इंसान और जानवर: दर्द भी, उम्मीद भी || आचार्य प्रशांत, बातचीत

प्रश्नकर्ता: पहले तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद। जब मैंने एनिमल क्रूएलिटी (पशु क्रूरता) के सम्बन्ध में काम करना शुरू किया था उन्नीस-सौ-चौरानवे में तो जागरूकता भी बहुत कम थी लेकिन शायद उस तरह की औद्योगिक क्रूरता भी बहुत कम थी जो हम अब देख रहे हैं। तो निरन्तर माँस की बढ़ती माँग के साथ मनोरंजन की माँग के साथ, प्रयोगों की माँग के साथ और लोगों की तमाम तरह की विलासिताओं की अनावश्यक माँग के साथ अब जिस क़दर पशुओं पर, जिस मात्रा में पशुओं पर क्रूरता हो रही है वो पहले बिलकुल भी न देखी थी, न सुनी थी।
आज की तारीख में दस हज़ार करोड़ थलचर जीवों को, मतलब मछलियों को तो हम टनों में गिनते हैं उनकी तो गिनती ही नहीं है हंड्रेड बिलियन (दस हज़ार करोड़) थलचरों को हर साल काटा जाता है सिर्फ़ मानव भोजन के लिए। नाइनटी बिलियन (नौ हज़ार करोड़) जानवरों पर हम प्रयोग कर देते हैं। ये सब जो है ये क्या है, ये एक तरह का सर्वनाश है जो हम बढ़ाते चले जा रहे हैं और ये अनसस्टेनेबल (अरक्षणीय) है। ये शायद जहाँ हम खड़े हैं ये चरम सीमा है, ये चरम सीमा प्रतीत होती है। इससे बुरा और क्या हो सकता है कि हम करोड़ों मुर्गियों को इतनी-इतनी सी जगह में आजीवन क़ैद करके रख लेते हैं कि हमें उनसे रोज़ एक अंडा चाहिए और जिस दिन वो अंडे देने कम करेगी हम उसको मार देंगे!
ये न हमारे भारतीय संस्कृति में है इस प्रकार का पशु पालन और न हमारी इंसानियत की नियत ऐसी होनी चाहिए कि इस्तेमाल करो और खा जाओ।
आचार्य प्रशांत: तो आपने कहा लगभग तीस-पैंतीस करोड़ जानवर जिसमें मछलियांँ शामिल नहीं हैं प्रति दिन दुनिया में।
प्र: प्रतिवर्ष।



