तुम्हारी कमज़ोरियाँ कितनी खूबसूरत हैं, और बेवकूफ़ियाँ कितनी हसीन || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: वीडियो था ‘अपनी कमज़ोरियों से भिड़ जाओ’ तो उसके सम्बन्ध में थोड़ा प्रतिवाद है— अपनी कमज़ोरियों से कभी मत भिड़ो क्योंकि कमज़ोरियाँ भी आपके व्यक्तित्व का पहलू है। अपनी कमज़ोरियों पर विजय पानी हो तो स्वीकार करो कि हाँ, मैं हूँ ऐसा, कमज़ोरियों को स्वीकार करते ही कमज़ोरियाँ आपकी ताकत बन जाएँगी। जिस भी चीज़ को आपने स्वीकार कर लिया वो आप पर अपनी पकड़ कमज़ोर कर देती है, लड़ना नहीं है; न खुद से, न दूसरों से, बस सहजता पूर्वक स्वीकार करना है; क्योंकि कोई भी पदार्थ पूर्ण नहीं होता और न कभी हो सकता है। लड़ोगे तो हारोगे, स्वीकार करोगे तो जीतोगे।
आचार्य प्रशांत: आप बड़े संकट में हैं। जहाँ कहीं से भी आप ये दूषित दार्शनिकता उठाकर लाये हैं वो जगह आपके लिए शुभ नहीं है। वो जगह किसी के लिए भी शुभ नहीं है जहाँ से ऐसे सन्देश दिये जाते हैं कि अपनी कमज़ोरियों से कभी मत भिड़ो क्योंकि वो भी आपके व्यक्तित्व का पहलू है। सबसे पहले कमज़ोरियों का अर्थ क्या है? कमज़ोरी का अर्थ है वो सबकुछ जो आपको वो होने से रोकती है जिसके बिना आप चैन नहीं पाने वाले, वो आपकी कमज़ोरी है।
सच के बिना आप चैन नहीं पाने वाले लेकिन आपके भीतर कुछ बैठा है जो आपको झूठ से ही बाँधे रखता है वो चीज़ आपकी कमज़ोरी है जो आपको झूठ से ही बाँधे रखती है। आज़ादी बिना, मुक्ति, उड़ान बिना आप बैचैन ही रहते हो, बन्धनों में किसको चैन है? लेकिन आपके भीतर कुछ बैठा है जो आपसे कहता है कि नहीं, नहीं, नहीं तुम उड़ान के काबिल नहीं हो, तुम आकाश के लायक नहीं हो, तुम बन्धनों में ही पड़े रहो, तुम बन्धनों को ही स्वीकार कर लो। ये चीज़ आपकी कमज़ोरी है, इसे कमज़ोरी बोलते हैं।
जो कुछ आपको परेशान करता है और परेशान ही रखना चाहता है उसे आपकी कमज़ोरी कहते हैं। जो कुछ आपको छोटा और दुर्बल बनाए हुए है और छोटा और दुर्बल बनाये रखेगा उसे कमज़ोरी कहते हैं। अब आप कह रहे हो— ‘नहीं, कमज़ोरियों से मत भिड़ो क्योंकि वो आपके व्यक्तित्व का पहलू है।’ अरे होंगे पहलू, वो पहलू मुझे परेशान करता है तो मैं उसको निकालकर फेंक दूँगा न! मेरी ज़िम्मेदारी अपने व्यक्तित्व के किसी पहलू के प्रति थोड़ी है, मेरी ज़िम्मेदारी अपने प्रति है न, मेरे व्यक्तित्व के सब पहलू तो आती-जाती चीज़ें हैं। शरीर ने, समाज ने, जन्म ने, संस्कार ने व्यक्तित्व के पहलू दिये हैं इतना तो समझते ही होगे, आलोकचंद्र? व्यक्तित्व के जितने भी आपके पहलू हैं वो कहाँ से आते हैं? वो तो समय की धूल है जो आप पर पड़ती रहती है, कभी इधर से कभी उधर से। जैसे होली का दिन हो और आप सड़क पर निकल पड़ो कहीं से आप पर काला पड़ा, कहीं पर बैंगनी पड़ा, नीला पड़ा, पीला पड़ा, गुलाबी पड़ा ये सब व्यक्तितव के पहलू हैं।



