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एक कश्मीरी परिवार से बातचीत (भाग १) || आचार्य प्रशांत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, धन्यवाद कि आपने इस कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) के लिए समय निकाला। मेरा नाम रोहित है, रोहित राजदान। संस्था में और संस्था के कारण जिन लोगों से मैं जुड़ा हुआ हूँ, वो मुझे एक सलाहकार और वोलेन्टियर (स्वयंसेवी) के रूप में जानते हैं। पर बहुत कम लोगों को पता होगा कि मैं कश्मीरी पंडित भी हूँ।

खुद के लिए भी मैं कश्मीरी पंडित की ये जो आइडेंटिटी (पहचान) है कभी भी रिलेवेंट या इम्पॉर्टेन्ट नहीं रहती। पर हाल ही में एक फ़िल्म मैंने देखी, जिसका नाम 'कश्मीर फाइल्स' था, जिससे स्पेसिफिकली (विशेषतया) मुझे इस आइडेंटिटी (पहचान) को वापस से, आई जस्ट रिकॉल दिस आइडेंटिटी (मुझे मेरी ये पहचान याद आ गई)।

तो मेरा उन्नीस-सौ-छियासी का जन्म है और जब उन्नीस सौ नब्बे में एक्सोडस (निष्कासन) हुआ था तो मैं चार साल का था और उन्नीस सौ नब्बे में मेरी फैमिली भी कश्मीर से पलायन करके जम्मू आई। फिर बहुत कुछ आगे हुआ। तो जो भी इसमें सब कुछ हुआ वो कहीं-न-कहीं हमारी फैमिली ने भी देखा। लेकिन क्योंकि मैं चार साल का था और मेरी फैमिली ने कभी इतना स्ट्रेस (ज़ोर) नहीं दिया है इन बातों पर तो मेरे कॉन्शियससनेस (चेतना) में कभी ये बात रही नहीं कि कश्मीर क्या था? क्या हुआ?

तो लेकिन हाल ही में जब मैंने मूवी देखी और हाल ही में क्या बल्कि मैंने कल ही जब फर्स्ट टाइम मूवी देखी तो काफ़ी शॉकिंग (चौंका देने वाली) थी चीज़ें। और पहला काम मैंने ये किया कि मैंने अपने घर पर कॉल किया मैंने पूछा कि जो मैंने फ़िल्म में देखा भी और न उसके बारे में कभी हमारे घर में कोई खास इतनी डिटेल (विस्तार-पूर्वक) बात हुई थी और वो जो घर पर भी कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) थी और जो मूवी में देखा उसमें काफ़ी कुछ चीज़ें शॉकिंग (चौंका देने वाली) थीं जिसने मुझे एक्चुअली गोट अपसेट टू माइ माइन्ड (वास्तव में मेरे मन को उदास कर दिया)।

आचार्य प्रशांत: घर पर फ़ोन करके पूछा कि मूवी में जो दिखाया गया, वो सब क्या वास्तव में हुआ था? ये बात करी?

प्र: जी, हाँ जी, हाँ जी, हाँ जी। ऑबियसली मूवीज़ बनती रहती हैं तो आई थॉट कि मैं उनसे एक्ज़ेक्टली पूछूँ कि जो देखा या जो कल मूवी में दिखाया वो एक्ज़ेक्टली हुआ भी था कि नहीं? तो उस चीज़ में चीज़ पता लगी कि जब वो मूवी मेरे पैरेंट्स देखने गए थे। तो राइट फ्रॉम द स्टार्ट लास्ट दे जस्ट क्राइंग बिकॉज (वो शुरुआत से अंत तक रो रहे थे क्योंकि) वो कह रहे थे कि एक-एक चीज़ जो उसमें दिखाई कि बिलकुल सच है और ऐसा ही हुआ था।

तो उसे पूरी कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) को, उसी मूवी को जब देखा और उनसे बातचीत की तो काफ़ी क्वेश्चन्स (प्रश्न) मेरे सामने आए तो आइ थॉट (मैंने सोचा) मुझे आपसे बात करनी चाहिए।

आचार्य: उन्नीस सौ नब्बे में आपके परिवार में कौन-कौन थे? जिन्होंने श्रीनगर से पलायन करा था?

