एक कश्मीरी परिवार से बातचीत (भाग १) || आचार्य प्रशांत (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, धन्यवाद कि आपने इस कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) के लिए समय निकाला। मेरा नाम रोहित है, रोहित राजदान। संस्था में और संस्था के कारण जिन लोगों से मैं जुड़ा हुआ हूँ, वो मुझे एक सलाहकार और वोलेन्टियर (स्वयंसेवी) के रूप में जानते हैं। पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि मैं कश्मीरी पंडित भी हूँ।
खुद के लिए भी मैं कश्मीरी पंडित की ये जो आइडेंटिटी (पहचान) है कभी भी रिलेवेंट या इम्पॉर्टेन्ट नहीं रहती। पर हाल ही में एक फ़िल्म मैंने देखी, जिसका नाम 'कश्मीर फाइल्स' था, जिससे स्पेसिफिकली (विशेषतया) मुझे इस आइडेंटिटी (पहचान) को वापस से, आई जस्ट रिकॉल दिस आइडेंटिटी (मुझे मेरी ये पहचान याद आ गई)।
तो मेरा उन्नीस-सौ-छियासी का जन्म है और जब उन्नीस सौ नब्बे में एक्सोडस (निष्कासन) हुआ था तो मैं चार साल का था और उन्नीस सौ नब्बे में मेरी फैमिली भी कश्मीर से पलायन करके जम्मू आई। फिर बहुत कुछ आगे हुआ। तो जो भी इसमें सब कुछ हुआ वो कहीं-न-कहीं हमारी फैमिली ने भी देखा। लेकिन क्योंकि मैं चार साल का था और मेरी फैमिली ने कभी इतना स्ट्रेस (ज़ोर) नहीं दिया है इन बातों पर तो मेरे कॉन्शियससनेस (चेतना) में कभी ये बात रही नहीं कि कश्मीर क्या था? क्या हुआ?
तो लेकिन हाल ही में जब मैंने मूवी देखी और हाल ही में क्या बल्कि मैंने कल ही जब फर्स्ट टाइम मूवी देखी तो काफ़ी शॉकिंग (चौंका देने वाली) थी चीज़ें। और पहला काम मैंने ये किया कि मैंने अपने घर पर कॉल किया मैंने पूछा कि जो मैंने फ़िल्म में देखा भी और न उसके बारे में कभी हमारे घर में कोई खास इतनी






