प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर। सर, दुनिया में दो तरह के सिद्धांत चलते हैं — एक ये कि जवान लोग कहते हैं कि खाओ-पियो बिंदास जियो, और दूसरी ये कि बुज़ुर्ग या दार्शनिक लोग कहते हैं कि जीवन क्या है इसको समझो, अपना पुरुषार्थ दिखाओ, अपनेआप को जानो, इस तरह की बातें। तो सर, फिर समझ में नहीं आता कि क्या करें, कौनसी राह पकड़ें?
आचार्य प्रशांत: देखो, बुज़ुर्ग भी नहीं जान रहे हैं कि जीवन क्या है, और जो तुम्हारा जवान आदमी है, जो कह रहा है कि बिंदास जियो, ये भी नहीं जान पा रहा कि जीना किसको कहते हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, मैं किस सिद्धांत पर चलूँ?
आचार्य प्रशांत: कोई सिद्धांत नहीं है। मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ; क्या नाम है?
प्रश्नकर्ता: सौरभ।
आचार्य प्रशांत: सौरभ, अगर दुनिया में कोई सिद्धांत न हो और कोई बूढ़ा-बुज़ुर्ग, कोई फ़िलॉस्फ़र उपलब्ध न हो, तो क्या तुम जीवन नहीं जियोगे? अगर तुम्हें कोई भी बताने वाला न हो, तो क्या तुम आत्महत्या कर लोगे? जीना तो तुम्हें है ही, क्योंकि तुम्हारी अपनी ज़िन्दगी है। क्या तुम्हें किसी के दिए हुए सिद्धांतों पर निर्भर रहना है?
और मैं कहता हूँ कि मान लो कि सिद्धांत हैं ही नहीं, तो? और मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ कि उन सिद्धांतों को भी तो किसी-न-किसी ने आविष्कृत किया है। कोई तो होगा जिसने खुद उनको जाना या गढ़ा, वो तुम क्यों नहीं हो सकते? अगर जीवन तुम्हारा है, तो इसके जीने का तरीका तुम खुद क्यों नहीं जान सकते?




