नहीं तो तुम क्या करोगे कि अपने से बाहर की किसी चीज़ को बार-बार भगवान का नाम देते रहोगे। तो जैसे मुझसे बाहर ये एक गिलास रखी है, ये मग रखा है, वैसे ही मैं कह देता हूँ, मुझसे बाहर एक भगवान है। और वहाँ बैठा है भगवान, वहाँ बैठा है। यहाँ पर (अपने हृदय की ओर इशारा करते हुए)। तुम्हीं जब साफ और शुद्ध हो जाते हो, तो जो भीतर है, उसको कहते हैं परमात्मा। और नहीं कुछ होता है। अब तुम भीतर से हो, बिलकुल क्रूर, हिंसक, मांसाहारी, अज्ञान और अंधेरे से भरे हुए और दावा तुम्हारा ये है कि तुम काम जो भी कर रहे हो, वो भगवान के इशारे पर कर रहे हो, तो पागलपन हो गया न। हो गया कि नहीं हो गया? भई! तुम अगर नशे में हो। तुमसे कोई आकर कुछ बोल भी रहा है, तो उस बात का अर्थ कौन करेगा? तुम्हीं करोगे, तो उल्टा-पुल्टा करोगे न। तो तुम तक कोई भी सही बात पहुँचे, इसके लिए तुम्हारी अपनी रौशनी ज़रूरी है न। तभी तो तुम्हें बात समझ में आएगी। हाँ तो तुम्हारी ही जो अपनी रौशनी है, वही आख़िरी चीज़ है, वही परम है। उसका इस्तेमाल करना होता है पूरा, ऐसे नहीं कह देना होता कि उसने बता दिया तो मैंने विश्वास कर लिया, ये था, वो था।
हाँ , निश्चित रूप से बाहर ऊँचे लोग हुए हैं। बाहर उत्कृष्ट किताबें हुई हैं। हम उनको पढ़ेंगे। लेकिन हम उनको कुछ नहीं समझ पाएँगे, अगर हम अपनी चेतना का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। समझ में आ रही बात ये? मैं जो धार्मिक किताबें हैं, उनको ठुकराने के लिए नहीं बोल रहा हूँ। मैं तो कहा करता हूँ, पढ़ो-पढ़ो-पढ़ो , पढ़ना बहुत अच्छी बात है, पढ़ना बहुत जरूरी बात है। लेकिन जो कुछ भी पढ़ रहे हो, उसमें तुम्हारा विवेक कहाँ है, तुम्हारा डिस्क्रिशन, तुम्हारी चेतना कहाँ है? जो पढ़ रहे हो, उसको तुम समझ कहाँ पा रहे हो? और समझ पा नहीं रहे हो, बस माने ले रहे हो, बिना अपने विवेक का इस्तेमाल करे तो फिर गड़बड़ होगी न?