प्र: आचार्य जी, मैं बिलकुल शुरू करूँ तो मेरे दादाजी-दादी, मेरे फादर (पिता) और मदर (माता), मेरे ब्रदर (भाई)। मेरे ब्रदर (भाई) सिर्फ़ चार-पाँच महीने के थे उस समय।

आचार्य: छोटा भाई पाँच महीने का, आप चार साल के थे।

प्र: हाँ जी, और मेरे अंकल , मेरे दो अंकल हैं और हमारी ज्वाइंट फैमिली (संयुक्त परिवार) थी पूरी और उसमें मेरे दादाजी के जो ब्रदर हैं उनकी फैमिली भी थी। और भी और कुछ फैमिली थी, लिविंग इन अ ज्वाइंट फैमिली (संयुक्त परिवार में रहते थे)। तो सबों ने एक ही साथ किया था और जब मेरे पैरेंट्स के साथ कॉन्वरसेशन (वार्तालाप) हुआ तो उन्होंने स्पेसिफिकली (विशेषतया) वो डेट (तारीख) भी मेंशन (उल्लेखित) की थी। वो जनवरी का महीना था जब सब एक साथ ही निकले थे।

तो सबसे, ये जो पूरा इन्सिडन्ट (घटना) हुआ, मूवी देखने का और ये जो बातचीत हुई। सबसे शॉकिंग चीज़ जो मुझे लगी कि जो नेरेटिव हमारे दिमाग में था एज़ अ कश्मीरी पंडित, वो कितना डिफरेंट है। इस फ़िल्म में किरदार है कृष्णा, कश्मीर फाइल्स में किरदार कृष्णा है, तो उसमें दिखाया जा रहा है कि वो जो किरदार है उन्हें कश्मीर के बारे में कुछ भी नहीं पता। न उन्हें पता है कि एक्सोडस (निष्कासन) हुआ था, कैसे हुआ था।

और जो नेरेटिव पता है वो ये है कि एक कम्युनिटी (समुदाय) के बीच में क्लैश (टकराव) हुआ था और उसमें एक उस क्लैश के कारण कुछ कम्युनिटी ने पलायन कर दिया। एक्ज़ेक्टली सेम नेरेटिव मेरे मन में भी अभी तक रहा था। तो जो एक्ज़ेक्टली शॉक (वास्तव में चौंकने वाली) की बात मेरे लिए थी कि हमारे फैमिली में बहुत इंस्टेन्सेस पर कभी दादी, कभी दादा, कभी अंकल, कभी फादर ने काफ़ी डीपली (गहराई) तो नहीं बट दे यूस टू गिव अ सम क्लूज (लेकिन वो कुछ संकेत देते थे) कि ऐसा कुछ हुआ था।

आचार्य: क्या हुआ था?

प्र: एक्सोडस (निष्कासन) हुआ था एंड कश्मीरी पंडित के ऊपर काफ़ी कुछ चीजें, दे वर मास किलिंग (बड़े पैमाने पर हत्या हुई) और काफ़ी कुछ। घर से बाहर निकाला गया था। लेकिन ये सब चीज़ें बातचीत होती रहती थीं। लेकिन एक मेरी कान्शियसनेस (चेतना) पर ओवर आर्किंग फिगर (व्यापक आँकड़ा) ये थी कि जो उस फ़िल्म में, मैंने बताया कि इट जस्ट काइन्ड ऑफ़ क्लैश हैपन (किसी प्रकार का कोई टकराव था) और हम यहाँ आ गए।

