शरीर के इरादे कुछ हैं, तुम्हारे कुछ और || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते हैं? ठीक वैसे ही जैसे हम किसी कम्प्यूटर को या किसी अन्य गैज़ेट को फॉरमैट करते हैं। ये कह रहे हैं, मैं इसलिए इन स्मृतियों को इसलिए विस्मृत करना चाहता हूँ या फॉरमैट करना चाहता हूँ या फैक्ट्री सेटिंग्स रिस्टोर करना चाहता हूँ ताकि मैं जल्दी से कुछ नयी चीज़ें सीख सकूँ।
आचार्य प्रशांत: इसके पहले दो लव्ज़ क्या कह रहे हैं? (श्रोताओं से पूछते हुए) पहले।
श्रोतागण: शरीर।
आचार्य: अरे, पहले दो।
श्रोतागण: मेरा शरीर।
आचार्य: हो गयी गड़बड़। हो गयी न गड़बड़? बाक़ी सब तो ठीक बता दिया कि शरीर यादों का, प्राकृतिक संस्कारों का पिंड मात्र है। पुरानी एक धारा है जैविक विकास की जो बही आ रही है। और अभी वो आपके रूप में प्रकट होकर के सम्मुख है हमारे। सबकुछ पुराना ही पुराना है जिस्म में। बात तो ठीक है। पर जिस्म ही कह देते तो चलता, ये क्यों कह दिया ‘मेरा जिस्म’?


