प्रकृति और मनुष्य के बीच सही सम्बन्ध कैसा हो? || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: प्रकृति और मनुष्य के बीच कैसा संबंध गलत है यह तो आपने हमेशा बताया है। आपने कहा है कि मनुष्य प्रकृति का शोषण आदि करता है, वह बात गलत है। तो आज फिर समझाएं कि मनुष्य और प्रकृति के बीच में सही और आदर्श संबंध कैसा होना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: देखिए, जब आप प्रकृति कहते हैं तो वो कई अर्थ रखती है हमारे लिए। प्रकृति वह तो है ही जिसका हम साधारणतया प्रकृति से ताल्लुक बैठाते हैं। पेड़, पौधे, पर्यावरण, पशु उसी को हम आमतौर पर प्रकृति कहते हैं, प्रकृति वह तो है ही। उसके अतिरिक्त यह जो हमारा अपना शरीर है यह भी प्रकृति है।
आप जब पूछ रहे हैं कि प्रकृति और मनुष्य के बीच क्या संबंध होना चाहिए तो, आपको पूछना चाहिए कि प्रकृति और चेतना के बीच में क्या संबंध होना चाहिए, क्योंकि जब आप कहेंगे चेतना, तो उसमें फिर प्रश्न थोड़ा विस्तृत हो जाएगा। फिर प्रश्न में यह बात भी शामिल हो जाएगी कि आदमी का आदमी से ही क्या रिश्ता होना चाहिए? मनुष्य का मनुष्य से ही क्या रिश्ता होना चाहिए? माने मनुष्य की चेतना का मनुष्य के शरीर से क्या रिश्ता होना चाहिए? दोनों मनुष्य के भीतर की ही बातें हो गई न। मनुष्य का मनुष्य से संबंध माने आदमी की चेतना का आदमी की देह से संबंध। वो पूरा सवाल हो जाएगा।
पता होना चाहिए कि चेतना और प्रकृति दो अलग-अलग तलों की बातें हैं। पूरा एक अध्याय श्रीमद भागवत गीता में श्री कृष्ण ने इसी बात को समझाने को समर्पित कर दिया कि बेटा तुम चेतना और प्रकृति के अंतर को समझो। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग। वो पूरा अध्याय बस यही बात समझाता है कि क्षेत्र अलग है, क्षेत्रज्ञ अलग है। इन दोनों को एक मत जान लेना, इन दोनों के बीच तुम फँस मत जाना।
क्षेत्र क्या है? प्रकृति क्षेत्र है। क्षेत्रज्ञ क्या है? चेतना क्षेत्रज्ञ है। उसको कई और नामों से भी कहा गया है। उन नामों का उल्लेख में अन्यत्र कर चुका हूं, अभी उसकी जरूरत नहीं है।



