
अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।













आचार्य प्रशांत: एक-से-एक फुद्दू लड़के जिस दिन ये होता है कि परिणाम घोषित हुआ। उस दिन वो बादशाह हो जाते हैं। (श्रोतागण हँसते हैं) शहर भर की लड़कियाँ जो उनसे अछूतों सा व्यवहार करती थी कि तुम्हारी छाया भी हमारे ऊपर न पड़े। (श्रोतागण हँसते हैं) वो ख़ुद ले जाकर


प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुदेव। चरण स्पर्श। मुझे प्रश्न नहीं करना है एक अनुरोध है कि आपके पिछले शिविर से जो कुछ सीखा उससे कामवासना में निम्नता आई, जिससे पत्नी की ओर से खिन्नता हमको समझ में आई। पत्नी से सत्र से जुड़ने का अनुरोध भी किया। आरम्भ में वो तैयार नहीं





प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! आचार्य जी, एक सिचुएशन है। जैसे बाहर कुछ हो रहा है दुख-सुख और वो मेरे पर घट रहा है और पीछे से कोई देख रहा है।और फिर उसको मैं जानना चाह रही हूँ कि वो कौन है। फिर जैसे ही मैं कोई भी चीज़ देख रही

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जो सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) की जो आज के टाइम में हमको

प्रश्नकर्ता: सर, रिलिजन (मज़हब) को मानने का रीज़न (कारण) सिक्योरिटी (सुरक्षा) के अलावा कुछ और...

प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि मम्मी हमसे कहती हैं कि तुम्हारे कारण हम अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाये। तो सर, उनकी इच्छा तो यही थी न कि हम भी कॉलेज में जाएँ। तो सर, वो ऐसा क्यों कहती हैं कि हम तुम्हारे कारण अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाये?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। ये मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी टाइम से में तनाव में रहा। सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ों, आपके सारे पुराने वीडियोज़ में देख रहा था। तो उसमें आपने ये कहा था कि अपनेआप

आचार्य प्रशांत: जो तुम कर रहे हो वह तुम कर नहीं रहे, तुम्हें लग रहा है कि तुम कर रहे हो। पीछे से तुम्हारी वृत्तियाँ, तुम्हारा जो वह कलुषित मालिक बैठा है वह करवा रहा है, कौन सा मालिक? भगवान मालिक नहीं, कौन मालिक?


प्रश्नकर्ता: पिछले बीस-चालीस साल से ऐसा क्यों हो रहा है कि लोगों को राम पसंद आने बहुत कम हो गए हैं? तो आम जनमानस को ख़ासतौर पर जो नई पीढ़ी है उसे तो नहीं ही पसंद आते राम, इधर पिछले बीस-चालीस साल के कुछ प्रसिद्ध गुरुओं ने भी राम का

आचार्य प्रशांत: जब अन्धेरा नहीं रहता, जब बोध का प्रकाश जाग्रत हो जाता है, उद्बोध हो जाता है, तब न दिन रहता है, न रात रहती है, न सत्य रहता है, न असत्य रहता है, न सर्दी रहती है, न गरमी रहती है, न सुख रहता है, न दुख रहता

प्रश्नकर्ता: सर प्रणाम। सादर नमन। सर इतनी बातें सुनने के बाद अपनी मन की एक मूर्खता के विषय में आपसे सवाल है। ये अच्छा और बुरा लगता है कि हमने समझ लिया। इस बात पर भी शक है कि अगर मैंने समझ लिया, तो फिर मैं उसपर चल क्यों नहीं

आचार्य प्रशांत: भारत का अपराध यह रहा है कि भारत ने जीवन की कुछ सच्चाइयाँ जानी हैं। जो उन सच्चाइयों को जान ले वह खतरनाक हो जाता है, उसको दबाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। जानते हो भारत ने कौन सी सच्चाई जानी है? भारत ने जान लिया है कि

