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फ़रेब नहीं करना तो नहीं करना || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर प्रणाम। सादर नमन। सर इतनी बातें सुनने के बाद अपनी मन की एक मूर्खता के विषय में आपसे सवाल है। ये अच्छा और बुरा लगता है कि हमने समझ लिया। इस बात पर भी शक है कि अगर मैंने समझ लिया, तो फिर मैं उसपर चल क्यों नहीं रहा हूँ। गलत चीज़ को जो मुझे लगता है करना है, उसको मैं नहीं टालता। जो सही चीज़ है, उसको करने में जो श्रम लगाना है, वो मैं नहीं लगा रहा। उसको एक फ्यूचर (भविष्य) के लिए खूबसूरती से उसको टालना की मैं उसको अभी रूककर आराम से बहुत अच्छे से उसको करता हूँ। ये मन की मूर्खता समाप्त ही नहीं हो रही है। इसमें मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: नहीं, सबसे पहले तो ये कोई विशेष स्थिति नहीं है। यदि यह मूर्खता है भी तो इसकी ओर आपको धकेला प्रकृति ने है। तो इसको मूर्खता कहने की जगह आप कहिए – जीवित होने का, जन्म लेने का तकाज़ा या दंड। साधारण है ये बात, ये होगा।

चेतना के लिए ऊँचा-नीचा होता है, प्रकृति के लिए कुछ ऊँचा-नीचा नहीं होता है। प्रकृति के लिए बस एक व्यवस्था होती है जिस पर वो आपको चलाना चाहती है। और आप उस व्यवस्था से हटते हैं, तो आपको प्राकृतिक तौर पर कष्ट भी होता है। हम पैदा ही ऐसे होते हैं।

तो एक तरफ़ तो मैं कहता हूँ कि जो कुछ भी जीवन में ठीक न हो रहा हो,जान लो कि उसमें तुम्हारा चुनाव निहित है, स्वयं को ही दोष देना, मजबूरी कुछ नहीं होती। बिना हमारी मर्ज़ी के कुछ नहीं हो सकता। एक ओर तो मैं ये कहता हूँ। दूसरी ओर आप ये भी समझ लीजिए कि जो कुछ हो रहा है, वास्तव में आपको उसमें धकेला गया है। हम अपनी हालत खराब बाद में करते हैं, हम खराब हालत में पैदा ही होते हैं पहले। हाँ, हम इतना ज़रूर करते हैं कि खराब को बहुत खराब कर लेते हैं, बैड को वर्स (ख़राब से और ख़राब) कर लेते हैं।

तो अपनी ज़िन्दगी में अगर आप खराबियाँ पाएँ, तो बहुत चौंकने की बात नहीं है। उन खराबियों का इन्तज़ाम तो आपके जन्म से पहले ही हो चुका था। आसमान से नहीं उतरते हम, मुक्ति के लिए जन्म नहीं लेते हम। दो शरीरों की कामवासना जब टकराती है तो उसमें से कामना का ही एक और पिंड पैदा हो जाता है, उसको मनुष्य कहते हैं।

दो विक्षिप्त कामनाएँ मिल रहीं हैं, मिल भी नहीं रही हैं टकरा रही हैं, घर्षण कर रही हैं आपस में, संघर्ष है उनका। दो विक्षिप्त कामनाएँ टकरा रही हैं, उसमें से कामना का एक नन्हा सा पिंड पैदा हो गया। ऐसी तो शुरुआत है। अब आगे क्या कुछ शुभ होने वाला है? कहते हैं न, ‘आगाज़ ऐसा है तो अंजाम क्या होगा।’