तो मैं आचार्य जी, मैं आपसे ये पूछना चाहूँगा कि ऐसा क्यों है कि इंस्पाइट ऑफ लिविंग इन कश्मीरी फैमिली एंड व्हेयर दे हैव एक्चुअली गोन थ्रू आल दिस (कश्मीरी परिवार में रहने के बावज़ूद, जब वास्तव में वे इन सबसे होकर गुजरे) जो उनके साथ ऐसा कुछ हुआ था फिर भी ये जो नेरेटिव है, ये जो नेरेटिव जिसमें हम ये कह रहे हैं कि एक नॉर्मल सा क्लैश (टकराव) था, वो ज़्यादा अपील कर रहा और वो हमारे कॉन्शियसनेस में।

आचार्य: साधारण शब्दों में तुम ये पूछ रहे हो कि तुम खुद भुक्त-भोगी हो। आपने आपके परिवार ने सबने सीधा-सीधा कष्ट को अनुभव किया है, खुद ही पलायन किया है और उसके बाद भी आपकी चेतना में, आपके मन में, आपके विचारों में कभी इस बात का बहुत महत्व नहीं रहा। वो मुद्दा, वो सवाल आपके लिए कभी बहुत क़ीमती हुए नहीं, तो आपने ये बेहतर समझा या इस बात में ज़्यादा सुविधा समझी कि कोई साधारण-सी झड़प थी दो समुदायों के बीच में और एक समुदाय पलायन कर गया।

अच्छा! तो आप पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों हैं कि आप खुद कश्मीरी पंडित हैं और उसके बाद भी आपके भीतर कोई न तो उस बात को लेकर दर्द था, न महत्व था, न कश्मीरी होने जैसी कोई पहचान या चेतना थी।

देखो, ये तो बात बहुत सीधी-सी है। मन ऐसी चीज़ को याद रखने का कष्ट और जोखिम क्यों उठाएगा? जिसको अगर याद रखो तो आगे एक कर्तव्य खड़ा हो जाएगा, मेहनत करनी पड़ जाएगी। अब समस्या खड़ी हो गई न? अब पिक्चर देख आये हो, पिक्चर देखने के बाद आपने अपने घर पर बात कर ली और घर पर बात कर ली तो, जिसे कहते है गड़े मुर्दे उखड़े, गड़े मुर्दे ही उखड़े। तो अब तकलीफ़ खड़ी हो गई न?

इससे कहीं बेहतर ये था कि ये माने चलो की कुछ खास हुआ ही नहीं था, वैसा कुछ मान लो तो कोई तकलीफ़ भी नहीं खड़ी होती है, तो हम खुद ही अपने अतीत के जो कष्टप्रद अध्याय होते हैं हम उनको बंद करके रखते हैं, क्योंकि उनको खोलोगे तो तकलीफ़ खड़ी हो जाती और तकलीफ़ सिर्फ़ स्मृति के तौर पर खड़ी नहीं होती, तकलीफ़ कर्तव्य के तौर पर भी खड़ी हो जाती है।

अगर मानोगे कि एक स्थिति खड़ी हुई थी, जिसमें अन्याय हुआ था, जिसमें शोषण हुआ था, जिसमें लाख-दो लाख व्यक्तियों को, कश्मीरी हिंदुओं को अपने घर से विस्थापित होना पड़ा था तो फिर समझ रहे हो न? फिर एक धर्म-संकट खड़ा हो जाता है कि अगर ऐसा वाक़ई हुआ था तो फिर तो अब आपके ऊपर एक ज़िम्मेदारी आ गई। क्या ज़िम्मेदारी आ गई? कि उस बारे में कुछ करी है, आवाज़ उठाई है, जो लोग अपना घर-द्वार छोड़कर के इधर-उधर छिटके पड़े हैं, कहीं इधर कहीं उधर अपना जीवन बिता रहे हैं, उनको ससम्मान घर वापस पहुँचाइए।