आचार्य प्रशांत इस वक्त उत्तराखंड में दो सौ से ज़्यादा बाँधों का, डैम्स का निर्माण चल ही रहा है। और उसके अलावा सैकड़ों अन्य किस्म की तथाकथित विकास परियोजनाएँ। और ये सब-के-सब तोड़-फोड़ पर आधारित हैं। उसके अलावा हम रेल लेकर जा रहे हैं, एकदम पहाड़ की छाती तक हमें


आचार्य प्रशांत: आदमी की हवस है ‘बने’ रहने की और बने-बने ‘भोगते’ रहने की। बने रहने की हवस के कारण आदमी ज़्यादा-से-ज़्यादा जी रहा है और अपने बाद अपने पीछे बच्चे छोड़कर जा रहा है। भोगने की हवस के कारण आदमी अधिक-से-अधिक उपभोग कर रहा है।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो ‘इच्छा’ होती है वो मुझे आज तक पता ही नहीं चला कि मेरी आखिर इच्छा है क्या। जैसे कि मैट्रिक पास किया और सब दोस्त आईएससी किए, हम भी कर लिए। फिर सब इंजीनियरिंग का तैयारी करना शुरू किए हम भी किए साथ में। इच्छा नहीं…

प्रश्नकर्ता: मैं एक आध्यात्मिक संस्था से छः सालों से जुड़ा हुआ हूँ और आध्यात्मिक साधना का अभ्यास कर रहा हूँ। तीन साल तक ये साधना अच्छी चली लेकिन तीन साल पहले मेरी शादी होने के बाद मेरा ध्यान भटकने लगा।

प्रश्नकर्ता: सर, मैं आपके साथ एकदम खुलकर बात करना चाहता हूँ। मैं आपको सुनने के साथ-साथ कई ऐसे व्यक्तियों को भी यूट्यूब पर बहुत सुनता हूँ जिनकी आप आलोचना करते हैं। मैं उनसे बहुत प्रभावित हूँ और वो मुझे बहुत


प्रश्नकर्ता: आईआईटी पटना के कुछ छात्रों के प्रश्न थे। जैसे काफ़ी सारे विद्यार्थी ये जानना चाह रहे थे कि

प्रश्नकर्ता: श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया है और उसे बहुत समय से अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न कर रहा हूँ, पर निष्काम कर्म के सिद्धान्तों पर चलना मुझे दुष्कर लगता है। कृपया मार्गदर्शन करें।


आचार्य प्रशांत: (मुस्कुराते हुए) चुन्ना भाई की कहानी सुनेंगे? ये बड़ा गूढ़ रहस्य था, जो कभी कोई जान नहीं पाया कि चुन्ना भाई आठवीं कक्षा तक पहुँचे कैसे? मैं आठवीं की बात बता रहा हूँ। ब्रह्मांड के सब रहस्यों पर से पर्दा उठ सकता है, चुन्ना भाई आठवीं तक आ

प्रश्नकर्ता: उपनिषदों के ऋषि कहते हैं कि परमात्मा अति सूक्ष्म या अति वृहद है और हमारे हृदय में स्थित है। इस बात का प्रमाण क्या है, और उन्हें कैसे पता?
आचार्य प्रशांत: इस बात का कोई प्रमाण नहीं होता कि वो सूक्ष्म से सूक्ष्म या बृहद से बृहदतर है। इस…

आचार्य प्रशांत: एक बार मुझसे पूछा था कि उपनिषद कहाँ से आते हैं। ‘न’ से उठता है उपनिषद्। न से। तो वेदान्त ‘न’ है। ‘न’। नकार — नहीं, नहीं। किसके खिलाफ़ नहीं? ‘ये जो मेरी हालत है, ऐसे नहीं जीना है।’ इसको वेदान्त कहते हैं। और अगर मेरी हालत ऐसी

