दुर्गा सप्तशती कहती है कि शुंभ के मरते ही आकाश स्वच्छ हो गया, नदियाँ ठीक मार्ग से बहने लगीं और पवित्र वायु बहने लगी। यानी असुर वो है जो आकाश को गंदा करे। आज वही काम वो करते हैं जो दिखाते हैं कि वो कितना भोगते हैं, और हम उन्हें अपना आदर्श बना लेते हैं। समस्या वो नहीं, हम हैं: हमें नहीं पता कि सम्मान किसे देना है। जब तक हम सत्य को सम्मान नहीं देंगे, तरह-तरह के झूठों को देते रहेंगे। तो हम किसे अपना आदर्श बनाए हुए हैं?
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[दुर्गा सप्तशती के तृतीय चरित्र पर एक सत्र से। निशुंभ मारा जा चुका है। अब शुंभ और देवी आमने-सामने हैं।]
आचार्य प्रशांत: अब उधर से शुंभ और इधर से देवी अकेली हैं। और शुंभ जितना जो कुछ कर सकता था, सब करा। उसने देवी के कई बार अस्त्र भी काट दिए, और एक-दो बार उसने देवी पर आघात भी कर दिया गदा से। यह आख़िरी लड़ाई है, तो वो बहुत लंबी-चौड़ी चलती है। तो एक जगह आती है जब वो सीधे आकर के सामने ही खड़ा हो जाता है और देवी पर मुष्टिका प्रहार करता है, मुक्के से, बहुत ज़ोर से। आगे पता नहीं यह बताया जा रहा है कि असुर बड़े बलशाली हैं या उनका मज़ाक उड़ा के अपमान किया जा रहा है। असुर मुक्का तानकर बड़े वेग से देवी की ओर झपटा और उसने देवी की छाती में मुक्का मार दिया। जब उसने मुक्का मार दिया, तो देवी ने उसको चाँटा मार दिया। (श्रोतागण हँसते हैं) देवी का थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुंभ पृथ्वी पर औंधे मुँह गिर पड़ा।
अब यह दैत्य हैं। मुक्का-उक्का मारने गए थे, और मतलब समझो क्या है। तुम हो गए बहुत बड़े दैत्य, प्रकृति का एक चाँटा तुम्हारे लिए काफ़ी है। कलपते रहना फिर इधर-उधर। फिर वो आसमान पर चढ़ गया। आसमान से वर्षा करने लग गया तीरों की। तो जब बहुत हो गया यह सब, तो फिर देवी ने उसको मार ही दिया।