तो एक ओर तो अपनेआप को दोष देना है। क्योंकि बात हमारे चुनाव की होती है मजबूरी की नहीं। दूसरी ओर ये भी याद रखना है कि हमको डाला ही एक विषम परिस्थिति में गया है। जैसे कि कोई बल्लेबाज उतरे ही तब जब स्कोर हो पच्चीस रन पर पाँच विकेट। अब उसके बाद भी उसकी ज़िम्मेदारी है कि वो अच्छा खेले। उसके बाद भी मजबूरी का रोना नहीं रो सकता भई। तुम जब भी उतरे तुम अच्छा खेलकर दिखाओ। लेकिन हम ये बात भी नहीं भूल सकते कि वो उतरा ही तब था जब पच्चीस पर पाँच गिर चुके थे। तो दोनों बातें याद रखनी है।

आपका सबसे बड़ा जो दुश्मन है वो आपके साथ पैदा होता है, वही पैदा होता है नाम है उसका शरीर। और शरीर एक तन्त्र है, एक व्यवस्था है। शरीर की मुक्ति में, ऊँचाई में, समझदारी में कोई रुचि नहीं। शरीर की तो प्रेम में भी रुचि नहीं। शरीर बस एक मशीन है, एक पूर्व निर्धारित व्यवस्था और उसका उपयोग जब आप उसके तयशुदा उद्देश्य से ज़रा हटकर या खिलाफ़ करते हैं तो नाराज भी हो जाता है।

वास्तव में जो साधारण गृहस्थ वगैरह होते हैं, वो ज़्यादा स्वस्थ शरीर के होते हैं। एक हमने बड़ी भ्रान्ति सोच ली है कि आध्यात्मिक आदमी बड़ा स्वस्थ होता है। और अध्यात्म का उपयोग ही बहुत स्वास्थ्य के लिए होने लग गया है कि सेहत अच्छी रहेगी और आध्यात्मिक गुरु वगैरह आकर इसी तरीके से बिक्री करते हैं। वो कहते हैं, ये खाओ इससे सेहत अच्छी रहेगी। ये सब अध्यात्म में कहाँ से आ गया, ‘कद्दू खाना।’

और बताएँगे कि देखो हमारा मुँह कैसे चमक रहा है। क्योंकि हम आध्यात्मिक हैं न। और आध्यात्मिक हो जाओगे तो जोड़ों का दर्द ठीक हो जाएगा, आध्यात्मिक होने से गैस बढ़िया बाहर आती है। नहीं, उल्टी बात है। आध्यात्मिक आदमी को तो अपने शरीर के खिलाफ़ संघर्ष करना पड़ता है। और शरीर को ये बात अच्छी नहीं लगती है। आध्यात्मिक आदमी के बीमार पड़ने की ज़्यादा सम्भावना होती है।

बात कईयों को विचित्र लग रही है, क्योंकि हमने तो सुना ही, सोचा ही यही है कि अध्यात्म वाले बाबा जी आते हैं, वो बताते हैं, देखो बच्चा एक सौ अस्सी साल का हूँ एक भी बाल सफेद नहीं हुआ। नहीं, ऐसा नहीं है। आप आम गृहस्थ को देखिए उनके साथ ऐसा होता है कि चेहरा जगमगाता रहता है। काहे? दिनभर खीरा लगाया, नींबू लगाया, पपीता लगाया, कद्दू लगाया, नारियल में मुँह डाल दिया। जो कुछ भी हो सकता है सब करा। तो मुँह तो उनका चमकेगा न। मेरा थोड़ी चमकेगा।

इन्होंने बड़ी मेरे साथ अभी ज़बरदस्त कोशिश करी। मैंने बड़ा प्रतिकार किया। मुझे घसीटकर स्पा में डाल रहे थे। मैंने कहा, मैं जान दे दूँगा, ये नहीं होने दूँगा अपने साथ। यही पीछे वो जो रोहित महाराज हैं। वो सारी व्यवस्था कर आये थे। बोले, ऐसा-ऐसा है सेटिंग कर दी है। मगर नहीं जाऊँगा। बोले एडवांस दे आये हैं। मैंने कहा, तुम जाओ।

