फ़रेब नहीं करना तो नहीं करना || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: सर प्रणाम। सादर नमन। सर इतनी बातें सुनने के बाद अपनी मन की एक मूर्खता के विषय में आपसे सवाल है। ये अच्छा और बुरा लगता है कि हमने समझ लिया। इस बात पर भी शक है कि अगर मैंने समझ लिया, तो फिर मैं उसपर चल क्यों नहीं रहा हूँ। गलत चीज़ को जो मुझे लगता है करना है, उसको मैं नहीं टालता। जो सही चीज़ है, उसको करने में जो श्रम लगाना है, वो मैं नहीं लगा रहा। उसको एक फ्यूचर (भविष्य) के लिए खूबसूरती से उसको टालना की मैं उसको अभी रूककर आराम से बहुत अच्छे से उसको करता हूँ। ये मन की मूर्खता समाप्त ही नहीं हो रही है। इसमें मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: नहीं, सबसे पहले तो ये कोई विशेष स्थिति नहीं है। यदि यह मूर्खता है भी तो इसकी ओर आपको धकेला प्रकृति ने है। तो इसको मूर्खता कहने की जगह आप कहिए – जीवित होने का, जन्म लेने का तकाज़ा या दंड। साधारण है ये बात, ये होगा।
चेतना के लिए ऊँचा-नीचा होता है, प्रकृति के लिए कुछ ऊँचा-नीचा नहीं होता है। प्रकृति के लिए बस एक व्यवस्था होती है जिस पर वो आपको चलाना चाहती है। और आप उस व्यवस्था से हटते हैं, तो आपको प्राकृतिक तौर पर कष्ट भी होता है। हम पैदा ही ऐसे होते हैं।
तो एक तरफ़ तो मैं कहता हूँ कि जो कुछ भी जीवन में ठीक न हो रहा हो,जान लो कि उसमें तुम्हारा चुनाव निहित है, स्वयं को ही दोष देना, मजबूरी कुछ नहीं होती। बिना हमारी मर्ज़ी के कुछ नहीं हो सकता। एक ओर तो मैं ये कहता हूँ। दूसरी ओर आप ये भी समझ लीजिए कि जो कुछ हो रहा है, वास्तव में आपको उसमें धकेला गया है। हम अपनी हालत खराब बाद में करते हैं, हम खराब हालत में पैदा ही होते हैं पहले। हाँ, हम इतना ज़रूर करते हैं कि खराब को बहुत खराब कर लेते हैं, बैड को वर्स(ख़राब से और ख़राब) कर लेते हैं।
तो अपनी ज़िन्दगी में अगर आप खराबियाँ पाएँ, तो बहुत चौंकने की बात नहीं है। उन खराबियों का इन्तज़ाम तो आपके जन्म से पहले ही हो चुका था। आसमान से नहीं उतरते हम, मुक्ति के लिए जन्म नहीं लेते हम। दो शरीरों की कामवासना जब टकराती है तो उसमें से कामना का ही एक और पिंड पैदा हो जाता है, उसको मनुष्य कहते हैं।