अब कौन इतना श्रम करे? कौन ये ज़िम्मेदारी उठाए? तो इससे बेहतर ये लगता है कि खुद को ही बोल दो कि नहीं साहब, कुछ खास हुआ ही नहीं था, ऐसे ही थी मामूली झड़प थी, जिसमें कुछ ग़लती इधर की थी कुछ ग़लती उधर की थी। और एक पक्ष बहुमत में था, एक पक्ष अल्पमत में था और जो पक्ष अल्पसंख्यक था वो पलायन कर गया, उसको अपना हित इसी में लगा कि हम कहीं और जाकर बस जाते हैं।

तो इस तरीक़े से हम तथ्य का एक बड़ा सस्ता सरलीकरण कर देते हैं, ताकि हमें सहूलियत रहे, ताकि हमारे ऊपर कोई कर्तव्य का बोझ न बने। तो ऐसा हो जाता है लेकिन ज़िंदगी बड़ी विचित्र सी चीज़ है। आप तथ्यों को कितना भी नकारने की या झुठलाने की या भुलाने की कोशिश करिए वो कोई न कोई तरीक़ा ढूँढ़ लेते हैं आपके सामने कभी न कभी दोबारा खड़े हो जाने का, वो तथ्य आपके सामने खड़े हो गए हैं।

आपने आज तक मुझसे कभी कश्मीरी पंडित बनकर बात नहीं करी, ठीक है। संस्था के लोग आपको कई नामों से जानते हैं, संस्था के बाहर के लोग भी आपको बहुत जानते हैं लेकिन इस तरह से तो कोई कभी नहीं जानता होगा जैसे अभी आप मुझसे बातचीत कर रहे हैं कि रोहित राजदान जो एक कश्मीरी पंडित हैं, ऐसे तो कोई नहीं जानता होगा।

अब एक समस्या खड़ी हो गई न? क्योंकि एक नयी पहचान आ गई, जब एक नयी पहचान आ गई है तो उस नयी पहचान के साथ इंसाफ भी करना पड़ेगा और इंसाफ, इंसान की दुनिया में आसानी से मिलता नहीं है। इंसाफ करवाना पड़ता है तो इसलिए बेहतर इंसान को ये लगता है कि वो सब पुरानी बातों पर धूल डालो और कुछ-कुछ करके नयी ज़िंदगी आगे बढ़ाओ, दाल- रोटी का जुगाड़ करो, खेल आगे बढ़े।

प्र: आचार्य जी, अध्यात्म में ऐसा कहा जाता है कि जितने भी आपकी आईडेंटिटीज़ (पहचानें) हैं, उसको ड्राप (छोड़ा) किया जाए, कि मैं भी अपनेआप में इस बात को एक अच्छा फील करता था कि मेरे दिमाग में ये बात आती नहीं है कि मैं कश्मीरी पंडित हूँ।

आचार्य: नहीं, ये बिलकुल ठीक बात है कि आपकी सारी जो पहचानें हैं उनमें सत्य कहीं नहीं होता, तो ठीक है। ये मत कहो कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ, कह दो अन्याय हुआ, अन्याय हुआ। और अन्याय किसी के साथ भी हुआ हो उसको रोकना, स्थिति में सुधार करना तो व्यक्तिगत धर्म है न? आप कश्मीरी पंडित हो और उधर पचास कश्मीरी पंडित और हैं, उनके साथ कुछ ग़लत हो रहा है, ठीक है। आप उनकी सहायता करने क्या सिर्फ़ तब जाओगे जब आप स्वयं एक कश्मीरी पंडित हो? ठीक है?