तो शरीर तो उसी का चमकेगा जो शरीर को ज़्यादा तेल, पानी देगा। आध्यात्मिक आदमी का काम ये नहीं है। वो ऐसा नहीं कि शरीर का दुश्मन हो जाता है और शरीर को जानबूझकर काटता-पीटता है। नहीं, ऐसा नहीं। लेकिन ये तो देखिए, सीधी सी बात है जितना गुड़ डालोगे उतना मीठा होगा। सेहत का जितना खयाल रखोगे सेहत माने, शरीर की सेहत, उतना शरीर की सेहत अच्छी होगी।

जो जितने देह केन्द्रित लोग होंगे, वो देह से उतने बढ़िया दिखाई देंगे। ये सब फिल्मी स्टार्स और दिनभर क्या कर रहे होते हैं शरीर चमकाने के अलावा। तो आपको क्या लगता है अष्टावक्र इनका मुकाबला कर लेंगे, टाइगर शराफ का। लेकिन आजकल ऐसा ही है कि जो भी कोई आध्यात्मिक अपनेआप को बताता है, वो अपने शरीर का ही बताता है कि ये देखो, मैंने ये कर लिया, वो कर लिया एक हाथ पर खड़ा हो जाता हूँ, सबकुछ पूरा। शरीर में हमारा दुश्मन बैठा हुआ है, वो चाहता है दिनभर उसी की सेवा करें।

हम कौन हैं? हम चेतना हैं। इसी कारण जब हम सो जाते हैं, तो शरीर रहता है हम नहीं रहते। अगर हम चेतना न होते तो हम सोने पर भी होते न। क्योंकि शरीर तो सोने पर भी होता है न। सो जाते हो, शरीर कहीं चला जाता है। पर आप (चेतना) कहीं चले जाते हो। आप सो जाते हो आप बचते हो? शरीर बचता है कि नहीं?

आप शरीर नहीं हो, आप चेतना हो।

लेकिन शरीर आपसे अपनी सेवा करवाना चाहता है। और शरीर कहता है कि मेरी व्यवस्था है, तुम्हारी ज़िन्दगी मेरी व्यवस्था पर चलनी चाहिए। अब ये आपको देखना है कि आपको अपने हित साधने हैं या शरीर का हुक्म बजाना है। आपका हित बिलकुल दूसरा है।

आप अभी यहाँ बैठे हो, आप चाह रहे होगे मुझे सुनना इसमें आपका हित है। आप चाह रहे हो मुझे सुनना। शरीर क्या कह रहा है? चलो न वहाँ पर बढ़िया खाकर आते हैं। पत्तल सज रहा था पर आधा घंटा बीत गया तो छोड़कर आना पड़ा। भूख सी लग रही है चलो बाहर चलते हैं। किसी का शरीर क्या कह रहा होगा, अरे अरे! नींद आ रही, कहीं इधर-उधर गद्दा मिलेगा।

यहाँ कितने लोग बैठे हैं, जिनके शरीरों ने कल या आज किसी-न-किसी समय यहाँ बैठने पर आपत्ति ज़रूर करी है? इसका मतलब ये नहीं कि आप उठाएँ, इसका मतलब ये कि मैं अपने लिए उठा रहा हूँ। (आचार्य जी खुद अपना हाथ उठाए) मेरा शरीर भी आपत्ति कर रहा है। शरीर नहीं चाहता कि आपके साथ कुछ ऐसा हो जो आपके लिए माने, चेतना के लिए अच्छा हो।

शरीर को क्या चाहिए?

