प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं पूरे ध्यान से भी सुनूँ तो भी बाद में याद बहुत कम रहता है, कुछ बातें याद रह जाती हैं बाकी नहीं। क्या मेरा दिमाग़ चुन-चुनकर सुन रहा है और बाद में बाकी बातों को अनसुना कर रहा है?
आचार्य प्रशांत: ये बात बहुत गौर या चिन्ता करने की होती नहीं। बहुत लोगों ने ये सवाल बहुत बार पूछा है। मैं तो कहता हूँ कुछ भी न याद रहे, तुम सुनो बस। स्मृति तक कुछ जाता है या नहीं जाता उसकी बहुत परवाह मत करो, तुम सुनो बस। स्मृति महत्वपूर्ण नहीं है, श्रवण महत्वपूर्ण है। ये ज़मीन है, अब ज़रा सूख रही है, अभी पानी बरसा था परसों। बताओ, वो कहाँ गया? इसी ज़मीन पर गिरा था वो कहाँ गया? कहाँ है वो? वो गहरे समा गया, वो दिखाई नहीं देगा पर प्रमाण है, परोक्ष क्या प्रमाण है? ये पेड़ प्रमाण है उस पानी का। ये मिट्टी मन है तुम्हारा, ये पेड़ जीवन है तुम्हारा। जो बूँदें गिरती हैं उनको अनुग्रह जानना, वो गुरु के वचन हैं। वो तुम्हारे मन की सतह पर दिखाई दें, मिट्टी की सतह पर दिखाई दें आवश्यक नहीं है।
वो परतें हैं और फिर गहरे चले जाते हैं। गहरे चले गये तो अदृश्य हुए हैं, विलुप्त नहीं हो गये, जहाँ वो गये हैं वहाँ से वो जीवन देंगे; किसको? इन पेड़ों को। तो उन वचनों का प्रभाव तुम्हारे जीवन पर दिखाई देगा, तुम्हें याद भले नहीं है। पर तुम्हारी ज़िन्दगी में हरापन आएगा इन पत्तियों की तरह।
देखिए, मैं जो भी कह रहा हूँ वो न सुनने का बहाना न बन जाए। अगर मैंने कोई बात कही है और कोई तुम्हें बार बार याद दिलाता है कि कही गयी थी, फिर भी तुम्हें याद नहीं आती तो इसका अर्थ ज़रूर है कि वो बात तुमने जान-बूझकर अनसुनी करी है। फिर तुम्हे अपने आप से सवाल करना होगा कि कहीं मेरा मन मेरे साथ खेल तो नहीं खेल रहा। स्मृति लक्ष्य नहीं होना चाहिए, लक्ष्य होना चाहिए पूर्ण श्रवण।
शास्त्र कहते हैं, श्रवण, मनन, निदिध्यासन तदोपरान्त समाधि। मैं कहता हूँ, श्रवण में यदि समग्रता है तो आगे के सारे चरण भी शीघ्र ही, स्वतः अपितु तत्क्षण भी हो सकते हैं। सुनने के बाद नहीं होगा चिन्तन-मनन, नहीं होगा निदिध्यासन, फिर उसके बाद नहीं कभी आएगी समाधि। पूर्णता से, गहराई से, समग्रता से सुना तो सुनना ही समाधि हो जाएगा। सुनते-सुनते पाओगे कि तुम बचे नहीं। कितने नहीं बचे ये तुम पर निर्भर करता है।