क्या आपको सही काम करने के लिए अपनी कोई पहचान याद रखना ज़रूरी है? नहीं न? तो मानवता के नाते, सच्चाई के नाते जो भी कोई ऐसा है जिसके साथ अन्याय हो गया है उसके पक्ष में तो आप थोड़ा बोलोगे, उसकी आप कुछ मदद करना चाहोगे, तो मैं भी नहीं कह रहा हूँ कि आप एक नयी पहचान बना लो और आप कल से घूमने लग जाओ ये कह मैं तो कश्मीरी पंडित हूँ। मैं बिलकुल नहीं कह रहा हूँ, वो बिलकुल ठीक कहा कि सारी जो आइडेंटिटीज (पहचानें) होती हैं वो सच को छुपा देती हैं और आप जितना ज़्यादा किसी पहचान से ताल्लुक रखोगे, आप सच से उतनी दूर होते जाते हो।

तो मैं नहीं कह रहा हूँ कि आप ये पूरी बातचीत एक कश्मीरी बन कर करो, ये पूरी बातचीत आप एक अच्छे इंसान बन के तो कर सकते हो न? आप एक जागरूक एक सजग नागरिक बन के तो ये बात चीत कर सकते हो न? और आप जितना ज़्यादा एक सजग व्यक्ति की तरह बात करोगे, उतना ज़्यादा ये बातचीत गहराई पाएगी।

तो ये कोई बात सामुदायिक भर नहीं है, ये बात कोई कम्यूनल बात नहीं है कि इसका इसका जो ताल्लुक है वो बस एक कम्युनिटी (समुदाय) से है, दुनिया की कोई भी कम्युनिटी हो, कहीं भी हो, किसी देश की हो किसी धर्म की हो अगर कहीं कुछ भी ग़लत हो रहा होता है तो आप एक अच्छे इंसान होने के नाते उस विषय में कुछ करना चाहते हो न? कुछ कर नहीं सकते यदि तो कम से कम आवाज़ आप अपनी उठाना चाहते हो।

अभी रूस-युक्रेन की लड़ाई चल रही है वहाँ भी आपके पास एक मत है और वहाँ भी आप कुछ बोलते हो, जबकि बहुत दूर के हैं रूस-यूक्रेन। तो बिलकुल नहीं आवश्यकता है कि कश्मीरी पंडित ही बन जाओ लेकिन एक ऐतिहासिक बात है और आपके आसपास के जीवित लोग हैं जो भुक्त-भोगी रहे हैं और आज भी भुगत रहे हैं एक कष्ट को, उनके कष्ट को लेकर के कुछ करना बिलकुल ठीक बात है न?

तो ये बातचीत उसी नज़रिए से की जा सकती है कि कुछ लोग हैं कई लाख लोग हैं जो आज भी विस्थापित होने की पीड़ा सह रहे हैं, तो वो चीज़ क्या है? वो चीज़ क्यों है? एक व्यापक तौर पर ये बात करना कि ऐसा होता ही क्यों है? दुनिया में जहाँ भी ऐसा होता है, वहाँ क्यों होता है ऐसा? कैसे रुके? ये चर्चा हम कर सकते हैं।

प्र: आचार्य जी, पहला जो आपने उत्तर दिया था तो मैं सोचता हूँ उसमें भी इसी का जवाब है कि हम ऐसा तो है नहीं कि बिलकुल आईडेंटिटीलेस (पहचानरहित) रहेंगे, हम चुनते भी उन आईडेंटिटी (पहचान) को हैं, जहाँ अपना लाभ हो और उसको ड्रॉप करते (छोड़ते) हैं जो हो सकता है जब कभी कश्मीरी खाना आए तो मैं बिलकुल उसमें तैयार हो जाऊँ कि तब मैं कश्मीरी हूँ और जब ऐसा कुछ आए जहाँ कुछ कर्तव्य का काम है तो वहाँ बेकलेश (पीछे हटना) ले लूँ।

आचार्य: बिलकुल हो सकता है कि कश्मीरी होने के नाते कुछ सहूलियतें आ जाएँ, आज सरकार घोषणा कर दें कि हर कश्मीरी व्यक्ति को इतना पैसा दिया जाएगा तो आपको तुरंत अपनी कश्मीरी पहचान याद आ जाए। लेकिन अपनी कश्मीरी पहचान को रखना, याद रखना तब महँगा सौदा हो जाता है जब कश्मीरी बनो तो कुछ करना पड़ेगा, सवाल पूछेगें न?

