आचार्य प्रशांत: लड़की-लड़का साथ रहेंगे, तो उसमें एक सेक्सुअल डायमैन्शन (यौन आयाम) हमेशा रहेगा। इस बात को न नकारने से कोई फ़ायदा है, न इस बात का विरोध करने की कोई ज़रूरत है। ठीक है?
हाँ, अब आपको क्या करना है, आपको याद रखना है कि आप कौन हो, आप सारी सेक्सुअलिटी (कामुकता) के होते हुए भी उसके केंद्र में एक चेतना हो, देह नहीं। ठीक है?
आपकी देह हो सकती है महिला की हो, लेकिन चेतना तो मुक्ति चाहती है न। वो पुरुष होने से भी मुक्ति चाहती है और स्त्री होने से भी मुक्ति चाहती है।
चेतना को पसन्द ही नहीं है कि उसके ऊपर कोई भी पहचान थोपी जाए। आपने चेतना पर पहचान थोप रखी है, वुमन। वुमन चेतना छटपटाती है, कहती है, 'क्यों वुमन बनकर जीना है?'
चेतना को आपने बोल दिया है, 'अमीर-अमीर या गरीब-गरीब, या कुछ भी बोल दिया है। चेतना को किसी भी तरह की पहचान, आईडेंटिटी, परिचय पसन्द ही नहीं है। उसे मुक्ति चाहिए, हर चीज़ से मुक्ति चाहिए। ठीक है?
तो ये याद रखते हुए दोस्ती करनी है। साथ में लेकिन, आप कर लो दोस्ती, आपका इरादा भले ही ये है कि मुक्ति चाहिए। लेकिन दोस्ती करने तो ये शरीर ही गया न। इस ही को लेकर गये हो न?
अपना परिचय देंगी, मैं ये हूँ, ये मेरा नाम है, वो भी अपना परिचय देगा, ये मेरा नाम है। अब वो नाम में ही आपका




