जवान हो, और सही काम चुनना है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जैसे ठंड लगने पर लकड़ी को जलाया जाता है, मुझे ऐसा लग रहा है कि वैसे ही आप गंगा के किनारे ठंडे तट पर, मध्य रात्रि में बैठे हैं और हमारी समस्याओं को सुलझा रहें हैं। कहीं हम गुरु को भी अपनी रोशनी के लिए तो नहीं जला रहें हैं। यदि हम न करें तो ये हमारे प्रति अन्याय होगा और करते हैं तो इसमें मुझे हिंसा दिखती है। परन्तु हमारे पास ज़्यादा विकल्प नहीं हैं, मार्गदर्शन चाहूँगा, धन्यवाद।
आचार्य प्रशांत: देखो, लकड़ी यदि बची रहना चाहती हो तो उसके प्रति हिंसा होगी, उसको जला देना। लकड़ी का यदि स्वभाव हो बचे रहना तो उसके प्रति हिंसा होगी, उसे जलाने की कोशिश करना। कोई अगर इसी में अपना स्वार्थ मानता हो कि वो तुम्हें देना ही चाहता है, तो उससे ले लेने में कोई अन्याय या हिंसा नहीं कर दिया। जो न देना चाहता हो, उससे लेना हिंसा हो सकती है। जो देने के लिए तत्पर ही हो, जिसका उद्देश्य ही हो देना, उससे लेने में कोई हिंसा या क्रूरता वगैरह नहीं है।
हो सकता है कि इस वक़्त यहाँ बैठकर मुझे ठंड वगैरह लग रही हो। मुझे अगर लग रही होगी तो आप सबको भी लग रही होगी। हो सकता है कुछ तकलीफ़ हो रही हो। प्रश्न ये है कि ज़्यादा बड़ी तकलीफ़ कौनसी होगी, ये बातचीत करने में या ये बातचीत न करने में? विकल्प तो मेरे पास भी है कि मैं कह दूँ कि रात बहुत हो गयी, ठंड बहुत हो गयी, चलते हैं फिर कभी।
और हर आदमी अपने अनुसार, अपने हित का ही काम करता है। मैं अगर कह रहा हूँ कि नहीं अभी बात करेंगे, तो उसमें कहीं-न-कहीं मुझे अपना हित दिख रहा है, तभी कह रहा हूँ कि बात करते हैं। तो इस तरह की कोई ग्लानि अपने मन में मत डालिए। आपने कोई हिंसा इत्यादि नहीं कर दी। ये जो तकलीफ़ है, जो हम यहाँ बैठ के झेल रहे हैं, ये छोटी तकलीफ़ है और साझी तकलीफ़ है।
पहली बात, तो इतनी बड़ी तकलीफ़ नहीं है कि किसी का शरीर जम ही जाए या अकड़ ही जाए। मेरे साथ तो इतना नहीं हो रहा, आपके साथ हो रहा है क्या? (श्रोताओं से पूछते हुए) इतना ज़्यादा तो नहीं है। और दूसरी बात, अगर है भी तो किसी एक के साथ नहीं है, सबके साथ है। और तीसरी बात, ये है कि अगर ये न करें तो क्या करें? ये न करें तो क्या करें?