लोग पूछेंगे सवाल, आपका ही मन आपसे सवाल पूछेगा, कि बार-बार कहते हो कि मैं कश्मीरी पंडित हूँ, कश्मीरी पंडित हूँ, तो फिर ये जो इतने लोग विस्थापित हुए और उन्होंने इतने कष्ट झेले कितने लोग मारे गए जो ज़िंदा है उनके धन-संपत्ति, घर, जमीनें, खेत सब पीछे पड़े हुए हैं कश्मीर में, उसपर कब्जा हो गया है, तो साहब इस विषय में आप क्या कर रहे हैं?

तो आपके पास कोई जवाब होगा नहीं, जब आपका ही मन आपसे प्रश्न पूछेगा कि ये जो हुआ उसके बारे में अब आप क्या कर रहे हैं? तो आपके पास कोई जवाब नहीं होगा, तो आपके सामने वो सवाल ही कभी खड़ा न हो इसलिए फिर आप इस बात को सुविधा-पूर्वक दबा देते हैं कि मैं एक कश्मीरी हूँ। ये एक तरह का समर्पण है परिस्थितियों के आगे, ये एक तरह की स्वीकृति है कि मैं दुर्बल हूँ और अब कुछ कर तो सकता नहीं, जब मैं कुछ कर नहीं सकता तो वो पुरानी बातें याद रखके क्या होगा? ये दुर्बलता है, दीनता है।

प्र: अभी जो आपने उत्तर दिया उसी से मिलती-जुलती बात जो मैं अपने पिताजी से कर रहा था, अपनी मदर (माताजी) से बात कर रहा था, तो उन्होंने बार-बार हमें इस बात पर, मैंने उनसे पूछा भी कि आज तक आपने इन इस-इस बात पर चर्चा छेड़ी क्यों नहीं? इस बात को अब तीस-बत्तीस साल हो गए, कभी भी घर में इतने मसलों पर बात हुई है, तो ये बात कभी आपने रखी क्यों नहीं? कि ऐसा भी हुआ, ऐसा भी हुआ।

आचार्य: घर में और मसलों पर सब पर बात होती है ये बात कभी होती नहीं थी।

प्र: ये बात कभी होती नहीं थी, खासकर जिस, वो कॉन्वरसेशन मैंने रिकॉर्ड भी की है। जिस तरह से हमने बात की, जिन हर बारीकियों पर, जो मुझे अभी तक, आज तक नहीं पता था कि हमारा घर था जहाँ पर चौदह-पंद्रह कमरे थे, इतनी जमीन थी कोई डिटेल्स (विस्तारपूर्वक) में बात ही नहीं हुई थी। बातें होती थी बस आगे के लिए कि पढ़ो आगे बढ़ो।

तो ये भी काफ़ी और यही चीज़ सेम देखा हमने कल जो फ़िल्म थी उसमें जो कैरेक्टर (चरित्र) कृष्ण है। उसके साथ भी हुआ कि वही नॉर्मली (सामान्यत:) अब कश्मीरी फैमिलीज में देखने को मिलता है कि बात ही नहीं होती इसके बारे में।

आचार्य प्रशांत: एक घुटा हुआ मौन, वो मौन जिसमें रोने वाले के मुँह पर पट्टी बाँध दी है कि उसकी आवाज़ भी सामने न आए, ये उस तरह का मौन है। क्योंकि अगर बातचीत होगी तो घाव खुलेंगे, दर्द होगा तो फिर बातचीत ही नहीं की जाती कि बातचीत ही मत करो न, कौन बातचीत करे? आँसू बहेंगे तो शायद इसलिए आपके घर में बत्तीस सालों से कोई चर्चा नहीं हुई इस चीज़ की। हुई भी होगी तो बड़े सतही तरीक़े से हुई होगी मैं समझ सकता हूँ।

प्र: आज की जो मेरी कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) हुई है अपने पिताजी से और अपनी माताजी से तो उसमें एक प्रश्न मैंने खड़ा किया उस कॉन्वर्सेशन (वार्तालाप) में आपको क्या लगता है किस कारण ये सब कुछ हुआ?