आचार्य प्रशांत: हम क्यों चाहते हैं बच्चा? और ये ख़तरनाक है सवाल पूछना क्योंकि हमें नहीं पता हम क्यों चाहते हैं। हम सिर्फ़ इसलिए चाहते हैं क्योंकि सबके पास बच्चा है। जैसे कि ये (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) बोले कि उनके पास भी गुब्बारा है, उसके पास

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये जो होते हैं माँस-मच्छी खाने वाले, इनसे मैंने काफ़ी बार बात की है। जैसे ज़िम में मिलते हैं, या कहीं मिलते हैं। और बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी, इनके पास एक तर्क रहता है कि यह जो माँस-मच्छी होते हैं इनका अमीनो प्रोफाइल
ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?
तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।
भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?
प्रेम भी इच्छा ही है, वो बहुत ऊँचे स्तर की इच्छा है। प्रेम नहीं आया, इच्छा ही कम कर ली तो मुर्दा हो गए।
आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…
हर वो चीज़ जो हमारे भीतर के "जानवर" को अच्छी लगती है, वह तुरंत प्रसिद्ध हो जाती है। आप लोकप्रिय होना चाहते हो? कोई बहुत अच्छा या ऊँचा काम मत करना—कोई एकदम घटिया काम कर दो, तुरंत पॉपुलर हो जाओगे। कोई ऐसा काम करो जो एकदम ही गिरे हुए तल का हो। ऊँचा काम करोगे, तो लोगों को समझ में नहीं आएगा, दिखाई भी नहीं देगा और लोग डर भी जाएँगे—क्योंकि ऊँचाई खतरा होती है और ऊँचाई कुर्बानी मांगती है। कौन ऊँचा चढ़े? श्रम भी बहुत लगता है। तो बिल्कुल, कोई एकदम साधारण या साधारण से भी नीचे का कुछ करने लगो, लोग आकर्षित हो जाते हैं आपकी ओर।
सबके ऊपर ये एक बहुत बड़ा फ़ितूर होता है कि अगर बिकेंगे नहीं, तो जिएँगे कैसे? पैसा कहाँ से आएगा? जितना तुमको चाहिए, सचमुच उतना आ जाएगा। और अनाप-शनाप पैसा चाहने की कोई सीमा होती नहीं है। इसीलिए हर इंसान बिक जाता है इन दो चीज़ों पर — एक, कंचन (कंचन माने सोना, पैसा); और दूसरा, कामिनी (कामिनी माने वासना)। इन दो से बचे रहो, तो हो गई क्रांति — एक सही ज़िंदगी अपने आप जीने लगोगे।
फटी हुई जींस पहनने, और बाल रंगवाने से कोई कूल नहीं हो जाता। कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है, परंतु कूल हो नहीं, और ख़ुद को कूल कहो — यह समस्या है। कूल होना आध्यात्मिक बात है। कूल होने का असली मतलब है कि तुम श्रीकृष्ण का ज्ञान जानो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — तू विगत-ज्वर हो जा। जिसे ज्वर न चढ़े, जो आवेश और आवेग से मुक्त हो, वही वास्तव में कूल है।
हम चाहते हैं कि दुनिया की टॉप कंपनी का नाम, ब्रांड, उसकी पर्क्स-प्रिविलेजेस भी मिल जाए, और साथ ही बिल्कुल साफ़ काम करने की संतुष्टि भी मिल जाए। अगर आपको गरिमा के साथ सही काम करना है, तो फिर इस पूरी व्यवस्था से बाहर निकलकर अपने लिए एक अलग रास्ता बनाना पड़ेगा, नहीं तो आपको पाखंडी होना पड़ेगा। जैसे बड़ी कंपनीज़ पहले पॉल्यूशन करते हैं और फिर CSR का पाखंड।
