क्या विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं?

Acharya Prashant

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क्या विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं?
ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ यह भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का हो। ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चले और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर और प्रेम हो। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन ये है कि जैसे-जैसे मनुष्य भौतिकवादी बनते गया तो प्रकृति का विनाश करता गया। तो हम क्या पहले हज़ारों साल पहले जीते थे, वैसा ही हम अपनी लाइफ़ स्टाइल कर दें?

आचार्य प्रशांत: प्रकृति का सही उपयोग करिए और सही उपयोग भोग में नहीं निहित है। मतलब समझिएगा। नाश उपयोग से नहीं होता, नाश उपभोग से होता है। उपभोग में नाश क्यों होगा? क्योंकि जो आप चाह रहे हो उपभोग से, वो एक पेड़ को काट के नहीं मिलेगा। वो सौ पेड़ को काटो, फिर भी नहीं मिलेगा। तो आप कितने काटोगे? हज़ार। हज़ार काटोगे तब भी नहीं मिलेगा, तो कितने काटोगे? दस हज़ार। दस हज़ार काट लो, अभी भी नहीं मिलेगा, तो कितने काटोगे? एक लाख काटोगे।

उपयोग में हो सकता है कि आपका काम एक पेड़ की पाँच पत्तियों से चल जाए। उपयोग में एक पेड़ की पाँच पत्तियाँ काफ़ी होती हैं। प्रकृति नहीं मना कर रही कि एक पेड़ की पाँच पत्ती नहीं ले सकते। किसने मना किया? वो उपयोग है। और पाँच पत्तियाँ काफ़ी होती हैं, क्योंकि आपको पता है उनका क्या काम होना है। उपभोग में आपको पता ही नहीं इससे मिलना क्या है। बस काट रहे हो, मिल नहीं रहा फिर भी काट रहे हो, और चूँकि नहीं मिल रहा, इसलिए और ज़्यादा काट रहे हो।

उपयोग कभी भी अंधाधुंध हो ही नहीं सकता। उपयोग की परिभाषा ही यही है कि वो अंधाधुंध नहीं हो सकता। तुलसी का एक पत्ता डालना है इसमें (चाय के कप की ओर इंगित करते हुए) तो जड़ से थोड़ी उखाड़ लोगे तुलसी को, वो उपयोग है। उपभोग क्या है? उपभोग ये है कि मांस, मांस खाना है, मांस खाना है तो उसके लिए जानवरों के लिए दाना उगाना पड़ेगा। और दाना उगाना है तो क्या करना है? ज़मीन चाहिए। ज़मीन चाहिए तो जंगल काटो, जंगल काटो। दुनिया की 70% ज़मीन पर जानवरों के लिए अन्न उगाया जाता है, ये उपभोग है। और आप कितना मांस खा सकते हो, उसका कोई अंत नहीं है। क्योंकि मांस कितना भी खाते रहो, संतुष्टि तो मिलती नहीं न, पर मैं ये थोड़ी कहूँगा कि मैं इसमें पूरा तुलसी का पेड़ डाल दूँगा। उससे मुझे क्या मिलेगा, एक पत्ती काफ़ी है, ये उपयोग कहलाता है। उपयोग में इतना सा (थोड़ा सा) काफ़ी होता है।

आपको बहुत बड़ी बीमारी हो गई हो तो आपको बहुत बड़ा ड्रम भर के दवाई दी जाती है? आपकी बीमारी बहुत बड़ी हो, तो जितनी बड़ी बीमारी होती है, आपको उतना बड़ा ड्रम भर के दवाई पिलाई जाती है? बीमारी कितनी भी बड़ी हो, उपयोग की वस्तु तो इतनी सी (थोड़ी सी) होती है न। आपको कैंसर भी है तो दवाई तो इतनी सी (थोड़ी सी) दी जाती है।

उपयोग में नहीं अंधाधुंध नाश करना पड़ता, उपभोग में नाश करना पड़ता है।

आपकी जो उपयोगी, जो उपयोग मूलक आवश्यकताएँ हैं, प्रकृति उतना आपको सहर्ष दे देगी जैसे माँ अपने बच्चे को दे देती है, “ले।” बच्चा माँ का दूध पीता है, उससे माँ मर जाती है क्या? लेकिन यही बच्चा असुर पैदा हो गया बोले खून पिऊँगा तो माँ तो मर ही जाएगी। बच्चे को दूध देने में माँ का कुछ भी नहीं चला जाता। तो प्रकृति आपको उतना देने को तैयार बैठी है जितना आपको सचमुच चाहिए।

पृथ्वी को जल देने में बादलों का क्या चला गया? नदी बह रही है, उस पर जाकर प्राणियों ने पानी पी लिया, नदी का कुछ नहीं चला गया, कि चला गया? समुद्र में मछलियाँ रहती हैं, समुद्र उनसे किराया नहीं माँगता। समुद्र का कुछ चला ही नहीं गया। लेकिन आप समुद्र का उपभोग करते हो, अब वहाँ समुद्र बर्बाद हो जाएगा। इतनी मछलियाँ इतने करोड़ों सालों से समुद्र में रह रही हैं, समुद्र का कुछ बिगड़ गया? इतने प्राणियों ने इतने करोड़ों सालों से नदियों का पानी पिया, नदियों का कुछ बिगड़ गया?