तो दो-तीन शब्द जो खास स्पेसिफिकली उन्होंने क़ोट (उद्धरित) किए। तो पिताजी ने बोला कि एज़ अ कम्यूनिटी (समुदाय) कश्मीरी पंडित काफ़ी सेल्फ-सेंटर्ड (खुदगर्ज़) रही है और काफ़ी सेफली प्ले (सुरक्षित खेलना) करना चाह रही थी। और जब मैंने मदर (माताजी) से भी पूछा ये बात तो उन्होंने कहा कि एक स्पेसिफिक वर्ड (विशेष शब्द) इस्तेमाल किया था कि काफ़ी बुज़दिल थे। तो मुझे काफ़ी सुनने में अजीब-सा भी लगा, हार्ट ऐकिंग (दिल में पीड़ा देने वाला) सा था।

उन्होंने स्पेसिफिकली ये बोला कि ये कारण है कि सेल्फ-सेंटर्डनेस (खुदगर्ज़ी) की वजह से, दे प्ले वेरी सेफ (वे बहुत सुरक्षित खेल रहे थे) और बुज़दिली की वजह से ऐसा हुआ।

आचार्य: नहीं, इस में थोड़ा-सा मेरा नज़रिया दूसरा है। तुम पूछोगे, 'क्यों हुआ हमारे साथ ये हम इसका कोई प्रतिकार क्यों नहीं कर पाए?' यही सवाल है?

देखो, बात ताक़त की है। ठीक है? प्रतिकार करने के लिए ताक़त चाहिए न? और जहाँ तक इस मनुष्य प्रजाति की बात है इसके पास ताक़त दो ही जगहों से आ सकती है। क्योंकि मनुष्य के दो ही केंद्र होते हैं ठीक है। अब थोड़ा हम विशुद्ध अध्यात्म की ओर बढ़ रहे हैं, मुझसे बात कर रहे तो उधर जाना ही पड़ेगा। कौन से दो केंद्र होते हैं किसी भी इंसान के?

प्र: सत्य और असत्य।

आचार्य: उसको हम कह सकते हैं एक शरीर का प्रकृति का या उसे कह सकते हैं पशु का, एक पशु का केंद्र होता है हम सबके भीतर। ठीक है? जो देह का केंद्र है जो प्रकृति ने दिया है वो पशु का केंद्र है और एक केंद्र होता है हमारे भीतर चेतना का। तो हम ये दो होते हैं हर समय। हम पशु होते हैं हम चेतना होते हैं। और ये प्रत्येक व्यक्ति को चुनाव करना होता है अपने जीवन में कि वो अधिक क्या है? वो ज़्यादा क्या है? वो ज़्यादा पशु है या ज़्यादा चेतना है।

आप पूरी तरह पशु हो जाओ, आपके भीतर से बड़ी ताक़त उठेगी, पशुता में बहुत बल होता है। आप अपनी चेतना को बिलकुल न्यूनतम तल पर ले आ दो और बिलकुल जानवर बन जाओ आप, आप में बहुत ताक़त उठेगी जैसे किसी अपराधी में ताक़त होती है। एक अपराधी की ताक़त देखी है या एक पागल हाथी की ताक़त देखी है? पागल और हाथी, उसके पास कोई चेतना नहीं है और वो पशु भरपूर है पागल और हाथी। पागल हाथी, अपराधी, कोई बलात्कारी जो अभी वासना में बिलकुल उन्मत है। इनमें बड़ी ताक़त पैदा हो जाती है। ठीक है?

