हम जिसे कॉन्शियसनेस कहते हैं, वह पूरी तरह प्रेडिक्टेबल और रूल-बेस्ड है। कॉन्शियसनेस की जो हमारी परिभाषा है, वह इतनी सीमित है कि AI उस पर आसानी से फिट हो जाता है। मुक्ति अकेली चीज़ है जो फिलहाल मशीन के लिए संभव नहीं दिख रही है। और आप भी मशीन सिर्फ़ तब नहीं हैं, जब आप में मुक्ति की ललक हो। इसलिए AI से पहले, अपनी ज़िंदगी पर विचार करें — आख़िर हमारी ज़िंदगी इतनी मैकेनिकल क्यों है कि एक मशीन भी उसकी नकल कर सकती है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम धीरज है और मैं एक AI इंजीनियर हूँ। तीन-चार साल से मैं AI सोल्यूशन्स बना रहा हूँ, मेरी रुचि कुछ काफ़ी शुरू से ही इसमें है कि कॉन्शियसनेस जो चेतना है वो, भौतिक। जैसे जहाँ तक मैंने आपको सुना है कि ये भी एक भौतिक ही, हमारा मन ही उसे पैदा करता है, ये एहसास भी कि "ये मैं हूँ।" तो क्या AI भी कॉन्शियस हो सकता है?
मैं आपके अनुसार जानना चाहूँगा, मैं नहीं चाहता कि स्टैण्डर्ड्स जो हैं या फिर बाहर किताबों में जो लिखा है, वो नहीं। आपके हिसाब से कैसे होना चाहिए? क्या AI कॉन्शियस हो सकता है? क्या वो वही चेतना पा सकता है जो हमारे पास है, जिसमें वो अहम् का भाव होता है?
आचार्य प्रशांत: ये जो लहजा है ना ये जो मुहावरा है "आपके हिसाब से" इसका प्रयोग करने से बचते हैं। क्योंकि अगर मेरे हिसाब से कुछ है, तो आपके हिसाब से भी कुछ हो सकता है। सबके अपने-अपने हिसाब हैं, किसी दूसरे के हिसाब को ले के क्या करोगे? हमें किसी और का हिसाब नहीं जानना है, हमें सत्य जानना है।