लेकिन आपके उपभोग ने समुद्र को और नदियों का कहीं का नहीं छोड़ा। आपकी आवश्यकता के लिए प्रकृति के पास सब कुछ है। यहाँ तक कि आप जो तकनीकी विकास भी कर रहे हो, प्रकृति उसमें भी कोई आपत्ति नहीं करने वाली। अंधाधुंध उपभोग मत करो न बस, एक सम्मान रखो प्रकृति के प्रति।

प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। आपका ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ ये भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का है। ये दोनों बातें साथ-साथ चल सकती हैं, हमें चलानी पड़ेंगी।

प्रकृति का संरक्षण करने का अर्थ ये नहीं होता है कि जैसे आपने पूछा, कि “क्या हम दस हज़ार साल पहले वाले इंसान की तरह रहना शुरू कर दें, या दस लाख साल पहले वाले बंदर की तरह रहना शुरू कर दें?” नहीं, नहीं, ये बड़ी भ्रांति है। और ये आपत्ति बहुत लोगों द्वारा की जाती है बहुत बार। वो कहते हैं, ये देखो, जैसे ही आप एनवायरमेंट की बात करो, वो कहते हैं एंटी डेवलपमेंट, एंटी डेवलपमेंट। अरे, एनवायरमेंट और डेवलपमेंट साथ-साथ क्यों नहीं चल सकते?

अगर एनवायरमेंट और डेवलपमेंट साथ-साथ नहीं चल सकते तो सस्टेनेबल डेवलपमेंट किसको बोलते हैं फिर?

सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चलें और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर हो और प्रेम हो।

समझ में आ रही है बात ये? और दोनों एक साथ बिल्कुल चल सकते हैं।

और देखिए, मनुष्य ज्ञान का पिपासु है क्योंकि बोध हमारा स्वभाव है, तो ज्ञान तो हम माँगेंगे। उपनिषद् ख़ुद अविद्या को बहुत सम्मान देते हैं। ज्ञान तो हम माँगेंगे और जहाँ ज्ञान होगा, फिर उससे कुछ टेक्नोलॉजी भी निर्मित होगी, तो वो भी होती रहेगी। जो ज्ञान की पूरी यात्रा है, वह रुकनी नहीं चाहिए। टेक्नोलॉजी लगातार बढ़ती ही जा रही है, बेहतर होती जा रही है और उसको बेहतर होते रहना पड़ेगा। होना चाहिए उसको और बेहतर। लेकिन ये काम होना चाहिए प्रकृति के संरक्षण और सम्मान के साथ-साथ।

ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। और वैसी टेक्नोलॉजी अगर आपको नहीं चाहिए तो पहले आपको आत्मज्ञान होना पड़ेगा, क्योंकि वो जो टेक्नोलॉजी है वो तो आप विकसित ही तभी कर रहे हो ना जब आपको भोग की इच्छा बहुत है। टेक्नोलॉजी कोई हवा से तो उतरती नहीं, टेक्नोलॉजी तो आप विकसित करते हो। आपको भोगना है तो आप भोगने के अनुसार टेक्नोलॉजी विकसित कर लेते हो। आपको स्लॉटर करना है तो आप बहुत टेक्नोलॉजिकल एडवांस स्लॉटर हाउसेस बना लेते हो।

आदमी का केंद्र ठीक होना चाहिए, फिर विकास और पर्यावरण दोनों एक साथ चल सकते हैं।

इसका मतलब ये है कि अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। जो विकास आएगा आत्मज्ञान के बिना, वो विकास आत्मघाती होगा ही होगा। जिन लोगों को विकास की जितनी ललक हो, उन लोगों को उतना ज़्यादा आत्मज्ञान चाहिए। तभी विकास विनाशकारी नहीं होगा, नहीं तो विकास का अर्थ ही विनाश होगा।

प्रश्नकर्ता: उपभोग और उपयोग का डिफरेंस पता होना चाहिए।

आचार्य प्रशांत: हाँ।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू, प्रणाम।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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