जो सबसे अच्छे काम होते हैं उस पर दुनिया कभी इज़्ज़त नहीं देती। दुनिया इज़्ज़त बस उन कामों को देती है जो दुनियादारी के होते हैं। दुनिया जैसे ही काम करो, दुनिया द्वारा स्वीकृत काम करो, दुनियादारी में ही तुम भी लोटने लग जाओ, तो दुनिया इज़्ज़त देगी। सचमुच जो ऊँचे काम होते हैं, उसकी तो कभी इज़्ज़त मिलेगी ही नहीं। तो जो इज़्ज़त के बहुत प्यासे हैं वो फिर कभी सचमुच ऊँचे और अच्छे काम कर भी नहीं पाएँगे। ज़िंदगी में सचमुच अगर कोई काबिल-ए-तारीफ़ काम करना है, कोई मौलिक काम करना है, तो इज़्ज़त की चाह के साथ नहीं करा जा सकता।
अगर पीने से तुमको समाधि मिलती होती तो मैं बिल्कुल नहीं मना करता पीने से। तो समस्या पीने में नहीं है। बात ये है कि जब पी रहे हो तो समाधि से और दूर होते जा रहे हो। जब पी रहे हो तो जो तुम्हें वास्तव में चाहिए उससे और दूर होते जा रहे हो। पीने में ये बुराई है। कोई आकर के अगर सिद्ध कर दे कि पीने से उसे परमात्मा मिलता है तो मैं कहूँगा, ‘तू अब पानी भी मत पी, सिर्फ़ शराब पी।’ कसौटी शराब नहीं है, कसौटी परमात्मा हैं। पर उसका तो तुम नाम ही नहीं ले रहे।
आपके लिए लग्ज़री सिर्फ़ मटेरियल होती है। और इसीलिए फिर आप पैसे के पीछे भागते हो क्योंकि पैसा तो टेंजिबल चीज़ें ही ख़रीद सकता है। न्यूयॉर्क में बंगला ख़रीदा है, क्या बस यही लग्ज़री है? बड़ी-से-बड़ी लग्ज़री है, एक सही और सच्चा जीवन। लग्ज़री होती है कि बिना बात के डरना नहीं पड़ता। ये पैसे देकर नहीं ख़रीदी जातीं। तुम जीवन के ग़ुलाम बनकर न जियो, जीवन में इससे बड़ी और क्या लग्ज़री हो सकती है?
आपको पता हो कि कोई चीज़ अभी सुख देगी लेकिन चार दिन बाद दुख देगी, फिर भी आप उसे ठुकराने के बजाय स्वीकार करोगे। क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते समय सोचते हो, 'अभी मौज कर लो, आगे की देखी जाएगी।' ये जानवरों की हरकत है। कर्ज़ लेना हो तो सौ बार पूछो, 'क्या यह जरूरी है?' सौ बार जवाब 'हाँ' हो, तभी लो। कोई चीज़ ललचाए तो उसे टालो, और अगर आवश्यक हो, तो पहले पैसा जोड़ो, बाज़ार के शिकार मत बनो।
कोई एक उत्तर नहीं दिया जा सकता। बहुत सारे ऐसे कार्यकर्ता भी होते हैं उनके लिए यही उचित है कि वो उस जगह पर न रहें जहाँ पर वो फिलहाल हैं। वो अगर निकाले जाते हैं या वो स्वेच्छा से ही अपने *ऑर्गेनाइज़ेशन* (संस्था) का, कम्पनी का, संगठन का त्याग कर देते हैं तो इसमें उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा, भलाई हो रही है।
‘आइ लव यू' कहने के लिए पहले ‘आइ’ को जानना होगा | तुम ठीक हो जाओ उसके बाद सामने वाले के दस चेहरे तुम्हारे लिए समस्या नहीं रह जाऍंगे। अभी तुम्हें उसके दस चहरों से इसलिए समस्या हो रही है क्योंकि तुम्हारे भी अपने दस चेहरे हैं। ‘आइ’ की, ‘मैं’ की, ‘अहम्’ की, अपनी बात हम नहीं करना चाहते। |‘यू’ ऐसे है, ‘यू’ ऐसे है, प्रेम ऐसा है। अरे वो ‘यू’ तो बहुत-बहुत बाद में आता है, शुरुआत किससे होती है? ‘आइ’ से। इस ‘आइ’ को ठीक करो पहले।