बढ़िया लगाओ न (आचार्य जी अपने मुँह पर हाथ फेरते हुए) और खाना खिलाओ और सोने को दो। और उसमें निहित है कि उसका अपना संचार चलता रहे। और इसी शरीर जैसे अन्य शरीर पैदा होते रहें। यही जो इसकी कोशिकाओं में डीएनए बैठा है, यही आगे-आगे और बढ़ता रहे, बढ़ता रहे। यही बढ़ता रहे माने, यही शरीर आगे बढ़ता रहे। डीएनए का आगे बढ़ना माने, इसी शरीर का आगे बढ़ना। तो आप यहाँ बैठे भी हैं तो डीएनए भीतर चीख-पुकार कर रहा होगा। वो आप आये होंगे आचार्य जी के लिए, पर डीएनए ने अपना दूसरा ठिकाना खोज लिया होगा। वो कह रहा, उधर-उधर। आप इधर देख रहे हैं, डीएनए कह रहा पीछे देख, बगल में देखो अपना अड्डा उधर है।

तो जैसे वेक्टर एनालिसिस में आप पढ़ते थे न, एक फोर्स (बल) इधर (एक्स दिशा में) को है, एक फोर्स उधर (वाई दिशा में) को है रिजल्टेंट उधर (दोनों के बीच) को है। इसी को कहते हैं, "माया मिली न राम।" बायीं तरफ़ माया बैठी थी, आगे राम की बात हो रही थी और देख रहे हैं हम उधर कहीं वहाँ ‘च’ की ओर, 'माया मिली न राम'।

ये बात साफ़-साफ़ समझ लीजिए कि शरीर की इच्छाएँ शरीर की माँगे आपकी माँगे नहीं हैं। बहुत मूरख चीज़ है शरीर, एकदम जानवर है। बहुत उसकी नहीं सुन सकते। लेकिन ऐसा जानवर है जिसके साथ आपको बाँध दिया गया है। आप उससे पीछा भी नहीं छुड़ा सकते।

जैसे गधे की पीठ पर बाँध कर बच्चे को पैदा किया हो, वो पैदा ही हुआ है गधे से बँधा हुआ। बच्चा माने – चेतना, गधा माने – शरीर। और वो गर्भ से पैदा हुआ है बच्चा, किसके साथ? गधे के साथ। वो बँधा हुआ और ऐसा बँधा है कि जन्मभर बन्धन नहीं खुलेगा।

अब मजबूरी है क्या करें अब गधा चीख-पुकार करे, तो अपनेआप को बहुत दोष मत दीजिए। बस ये याद रखिए आप गधे नहीं हैं। वो तो अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करेगा, आपको उसकी सुननी नहीं है। हाँ, ये भी है कि अब गधे को मार भी नहीं डालना है, दाना-पानी देते रहो उसको। उसका भी क्या दोष है, उसकी भी व्यवस्था ही ऐसी है, उसने भी चुनाव नहीं करा। ये एक बेमेल गठबन्धन है, ये एक विजातीय युग्म बन गया है। दो ऐसी इकाइयाँ जिन्हें कभी एक होना नहीं चाहिए था। वो न जाने किस जादू से एक हो गयी हैं।

एक ओर है शरीर जो लगभग जड़ है। और दूसरी ओर से है चेतना जो लगभग पूरी तरह चैतन्य है। इन दोनों का तो कोई गठबन्धन होना ही नहीं चाहिए था। पर हो गया है। चूँकि ये गठबन्धन ही विजातीय है, बेमेल है, असंगत है। इसीलिए सन्तों ने बार-बार कहा है कि जन्म लेना कोई बहुत अच्छी बात नहीं। और अध्यात्म का उद्देश्य ही है जन्म-मरण के चक्र से बाहर आ जाना।

दो ऐसों का विवाह कर दिया गया है जो एकसाथ रह ही नहीं सकते, शरीर और चेतना। लेकिन एक-दूसरे के बिना भी नहीं रह सकते। जैसा सब शादियों में होता है। शरीर को हटा दो तो चेतना बचती नहीं। या बचती है? मार दिया शरीर को तो चेतना ही नहीं। गधे को मार दोगे तो बच्चा भी नहीं बचेगा। तो वो जो गधा है, उसके बिना बच्चा जी नहीं सकता। और वो जो गधा है उसके साथ भी बच्चा जी नहीं सकता। उसके साथ भी नहीं जी सकते, उसके बिना भी नहीं जी सकते।

कुछ समझ में आ रहा है?

