़ों पर ध्यान दो। जैसे ही तुम अपना कंज़म्प्शन कम करोगे, सेठ जी परेशान हो जाएँगे। और सेठ जी विज्ञापन दे-दे के, तमाम तरीक़े के लेख छपवा के, फिल्में बनवा कर के और मीडिया से प्रचार करवा कर के, तुम्हें ये ज़ाहिर करेंगे, कि अगर तुम कंज़म्प्शन नहीं कर रहे, तो तुम्हारी ज़िंदगी नरक है।
तुम्हें सेठ जी का ये जो मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र है, इससे बचना है। दुकानें और मीडिया एक साथ चलते हैं। मीडिया तुम्हें बार-बार छुपे छुपे तरीक़ों से बोलता है, कि देखो ज़िंदगी बेहतर करनी है तो तुम्हें और ज़्यादा भोगना चाहिए, कंज़्यूम करना चाहिए। फिर वही भोगने के लिए तुम दुकान पे चले जाते हो, और तुम्हें ये पता ही नहीं होता कि वो मीडिया भी सेठ जी का है, और दुकान भी सेठ जी की है।
वही सेठ जी जो टीवी चैनल्स और तमाम तरीक़े के अन्य चैनल कंट्रोल करते हैं। वही सेठ जी सब दुकानें और तमाम तरह की इंडस्ट्रीज़ भी कंट्रोल करते हैं। इस झांसे से बचो। और जब पॉपुलेशन कम होगी, तो नेता जी को तकलीफ़ हो जाएगी क्योंकि तुम नेता जी के वोट बैंक हो। नेता जी कहेंगे, "तुम अगर कम हो गए, तो मेरी तो गद्दी छीन जाएगी।" और नेता जी को तकलीफ़ तब भी होगी, जब सेठ जी को तकलीफ़ होगी।
क्योंकि नेताजी की फाइनेंसिंग तो सेठ जी ही करते हैं। ये है तुम्हारी असली गलती। तुम्हारी असली गलती ये नहीं है कि तुम पेड़ नहीं लगा रहे। तुम्हारी असली गलती ये है कि तुम नेताजी, बाबाजी, सेठ जी — इनके षड्यंत्र से आज़ाद नहीं हो पा रहे हो, ये तुम्हारी असली गलती है। कुछ आ रही है बात समझ में?
घर में गाड़ी आई नहीं कि तुम उसे लेकर कहाँ जाते हो? कुछ इशारे समझो। मंदिर जाते हो। हम तो देवी की पूजा करते हैं। ये प्रकृति ही तो देवी है। और जो तुम गाड़ी लेकर के आए हो, तुम जानते नहीं उसका फ़ुटप्रिंट कितना है। उसको तुम धर्म से कैसे जोड़ सकते हो। लेकिन जब तक तुम्हारे मन में ये बात रहेगी, कि घर में कोई मटेरियल ऑब्जेक्ट आ गया, इसका संबंध शुभता से है, वहाँ लिखवा भी लेते हो ना "शुभ लाभ।"
जब तक तुम्हारे मन में ये बात रहेगी कि कंज़म्प्शन का, समृद्धि का संबंध शुभता से है, तब तक क्लाइमेट क्राइसिस रुकने से रही।
जब किसी को बोलते हो कि "अरे, उनका तो बड़ा अच्छा चल रहा है।" बड़ा अच्छा का एक ही मतलब होता है, कि खूब फूँक रहे हैं। यही तो होता है, पहले एक मंज़िला घर था, अब चार मंज़िला घर हो गया है। बड़ी दुकानों में जाकर के पैसा फूँकते हैं, यही तो मतलब होता है। जब तक भीतर से ये मान्यता नहीं निकलेगी, सेठ जी राज करेंगे। और तुम बस पेड़ लगाते रह जाना और खुश हो जाना।
पेड़ भी बबूल का। संतों ने क्या बोला?
"बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय।।"
हमारी एक-एक हसरत, एक-एक कामना — इको-अनफ्रेंडली है। समझो। माँ-बाप बच्चे के लिए जो कुछ चाह रहे हैं, वो संभव ही नहीं है चाहना बिना प्रकृति का विनाश करे। आपके घर बच्चा होता है। आप कहते हो, "मेरे बच्चे को उज्ज्वल भविष्य मिले।" उसके लिए ये-ये मिलना चाहिए मेरे बच्चे को। आप जो कुछ अपने बच्चे के लिए चाह रहे हो, वो संभव ही तभी है जब पहले पृथ्वी बर्बाद करी जाए। वरना उसको मिल ही नहीं सकता ये सब।
लोग बड़े नाराज़ हो गए। मैंने कह दिया कि हर बच्चा लाखों पशुओं की और पेड़-पौधों की लाश पर पैदा होता है। लोगों ने कहा, "ऐसा थोड़ी होता है!" अरे, आँकड़े उठाकर देख लो ना। मैं कोई अपनी मनगढ़ंत बात थोड़ी बोल रहा हूँ। एक बच्चा पैदा हुआ है, तो अपने जीवन भर में अब वो जितना भोग करेगा, उसके लिए कितने पेड़ काटने ज़रूरी हो जाएँगे, देख लो। और जब पेड़ कटेंगे जंगल नहीं रहेगा तो वहाँ जो पशु हैं, वो तो ख़ुद ही मर गए। पूरी प्रजाति उनकी विलुप्त हो गई। ख़ुद ही देख लो।
और बच्चा तुमने जो पैदा किया, वो एक बच्चा थोड़ी पैदा किया। अब उस बच्चे के भी बच्चे होंगे, बच्चे के बच्चे। जितने अब आगे पैदा होंगे, उसकी ज़िम्मेदारी भी तुम ही पर है, जो तुमने पैदा किया पहला। और बनते हैं बड़े पशु-प्रेमी!
प्रोडक्शन, पॉपुलेशन — इन दोनों में से कोई भी चीज़ प्रकृति स्वयं नहीं कर रही। ये करने का निर्णय तुम्हारा होता है। बस तुम यह करना बंद करो — “नेति-नेति।” सब अपने आप ठीक हो जाएगा। तुम नहीं कर रहे हो, ऐसे मत देखो कि "हम क्या बंद करें, हम तो कुछ कर ही नहीं रहे!" तुम नहीं कर रहे पर जो कर रहे हैं, उनको तुम पूज रहे हो। वो 100 जगहों से थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा करते हैं। 100 भी नहीं, करोड़ों जगहों से थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा करते हैं। उन करोड़ों में तुम भी हो। उन्होंने सिर्फ़ तुम्हें माल नहीं दिया है, उन्होंने तुम्हें मन भी दे दिया है। उन्होंने तुम्हें सिर्फ़ सामग्री ही नहीं दी है, उन्होंने तुम्हें सपने भी दे दिए हैं। ये तुम्हारा अपराध है। क्यों तुमने अपने सपने सेठ जी द्वारा तय करा लिए?
बाहर निकालो।