आप जिसको चेतन समझ रहे हैं, वो भी जड़ ही है || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2019)

प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी प्रणाम। गीता आदि ग्रन्थों को दूर से ही पढ़ने का मन करता है, क़रीब से पढ़ने पर शान्ति की जगह अशान्ति मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का मूल कृष्ण ही है। कबीर साहब भी कहते हैं:-
कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूँढे वन माही। घटघट राम हैं दुनिया देखे नाहीं।।
पर ये बात मेरे दैनिक जीवन में उतर नहीं पाती। बुरा लगता है कि जो शान्ति सर्वत्र ही है वो मेरे जीवन में क्यों नहीं दिखती। कह रही हैं इसी प्रकार अन्य श्लोकों में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरी ये त्रिगुणमयी माया अति दुष्कर है परन्तु जो केवल मुझको ही भजते हैं, वो इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं, वो इस माया को जीत जाते हैं।
तो आचार्य जी, सर्वत्र भी हैं और ढके भी हैं, कृपया इस बात को, और निरन्तर भजने की बात को ज़िन्दगी के तल पर लाकर समझाइए, ठीक?
आचार्य प्रशांत: प्रश्न का सार समझ गये हैं (श्रोताओं से पूछते हुए)? पूछा है कि अगर हैं सर्वत्र तो मुझे ही क्यों नहीं दिखते और कहा है कि निरन्तर भजना क्या होता है। कह रही हैं, ‘जितना शास्त्रों को पढ़ते हैं उतना खीझ उठती है, किस बात पर, कि शास्त्र कहते हैं कि वो ही वो है, तत्व-ही-तत्व है मात्र। कृष्ण तत्व के अलावा अन्यत्र कहीं कुछ नहीं।‘ और कह रही हैं, ‘मैं तो माया में फँसी हूँ, मुझे तो श्रीकृष्ण कहीं दिखते नहीं, तो ये बात कुछ जमी नहीं!’
प्र२ : सातवें अध्याय का तेरहवाँ श्लोक:-