सुनी-सुनी सी, अनुभव की बात लग रही है। शरीर माने, प्रकृति माने, सब कुछ जो प्राकृतिक है। उसके साथ जिया नहीं जा सकता। लेकिन उसके बिना भी जिया नहीं जा सकता। ऐसे चलना है, ऐसे याद रखना है। इस बेमेल गठबन्धन को किसी तरीके से आगे बढ़ाना है। जैसे पाँच साल पूरे कराने हों गठबन्धन सरकार के, कोलिएशन गवर्नमेंट उसमें तमाम तरीके के नखरे झेलने पड़ते हैं न। कोई इधर से खींच रहा है, कोई उधर से खींच रहा है, कोई ये माँग कर रहा है, कोई धमकी दे रहा है कि मैं हट रहा हूँ, गिरेगी सरकार। लेकिन फिर भी कहते हो पाँच साल चलानी है। और पाँच साल इस तरीके से चलानी है कि कुछ सार्थक काम करके दिखाना है। सिर्फ़ चलानी ही नहीं है, कुछ बढ़िया काम करके दिखाना है।

वैसे ही ये गठबन्धन सरकार है हमारा जीवन। इसको चलाना है सत्तर-अस्सी साल और सिर्फ़ खींच-तानकर चला नहीं देना है। एक सार्थक उद्देश्य है उसको पूरा करके दिखाना है। हतोत्साहित नहीं हो जाना है अगर पाओ की गधा ढेंचू-ढेंचू बोल करके इधर-उधर दुलतियाँ बरसा रहा है और किधर को भाग रहा है। गधा है, क्या करेगा। शान्त हो जाओ। देखो, क्या कर सकते हो अभी।

तो अब बहुत उत्साहित मत हो जाओ अगर कभी पाओ कि गधा शान्त खड़ा हुआ है और तुमने कुछ अच्छा कर लिया या थोड़ी देर के लिए गधा तुम्हारे इशारों पर चल रहा है। गधा अपनी प्रकृति नहीं छोड़ने वाला। बहुत विश्वास या उत्साह में मत आ जाना। किसी भी दिन वो अपने रंग, तेवर दिखा देगा। इस शरीर के भीतर विकारों की पूरी फ़ौज मौज़ूद है, वो छुपी भी रहती है कई बार, गुरिल्ला वारफेयर। अचानक से निकलकर वार कर सकती है।

तुम सोचोगे तुमने क्रोध को जीत लिया, वासना को जीत लिया, ग्लानि को जीत लिया, ईर्ष्या को जीत लिया। अचानक पाओगे कि किसी को देखा और ईर्ष्या का हमला हो गया। तुम कहोगे ये कहाँ से आ गई ईर्ष्या, मुझे तो लगा था मैंने इसको जीत लिया था। अजी! कहाँ जीत लिया था, गधा साथ है। गधा साथ है और गधा रहेगा गधा ही। कोई ईनलाइटेंनमेंट (प्रबोधन) वगैरह नहीं होता। गधा माने, गधा। गधे का ईनलाइटेनमेंट सुना।

समझ में आ रही है बात?

सतर्कता हो सकती है, सावधानी हो सकती है, ध्यान हो सकता है। शोभा नहीं देता कि गधे के साथ बँधे और बोल रहे हो मेरा तो मोक्ष हो गया। और वो बोल रहा है ढ़ेंचू। ये बात कुछ काम की है आपके?

