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जीवन कैसा है, सिर्फ़ ये बताओ || आचार्य प्रशांत (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से ब्रेक लगाने की, ये क्या है?

आचार्य प्रशांत: स्किल (कौशल) नहीं है, स्किल ​​बिलकुल नहीं है। इसमें निर्णय नहीं कर पाओगे। बोला न तुमने, 'एकदम से’। 'एकदम से' माने उसी साँस में, एकदम, उसी साँस में। ये स्किल नहीं होती है। स्किल तो सीखी जाती है, स्किल में तो निर्णय करना पड़ता है। ये वो नहीं है, ये कुछ और है। ये तो तुम जैसी ज़िन्दगी जी रहे होते हो वैसी तुम्हारी बाइक चलती है। ये तो ब्रेक एकदम से लगता है, एकदम से, उसी साँस में, बिना विचार किये।

तुम सही हो तो ही ब्रेक लगेगा नहीं तो वो मौक़ा बीत जाएगा। कुत्ता वहाँ पड़ा रह जाएगा, तुम सोचते ही रह जाओगे कि अब ब्रेक लगाऊँ और जब दो सेकंड बीत जाएँगे तब तुम कहोगे, 'अरे! मैं तो पीछे रह गया अब ब्रेक लगाने से फ़ायदा क्या? अब तो छूट गया, अब यू टर्न कौन लेगा! छोड़ो न, कोई और आकर उसकी परवाह कर लेगा। अब आगे बढ़ो।'

ये जो भी काम एकदम से होते हैं न, चाहे मुक्ति हो, चाहे प्रेम हो, चाहे बाइक पर ब्रेक लगाना, ये तो सही जीवन से ही आते हैं। अभी भी मेरी बात अगर तुम्हें समझ में आ रही होगी तो एकदम से ही आएगी, अनायास। और वो तो सही जीवन का परिणाम होता है, वो कोई स्किल नहीं होती, उसमें कोई कौशल नहीं चाहिए। तुमने बड़ा हीन शब्द प्रयोग कर दिया, स्किल तो ऐसा लगता है जैसे कि अभ्यास से अर्जित कर लोगे। ये बात दूसरी है इसे नैक बोल सकते हो अगर अंग्रेज़ी कहना चाहते हो। नैक आन्तरिक होता है, स्किल बाहरी।

सही जीवन जियो, ब्रेक अपनेआप लगेगा। सही जीवन नहीं जी रहे हो तो जहाँ ब्रेक लगना चाहिए वहाँ ब्रेक का विचार भले आ जाए, ब्रेक नहीं लगेगा, ब्रेक नहीं लगेगा तो नहीं लगेगा। प्यार जैसी बात है, या तो होगा या तो नहीं होगा। मुश्किल हो जाती है न! 'काश कि कोई तरकीब बता दे, काश कि कोई कह दे कि ये कोई विधि है, कोई कुशलता है। कुछ कर-करके पा लें।' न! पूरे जीवन की आहुति देनी पड़ती है।

असल में, मेरे पास लोगों को तकलीफ़ ही यही है कि मैं इससे नीचे की बात ही नहीं करता। यहाँ भाव बड़े ऊँचे लगते हैं। तुम कोई सवाल पूछोगे, जवाब बस एक देता हूँ, 'ज़िन्दगी जैसी है वैसा रह रहे हो।' हर सवाल का एक ही जवाब है — जैसे होती हैं न दुकानें, फ़िक्स्ड प्राइस शॉप, ऐंड देयर इज़ ओनली वन प्राइस, वाट? योर होल लाइफ़। (तय मूल्य की दुकान, और वहाँ केवल एक ही क़ीमत है, क्या? आपका पूरा जीवन।)