आचार्य प्रशांत: ख़ासतौर पर आप अगर आज की पीढ़ी को देखें — मैं बात को ज़रा व्यापक तौर पर ले रहा हूँ सबके लिए — तो ये डाँट खाने को राज़ी नहीं हैं। जिन्हें आप मिलेनियल्स (सहस्त्राब्दी) बोलते हैं, इन्हें आप डाँट के देख लीजिए। अब क्या ये सिर्फ़ संयोग…
आचार्य प्रशांत: दुर्गा सप्तशती ले रहे हैं। उसका जो मध्यम चरित्र, दूसरा चरित्र है, तीन चरित्र हैं उसमें। तो जो दूसरा उसका चरित्र है, वो अध्याय दो-तीन-चार से आता है। इसमें प्रकृति माने देवी अपने रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। ठीक है? यहाँ जो उनका नाम है, वो है…
आचार्य प्रशांत: क्या करना है, क्या नहीं करना है। क्या होना है, क्या नहीं होना है। दिशा कौनसी लेनी है, नहीं लेनी है इसका निर्णय अहंकार ही करता है। और आप ये नहीं कह सकते कि अहंकार ने अपने लिए गलत निर्णय करा। कोई और देखें, तो कह देगा कि…
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२.६४।।
राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्याय, सांख्य योग, श्लोक क्रमांक चौंसठ। “राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त…
आचार्य प्रशांत: बिलकुल भी कुछ और नहीं है। तुम देखो न, पुराना आदमी है आदिमानव... सूर्यग्रहण आया, सोलर इक्लिप्स तो वो क्या बोलेगा? वो बोलेगा कि आज किसी राक्षस ने सूरज को पकड़ लिया है…
आचार्य…
श्रोता: अहम्।
आचार्य: हाँ, वह जो…
आचार्य प्रशांत: जो ये सारा छवि बचाने का खेल है, ये माल के लालच का खेल है।
ये जो पूरी बात ही है कि समाज में अपनी छवि अच्छी रहे, इज्ज़त ऊँची रहे, समझिए अच्छे से, कि वो बात पूरे तरीक़े से भौतिक है, मटेरियल है। भौतिक है, मटेरियल है।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। सौभाग्य है कि उपनिषद् को इतनी सरलता से आपके साथ सुनने का अवसर मिला। मेरा प्रश्न है कि जब मैं अपने सम्बन्धों को देखता हूँ, मैं पाता हूँ कि मैं हमेशा ही उलझा रहता हूँ। समस्या को ढूँढने की भी कोशिश करता हूँ और मैं और…
समाधान तो बहुत सरल…
प्रश्नकर्ता: जो सबसे प्रमुख सिद्धान्त मैं सुनता हूँ बाजार में या इंटरनेट पर वो है थ्योरी आफ़ कर्मा। जिसको मैं कर्म भी नहीं बोलूँगा, मैं थ्योरी ऑफ़ कर्मा ही बोलूँगा, क्योंकि वो अपने विकृत रूप में ऐसे ही बिकती और चलती है। जहाँ मैंने ये बोल दिया कि अच्छा काम…
मैंने शादी के जो सपने संजोए थे कि उच्चतम सुख…
आचार्य प्रशांत: जो कुछ होली के नाम पर होता है उसमें प्रह्लाद तो कहीं नहीं है उसमें होलिका-ही-होलिका है लोगों ने ये जो नाम है होली लगता है इसका कुछ गलत अर्थ कर लिया। उन्हें लगा होली का मतलब है कि आज होलिका माता को याद करना है और उनको…
आचार्य प्रशांत: निष्काम कर्म का अर्थ हमारे लिए है कि कामना…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…
आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…