प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं असुरक्षित जीना नहीं चाहता। कृपया मदद करें।
आचार्य प्रशांत: मन सुरक्षा की तलाश करता है उसके दो बहुत सीधे कारण हैं। पहला, मन जानता है कि वो जैसा बना बैठा है, वो बड़ा कमज़ोर है, बड़ा असुरक्षित है। उसमें दम नहीं है, कोई स्थाईत्व नहीं है। इतना तो उसे रोज़ ही दिखाई देता है न अपने बारे में कि मुझे में कुछ भी ऐसा नहीं है जो खालिस हो, दमदार हो? 'मैं तो थाली का बैंगन हूँ - इधर से उधर लुढ़कता रहता हूँ। मैं तो बहुत जल्दी चोट खा जाता हूँ, मुझ में बहुत जल्दी दरारें पद जाती हैं।' सबको दिखाई देता है न इतना अपने बारे में?
तो फिर सबको पता है कि वो सुरक्षित नहीं हैं। कोई अँधा ही होगा जो अपने बारे में ये माने बैठा होगा कि वो सुरक्षित है। और अगर मान लिया किसी ने अपने बारे में कि वो सुरक्षित है तो फिर तो वो जो साधारण ज़िन्दगी की दौड़ होती है उससे बाहर ही न हो जाएगा? आम आदमी ज़िन्दगी की जिस दौड़ में रोज़ाना लगा रहता है, इसीलिए तो लगा रहता है न क्योंकि वो खुद को असुरक्षित अनुभव करता है?
अभी पैसे काम हैं, और इकट्ठे कर लूँ तो सुरक्षा हो जाएगी। मकान छोटा है, बड़ा बनवा लूँ। दफ्तर में अपनी हैसियत थोड़ी और मज़बूत कर लूँ, सुरक्षा हो जाएगी। रिश्तों में पकड़ और मज़बूत कर लूँ, अपना पलड़ा भारी कर लूँ, धाक जमा लूँ, सुरक्षा हो जाएगी। यही तो हम दिन रात करते हैं न? हम ये दिन-रात करते हैं, इसी से पता चलता है कि हम जानते हैं कि हम असुरक्षित हैं। हम असुरक्षित हैं तभी तो सुरक्षा की तरफ भागते हैं। तो ये पहली बात हुई।
दूसरी बात, ठीक है, हमें पता है हम असुरक्षित हैं, लेकिन उससे ये कैसे सिद्ध हो जाता है कि हम सुरक्षा की तरफ भागें ही? ये बात तो चलो हमने मान ली कि मन जानता है कि वो असुरक्षित है। वो अपने रोज़ाना बदलते रंग देखता है, अपने डरों को देखता है, अपनी तड़प को देखता है, अपने चौंक जाने को देखता है, अपने दहल जाने को देखता है। कोई खबर आई नहीं कि कलेजा मुँह को आ गया, दिल दहल गया। ये सब रोज़ के अनुभव है न अपने? तो हम जानते हैं कि हम असुरक्षित हैं।