उससे नीचे का कोई दाम ही नहीं लगता है यहाँ। तुम कुछ भी पूछोगे, मेरे पास एक ही जवाब है — 'योर होल लाइफ़ , समूचा जीवन।' और जब तक तुम वो दाम चुकाने को तैयार नहीं हो तब तक माँग ही मत करो कि कुछ भी क़ीमती तुम्हें मिले। पूरे जीवन की, एक-एक क्षण की आहुति देनी पड़ती है, या भेंट कह लो। और ये बहुत छोटी भेंट है, बदले में तुम्हें जो मिलता है वो बहुत-बहुत-बहुत बड़ा है। इतनी छोटी सी भेंट देने को तैयार नहीं हो तो फिर तो तुम पात्र ही नहीं हो। जो पूरे जीवन से नीचे की बात करना चाहते हों वो मेरे पास आयें ही नहीं।

मैं इसीलिए कोई छिट-पुट विधियाँ, तरीक़े, ये-वो सुझाता ही नहीं। एक ही बात कहता हूँ, 'बताओ, ज़िन्दगी कैसी चल रही है? बताओ, सुबह क्या किया? बताओ, अभी क्या किया? मत बताओ कि तुम कौनसा मन्त्र पढ़ते हो, मत बताओ कितने शास्त्र पढ़े हैं। बताओ, अभी क्या किया? बताओ, खाते कैसा हो? बताओ, नहाते कैसा हो? बताओ, पड़ोसी से क्या बात करते हो? बताओ, क्या काम करते हो? बताओ, रोटी किसकी खाते हो?' मैं तो ये सवाल पूछता हूँ। मैं नहीं पूछता हूँ तुमसे कि तुम्हारे पूर्वजन्म कैसे थे। मैं नहीं पूछता हूँ तुमसे कि तुमने संकल्प क्या उठाये हैं। वर्णाश्रम, जन्म, धर्म, कुछ नहीं पूछता हूँ, जीवन पूछता हूँ।

दिक्क़त हो जाती है, लोग कहते हैं, ‘साहब, लेने-देने की बात करिए थोड़ा। अच्छा, ऐसा करते हैं, जीवन के दो घंटे आपको दिये, इतना चलेगा?’ मैं कहता हूँ, 'दो घंटे नहीं, दे ही रहे हो तो दो घंटे तुम और दो। और जब दो में दो-दो जुड़ते हैं तो चौबीस हो गया। तो दिक्क़त हो गयी। पूरे चौबीस घंटे दो, फिर बात करूँगा। चौबीस घंटे से नीचे कोई एक घंटा भी अगर चुराकर अपने लिए रखना चाहे तो मेरी-उसकी नहीं पटेगी, क्योंकि तुमने एक घंटा नहीं चुराया है, तुमने पूरी ज़िन्दगी चुरा ली। उस एक घंटे में तुम्हारा अहंकार पूरा फलेगा-फूलेगा। तेईस घंटा और पचास मिनट भी नहीं चलेंगे। पूरे चौबीस घंटे चाहिए, समूचा जीवन। इससे कम में काम नहीं चलता। ज़िन्दगी बताओ ज़िन्दगी, कहानियाँ मत सुनाओ।

आध्यात्मिकता परी कथाओं की बात नहीं है। खरी-खरी बात है, परी-परी बात नहीं है। परी कथा अच्छी लगती है, खरी कथा में ज़रा दिक्क़त हो जाती है। नहीं फ़र्क पड़ता कि रविवार को कौनसी गीता से क्या सवाल पूछा है। सवाल ये है कि शनिवार को कहाँ थे। ज़िन्दगी बताओ ज़िन्दगी। गीता छोड़ दो, ज़िन्दगी बताओ ज़िन्दगी।

(प्रश्नकर्ता कुछ पूछने का प्रयास करते हुए)

'अब कुछ फ़र्क नहीं पड़ेगा इससे। अब जब अगला शनिवार आये तब बात करना।'