ऐसे ही चलना है जीवनभर। कोई आखिरी विजय नहीं होने वाली। लगातार सावधान, सतर्क रहना होगा। इसकी वृत्तियाँ कभी आप पूरे तरीके से नहीं जीत पाएँगे। कभी भी नहीं। और जिन्होंने माना कि उन्होंने इसको जीत लिया है, माया ने सबसे ज़्यादा उन्हीं को चांटे लगाए। वो माने बैठे थे कि हमारा तो हो गया। आई वाज़ इनलाइटेंड ऑन द 25th ऑफ़ अगस्त, व्हाट एवर (मैं तो 25 अगस्त को ही प्रबुद्ध हो गया था।)

माया इतनी ज़ोर का मारती है। पहले तो हँसती है खूब, क्या चुटकुला मारा हाहा! फिर जब हँस-हँसकर थक जाती है तो चांटे मारती है कि तेरा तो हो गया न,खा। जब तक विकारों का ये बोरा साथ लेकर घूम रहे हो, उसी में घुसे हुए हो, तुम कैसे निश्चिंत हो सकते हो? आखिरी दम तक सतर्कता चाहिए। उसी में मज़ा भी है। दाँव-पेंच चल रहे हैं, ये अपना काम कर रहा है हम अपना काम कर रहे हैं, गुड फन।

पहलवानी चल रही है, ये अपने दाँव मार रहा है, हम अपने पैंतरे मार रहे हैं। देखते हैं, कौन जीतता है? ये पक्का है कि अन्त तक भी किसी की आखिरी विजय नहीं होने की है। नॉकआउट का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। ईनलाइटेनमेंट माने – नॉकआउट। अब तो हम जीत ही गये और बीच में ही जीत गये। सारे राउंड्स (पारी) पूरा होने से पहले ही जीत गये। बत्तीस की उम्र में ही हम जीत गये। कौन सा नॉकआउट ? "माया महा ठगिनी हम जानी।" और ठगने में सबसे बड़ी ठगी ये है, ‘मैं तो हार गई, अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ न।’ बेटा थोड़ी देर में पता चलेगा कौन हारा है।

वो वैसे ही बुलाती है, 'मैं हार गई अब तो आ जाओ।' जाकर देखो फिर पता चलेगा। बुद्ध, महावीर सबको पता चला था। हम किस खेत की मूली हैं।

आ रही ये बात समझ में?

जैसे सीमा पर तैनात सिपाही होता है आपको वैसे रहना है। कभी-कभार सीमा पर शान्ति हो जाती है, सीज़ फायर (संघर्ष विराम) हो गयी, कुछ हो गया। पर आप हल्के नहीं पड़ सकते। क्योंकि कभी भी वहाँ से गोली आ सकती है। शान्ति जब देखें, तो ज़रूरी नहीं है कि ये शुभ सन्देश हो। शान्ति का मतलब ये भी हो सकता है कि आपको असतर्क किया जा रहा है।

प्र: प्रणाम आचार्य जी। मुझे ये पूछना था कि मैंने आपसे पहले ओशो को बहुत सुना और ओशो को सुनकर भी मेरे जीवन में बहुत ज़्यादा परिवर्तन आये। तो आपको भी बहुत सुना और ओशो को भी बहुत सुना। लेकिन मुझे आप जैसे बोलते हैं कि पुनर्जन्म जैसा कुछ भी नहीं होता है। लेकिन ओशो ने बोला है, उनकी वो डॉक्यूमेंट्री (दस्तावेज़ी) भी मैंने देखी जिसमें उन्होंने बोला है कि उनकी जो गर्लफ्रेंड थी पिछले जन्म में थी फिर अभी फिर आ गयी और फिर उन्होंने अपने मुक्ति की बात भी करी कि मैं इतनी तारीख़ को ऐसे मुक्त हो गया था और इसको आप बिलकुल निरस्त करते हो कि ऐसा कुछ नहीं होता है।

तो मुझे तो सब ठीक लगता है मगर आप निरस्त करते हो, तो ये क्या है? मतलब ये समझ में नहीं आया दोनों में आपमें इतना वो क्यों है? और आपने भी आश्रम में उनका फोटो लगाया हुआ है, तो थोड़ा सा मुझे कंफ्यूजन (संशय) रहता है?

