नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?
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आचार्य प्रशांत: आज दूसरे चरित्र को उठाते हैं। ये दूसरा चरित्र है, इसका महत्व इतना बताया गया है कि अगर आप पूरे ग्रन्थ का पाठ नहीं कर पाते हैं, किसी कारणवश, समय का अभाव या कुछ और तो सिर्फ़ आप दूसरे चरित्र का पाठ कर लें। उतना भी पर्याप्त हो जाता है। और जो दूसरा चरित्र है, उसमें देवी का राजसिक रूप हमारे सामने आता है। पहले में वो तामसिक महाकाली थीं, अब वो राजसिक महालक्ष्मी हैं। और वही महालक्ष्मी, दूसरे चरित्र में दुर्गा बनकर प्रकट हो रही हैं। और महिषासुर वध का पूरा वृत्तान्त है। इसीलिए दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहते हैं। और दूसरे चरित्र का महत्व इतना है कि पूरे ग्रन्थ को ही दुर्गा का नाम दिया गया है। ‘दुर्गा सप्तशती’।
तो क्या होता है भाई, दूसरे चरित्र में? एक बड़ी लम्बी-चौड़ी लड़ाई से आरम्भ होता है। सौ वर्ष तक वो लड़ाई चल रही है किसके-किसके बीच में? महिषासुर नाम का एक दैत्य हो गया था और सौ सालों तक उसने सब देवताओं से लड़ाई करी और जीत गया। जीतकर क्या किया? ये सब देवता जो हैं, प्रकृति प्राकृतिक शक्तियों के प्रतिनिधि होते हैं। तो उसने प्रकृति से उसकी व्यवस्था छीन ली। चन्द्रमा से चन्द्रमा का अधिकार छीन लिया। तो उसको कथा ऐसे कहती है कि चन्द्रदेव के अधिकार उसने छीन लिये। अग्नि जिस व्यवस्थित रूप से प्रकृति में उदित और प्रवाहित होती है, उसने उसमें भी बाधा डाल दी, तो उसने अग्नि के भी सहज अधिकारों का हनन कर दिया। तो अग्नि देव को भी कथा ऐसे कहती है कि महिषासुर ने उनके स्थान से हटा दिया।
इसी तरीक़े से सूर्य, वरुण, मित्र और इन्द्र जो सब देवताओं के राजा हैं। इन सबके अधिकार महिषासुर ने छीन लिये। आशय क्या है? अब ये कोई ऐतिहासिक घटना तो है नहीं। ऐसा तो है नहीं कि कभी महिषासुर ने वास्तव में चन्द्रमा से, चन्द्रमा के अधिकार छीने थे और वायु से, वायु के अधिकार और जल से, जल के अधिकार छीने थे। ऐतिहासिक बात तो हो नहीं रही है, जो बात हो रही है वो इतिहास से कहीं आगे की और इतिहास से बहुत ऊँची बात है वो। आशय ये है कि जब अहंकार बहुत बढ़ने लग जाता है, बढ़े हुए अहंकार को ही कहते हैं उसका राक्षस हो जाना। अहंकार ही दैत्य बन गया है। तो अहंकार जब बहुत बढ़ जाता है तो प्रकृति का शोषण करना शुरू कर देता है, कुल इतनी-सी बात है।






