ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ यह भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का हो। ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चले और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर और प्रेम हो।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन ये है कि जैसे-जैसे मनुष्य भौतिकवादी बनते गया तो प्रकृति का विनाश करता गया। तो हम क्या पहले हज़ारों साल पहले जीते थे, वैसा ही हम अपनी लाइफ़ स्टाइल कर दें?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति का सही उपयोग करिए और सही उपयोग भोग में नहीं निहित है। मतलब समझिएगा। नाश उपयोग से नहीं होता, नाश उपभोग से होता है। उपभोग में नाश क्यों होगा? क्योंकि जो आप चाह रहे हो उपभोग से, वो एक पेड़ को काट के नहीं मिलेगा। वो सौ पेड़ को काटो, फिर भी नहीं मिलेगा। तो आप कितने काटोगे? हज़ार। हज़ार काटोगे तब भी नहीं मिलेगा, तो कितने काटोगे? दस हज़ार। दस हज़ार काट लो, अभी भी नहीं मिलेगा, तो कितने काटोगे? एक लाख काटोगे।
उपयोग में हो सकता है कि आपका काम एक पेड़ की पाँच पत्तियों से चल जाए। उपयोग में एक पेड़ की पाँच पत्तियाँ काफ़ी होती हैं। प्रकृति नहीं मना कर रही कि एक पेड़ की पाँच पत्ती नहीं ले सकते। किसने मना किया? वो उपयोग है। और पाँच पत्तियाँ काफ़ी होती हैं, क्योंकि आपको पता है उनका क्या काम होना है। उपभोग में आपको पता ही नहीं इससे मिलना क्या है। बस काट रहे हो, मिल नहीं रहा फिर भी काट रहे हो, और चूँकि नहीं मिल रहा, इसलिए और ज़्यादा काट रहे हो।