ज़िन्दगी के अलावा कोई कृष्ण, कोई गीता नहीं काम आएँगे। कृष्ण भी अर्जुन को ये नहीं कह रहे थे कि तू ये ज्ञान ले ले और कहीं जाकर के छुप जा गुफा-वुफा में। उनका भी ज्ञान इसीलिए था कि ज़िन्दगी जी, अभी युद्ध क्षेत्र है, यहाँ लड़! लड़ने से भागोगे तो गीता क्या करेगी तुम्हारा? उपनिषद् इसलिए थोड़े ही होते हैं कि उनको विधिवत स्मृतिस्थ कर लो। दिल में उतारने होते हैं न! उन्हें अपना खून बन जाने देना होता है। धड़कन में गूँजें, साँस में बहें, तब उपनिषद् हुए। (प्रश्नकर्ता हँसते हुए)

अभी नहीं हँसो। अभी आगे मौक़े आने वाले हैं। अगला शनिवार बस पाँच ही दिन दूर है, तब है परीक्षा। और ऐसे शनिवार आते ही रहेंगे।

ये सारी किताबें सुन्दर हैं, शास्त्र सुन्दर हैं, इन्हें पी जाओ, याद मत रखो। याद रखने में और पी जाने में अन्तर होता है। याद से तो भुला दो, पी जाओ। तुम्हारे खून में बहें, तब जानना ऋषियों के साथ, कृष्ण के साथ एक हुए। यहाँ से भी जब बाहर निकलते हो, बिलकुल कोशिश मत करो कि तुम्हें याद रह जाए मैंने क्या कहा। जब तक बैठे हो उसको पियो। बिना प्रतिरोध के उसको दिल में समाने दो, उतरने दो। दिमाग याद रखे-न-रखे, कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। दिमाग तो क्या है, आगार है, गोदाम। गोदाम में खाना रखा होता है तो तुम्हारी भूख चली जाती है? दिमाग तो ऐसा ही है, भंडार। दिल में उतरने दो।

प्र: दिल में उतारने का परिणाम क्या होगा?

आचार्य: जीवन में आएगा, व्यवहार में आएगा, सबकुछ। अब तुम वो हो गये, अब याद क्या रखना! अब परमात्मा का नाम जपने की कोई ज़रूरत नहीं है। अब कुछ भी ज़रूरी नहीं है। और वो नहीं हुआ तो तुम फिर जितने प्रपंच करने हैं करो।

फिर वही आख़िरी बात कह रहा हूँ, आपमें से कुछ लोग अगले रविवार को भी आएँगे। सुन्दर लगता है, स्वागत है। पर इसको रविवार से रविवार तक का कार्यक्रम मत बना दीजिए। चौबीस गुने सात। सात दिन हैं और हर दिन में चौबीस घंटे। मैं इस सत्र को उन चौबीस घंटों और उन सात दिनों से अलग कुछ नहीं रखना चाहता। मैं ये नहीं चाहता हूँ कि ये भी एक द्वैतात्मक चीज़ बन जाए जिसमें कि चूँकि उन सात दिनों में अन्धेरा है तो आप इस आख़िरी दिन चन्द घंटों के लिए उजाला तलाशते यहाँ पहुँच जाएँ। मैं चाहता हूँ ये भी वैसा ही रहे जैसा आपका शेष जीवन है, जैसा पूरा हफ़्ता है। आपका पूरा सप्ताह ज्योतिर्मय रहे।

आपको कोई अन्तर ही न दिखायी दे इन तीन घंटे में और आपके पूरे सप्ताह में, बिलकुल एक सा लगे। आप कहें, 'जैसा जीते हैं, वैसा सुनते हैं। जो यहाँ सुना, वो वही तो है जो जी रहे हैं, कोई अन्तर ही नहीं है। इसलिए नहीं आये कि साफ़ होना है, इसलिए नहीं आये हैं कि यहाँ कुछ ख़ास होगा। इसलिए आये हैं क्योंकि यहाँ शब्द वैसे हैं जैसा हमारा जीवन है। कुछ पाने नहीं आये हैं, अब तो बस प्रेमवश आये हैं।' तब आनन्द है, तब मिलना है।

