जिन निर्दोषों की जान गई, उनकी क्या गलती थी? || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: सगे-सम्बन्धियों में, मित्रों में बहुत लोगों को संक्रमण हुआ और कुछ लोगों की दुर्भाग्यवश मृत्यु भी हो गयी है। अब वो ताकत कहाँ से लाएँ कि जी पाएँ बिना बहुत गहरी पीड़ा, दुख के, और इस प्रश्न से मुक्ति कैसे पाएँ कि ईश्वर इसमें हमारी क्या ग़लती थी? (अभिषेक काला जी, चालीस वर्षीय, नोएडा से)
आचार्य प्रशांत: जो दो बातें आपने पूछी हैं कि हमारी क्या ग़लती थी और पीड़ा के बिना जी पाएँ। ये दोनों बातें बहुत हद तक अन्तर सम्बन्धित हैं। माने, आपस में जुड़ी हुई हैं। क्योंकि जितना ज़्यादा हमको लगता है कि इसमें हमारी क्या ग़लती थी, भीतरी हमारा दर्द उतना ही और बढ़ जाता है। कुछ तो दर्द बीमारी का होता है, कुछ दर्द नुक़सान का होता है, कुछ दर्द स्वजनों को खोने का होता है और एक बहुत बड़ा दर्द यही होता है कि मेरे साथ जो हुआ वो ग़लत था, ना-इंसाफ़ी थी।
अभिषेक, इस दौर में, इस पीड़ा में हम सब आपके साथ हैं। और वो कम हो सके दुख, इसके लिए कुछ बातें बोलूँगा। आपसे अनुरोध है, ध्यान से सुने।
देखिए! जन्म, जीवनकाल, मृत्यु, बीमारी, आदमी, औरत,पशु,पक्षी, जीवाणु, विषाणु ये सब प्रकृति के दायरे में आते हैं। ठीक है? ये सब किसके दायरे में आते हैं? प्रकृति के। ये प्रकृति का एक चक्र है। एक विधान है जो चल रहा है। और वो बिलकुल एक मशीन, यन्त्र की तरह है। वो बस इतनी परवाह करता है कि एक ये प्रजाति है, इस प्रजाति के जो जीव हैं वो पैदा होते रहे हैं, आगे बढ़ते रहे हैं। और एक दूसरी प्रजाति है, इस प्रजाति के जीव भी आगे बढ़ते रहें, पैदा होते रहें और पहली प्रजाति और दूसरी प्रजाति में कोई आपसी सम्बन्ध भी हो सकता है। ये भी हो सकता है कि दूसरी प्रजाति, पहली प्रजाति का आहार बनती हो, भक्ष्य हो उसके लिए। कोई भी सम्बन्ध हो सकता है।
तो प्रकृति इंडिविजुअल्स माने व्यक्तियों के तल पर काम नहीं करती। वो समूह के तल पर काम करती है। वो ये नहीं देखती है कि लोग अलग-अलग कैसे हैं। वो बस ये देखती है कि लोग कितने सारे हैं। हम