आचार्य: देखो, भई जब वो मेरी उम्र के थे, तो उनके पास बहुत बड़ी भीड़ लगने लगी थी। और जब वो पचास के आसपास के होने लगे थे उसी समय अमेरिका में न जाने कितनी बड़ी ज़मीन खरीद ली थी, कम्यून बसा लिया था। ये सब ऐसे ही थोड़ी हो जाता है। बहुत कुछ बोलना पड़ता है तो उन्होंने बोला। मुझे नहीं बोलना है। तो मैं नहीं बोलूँगा।

जिन्हें ज़मीनें चाहिए हों, और भीड़ खड़ी करनी हो। उनके लिए झूठ बोलना बहुत ज़रूरी हो जाता है। मैं जो कर रहा हूँ मैं वो करूँगा। इस रास्ते पर कोई समझे तो अच्छी बात, न समझे तो अच्छी बात। हाँ, इतना है कि अगर लोग नहीं समझेंगे तो मैं अपनी ओर से और ज़ोर लगाऊँगा। लेकिन झूठ तो नहीं बोलूँगा।

जानबूझकर भ्रान्ति तो नहीं फैलाऊँगा। और उसके दुष्परिणाम बहुत घातक होते हैं। आप चले जाते हो, आपके पीछे आप जो ज़हर छोड़कर जाते हो, वो समाज को शताब्दियों तक सालता रहता है। तो मुझे कुछ ऐसा नहीं बोलना है जो आपको और नींद में डाल दे, आपको वागजाल में बाँधने का मेरा इरादा नहीं है। तमोगुणी पोएट्री (कविता) लगती तो बहुत प्यारी है, लगता है सुनते जाओ, सुनते जाओ, सुनते जाओ, सुनते जाओ आ-हा-हा!

लेकिन ज़रा ठहरकर विचार करोगे कि ये अभी-अभी जो वाक्य बोला ये क्या था? तो वहाँ पर कई दोष पाओगे। बाकी आदमी बहुत साहसी थे। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ। लेकिन ये काम ऐसा नहीं है जिसमें मिलावट की जा सके, नहीं करनी चाहिए।

आप अपनी ओर से सोचते हो कि हम चतुराई कर रहे हैं, मैंने थोड़ी ही सी तो मिलावट करी है। वो वैसे ही हो जाता है कि जैसे आपने पानी में बस एक बून्द ज़हर डाल दिया है। थोड़ी सी ही तो मिलावट करी है। उसके अलावा ये एक पुरानी सी बात है। देखिए, एक झूठ को सही साबित करने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। अब एक बार तुम बोल दोगे कि ये हुआ था, मेरा पिछला जन्म हुआ था, फ़लानी चीज़ें थी और इससे सम्बन्धित कई बातें। तो फिर तुम्हें उन बातों को जायज़ ठहराने के लिए पचास बातें और बोलनी पड़ेंगी और करनी भी पड़ेंगी।

मुझे ज़रा सीधा-सरल रहना है, तो मैंने ये भी नहीं कहा कभी कि मेरा ईनलाइटेंनमेंट वगैरह नहीं हुआ है। मैंने सोचा क्यों न मुद्दे को भस्म ही कर दें। मैंने कहा, 'न हुआ है, न होगा।' क्योंकि होता ही नहीं। कोई ऐसी चीज़ होती हो तो न होगी। न हुआ है न होगा, अभी से बोले देते हैं। और ये भी बोल दिया है कि अगर कभी बोल दूँ कि हो गया, तो बहुत जूते मारना। एकदम मारना और भाग जाना दूर नंगे पाँव, जूता उठाने भी वापस मत आना।

तो ये सब दन्द-फन्द है, चालाकियाँ, चालबाजियाँ, झूठ सीधे-सीधे कहो तो फ़रेब। और इस तरह के बहुत किए गये हैं, सबके द्वारा किए गये हैं। नहीं करना, यही करना होता तो बहुत रास्ते थे। उन रास्तों को इसलिए नहीं छोड़ा था कि फिर गन्दे काम करें।

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