इस जगह को मैं चिकित्सालय नहीं बनाना चाहता कि हफ़्तेभर बीमार रहे तो यहाँ पर चिकित्सा के लिए सातवें दिन आ जाते हैं। ये तो आनन्द का, मिलने का, मित्रता का, प्रेम का उत्सव होना चाहिए कि आये हैं, बाँटे है। सबके चेहरे पर आभा होनी चाहिए। सब एक-दूसरे से मिल रहे हैं और कह रहे हैं, 'ऐसा जीवन, ऐसा जीवन, ऐसा जीवन।' ऐसे वचन नहीं, ऐसा जीवन। और सब जान रहे हैं, सबको पता है। सबको अपने होने में सन्तोष भी है और नाज़ भी है। मैं गर्व को भी बुरा नहीं कह रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ नाज़ होना चाहिए। समझ रहे हो बात को?

थोड़ा देख पा रहे हैं मेरी आँखो से? ठीक से देखेंगे तो अपनी आँखें लगेंगी। यहाँ न चिकित्सा के लिए आयें, न मनोरंजन के लिए। ये तो दोस्तों की महफ़िल, मित्र-मंडली होनी चाहिए। कि सबने अपने-अपने भीतर वो पा लिया है जो साझा है। साझेपन में मिलते हैं। जीवन तो अलग-अलग हैं लेकिन फिर भी आत्मा साझी है। उस साझेपन का उत्सव होना चाहिए।

मुझे आपने ऊपर बैठा दिया तब तो दूरी बना दी और दूरी बना दी तो मुझ पर बोझ बना दिया। फिर तो आपने ये कह दिया कि मेरा दायित्व है कि मैं आपको खींचूँ। मेरे लिए इसमें क्या मज़ा है, मुझे अपना भी तो स्वार्थ देखना है न! मेरे लिए इसमें क्या मज़ा है कि मैं नीचे वालों को खींचूँ। मेरा स्वार्थ तो इसी में है कि सब एक साथ रहें। कोई बोझ ही न रहे मेरे ऊपर। मुझे किसी की तीमारदारी करनी ही नहीं है। सब इकट्ठे हैं, सब एक-से हैं, सब स्वस्थ्य हैं, अब मित्रता हो सकती है। अब चिकित्सक-रोगी का सम्बन्ध नहीं है, अब प्रेम की बात है। कितना आनन्द!

पर वो तभी हो सकता है जब जीवन चौबीस गुना सात बढ़िया रहा हो। जीवन में ध्यान रहे, जीवन में रोशनी रहे, बातों मे नहीं, सिद्धान्तों मे नहीं, जीवन में। कैसे रहे, वो आप जानते ही हैं, वो आत्मा सबके भीतर है, प्रकाश सबके भीतर है। कोई किसी पर निर्भर रहे इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। सबको पता है। पूरा-पूरा भरोसा है अपने पर और आप सब पर, हम सबके भीतर वो है। उस पर भरोसा करें, उसी को जीवन चलाने दें। आप बच्चे की तरह मौज से सोएँ।

और जब मिलने का मन करे, बच्चे की तरह आ जाएँ। रोतड़ू बच्चे की बात नहीं हो रही है, खिलखिलाते बच्चे भी होते हैं। छोटी-छोटी कई बच्चियाँ होती हैं, उनको जब देखो 'एएए…' (रोने का अभिनय करते हुए)। हँसते बच्चे नहीं देखे, कैसे होते हैं? हँसते बच्चे कैसे होते हैं? (एक श्रोता को सम्बोधित करते हुए) ऐसे होते हैं? ये हँसता बच्चा है!

हँसते बच्चों की तरह रहें।

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