भ्रम में, अंधकार में, अज्ञान में भी बड़ी ताक़त होती है बहुत ताक़त होती है। और दूसरी तरफ़ ताक़त होती है चेतना में, चेतना जितनी गहरी होती जाती है जितनी प्रबल होती जाती है वो उतना बल देती जाती है। उसको बोलते हैं आत्मबल। आपकी सच्ची पहचान का बल, आपकी आत्मा का बल उसे आत्मबल बोलते हैं।

तो जानवर होने में ताक़त है और चेतना होने में भी बड़ी ताक़त है। वास्तव में विशुद्ध चेतना होने में, जानवर होने से कहीं ज़्यादा ताक़त है। ठीक है? तो ये दो केंद्र हैं आपके, आप जानवर हैं तो आपके पास ताक़त रहेगी और जैसे-जैसे आप विशुद्ध चैतन्य होते जाएँगे उधर भी आपकी ताक़त बढ़ती जाएगी। लेकिन अगर आप बीच के बिच्छू हैं आप बीच में फँसे हुए हैं तो आप बिलकुल बलहीन रहेंगे, वहाँ कोई ताक़त नहीं रहेगी, ये है ताक़त की कमी का कारण। बात समझ में आ रही है?

प्र: हाँ।

आचार्य: तो या तो ये चुनाव कर लो अगर ताक़त चाहिए जीवन में कि जानवर हो जाना है बिलकुल, किसी ज्ञान की ज़रूरत नहीं है, किसी बोध की ज़रूरत नहीं, होश की ज़रूरत नहीं, ऊँचाई की ज़रूरत नहीं, समझदारी की ज़रूरत नहीं तो जैसे किसी मदमस्त पशु के पास ताक़त होती है। एक सांड है वो अपने खुरों से धरती खुरच रहा है और भारी साँस ले रहा है और लड़ने को उतारू है वैसी ताक़त आप में आ जाएगी और वैसी ताक़त बहुत सारे इंसानों में होती है। ठीक है? और उससे ऊँची ताक़त हम कह रहे हैं किसमें होती है? चेतना में, एक चैतन्य व्यक्ति है उसमें बहुत ताक़त होती है।

जो ये भारत में जनसंख्या रही है बहुसंख्यक, जिनको हम सनातनी कहते हैं, इनकी विडंबना ये है कि ये पशु हो नहीं सकते, उनको विरासत में जो मिल गया है अपने ऋषियों से, उसके कारण अब इनकी मजबूरी ये है कि अब ये पशु हो नहीं सकते। तो पशु हो नहीं सकते, तो पशु होकर के जो ताक़त मिलती है वो ताक़त इनको मिलेगी नहीं – सनातनियों की बात कर रहा हूँ।

जानवर हो करके जो बल मिलता है वो बल अब आपको नहीं मिल सकता, आपको आपके पूर्वजों ने ही, उस बल से ही वंचित कर दिया है क्योंकि आपके पूर्वजों ने आपको बोध का कुछ ऐसा माहौल दे दिया है, उन्होंने यहाँ की जैसे मिट्टी में ही बोध को, विस्डम को स्थापित कर दिया हो।

तो आप कितनी भी कोशिश कर लो आप जानवर नहीं हो सकते पूरे तरीक़े से। बड़ा मुश्किल होगा, हो सकता हो बड़ा मुश्किल होगा, हज़ार लोग कोशिश करेंगे तो पाँच-सात-दस को सफलता मिल सकती है कि वो जानवर ही बन जाएँ। नहीं तो हमारी भाषा में, हमारे मुहावरों में, हमारे संस्कारों में, हमारे त्योहारों में, हमारी बोली में, हर चीज़ में बोध के तत्व बैठे हुए हैं जो आपको अनुमति ही नहीं देते पूर्णतया पशु हो जाने की। तो अब आप वंचित रह गए न वो पशु वाली ताक़त से।

तो अब आपको अगर ताक़त चाहिए तो आपको क्या करना होगा? आपको जाना होगा विशुद्ध चैतन्य की ओर, विशुद्ध चैतन्य की ओर आप जा नहीं पाते, मैं सनातनियों की बात कर रहा हूँ, क्यों नहीं जा पाते? क्योंकि विशुद्ध चैतन्य की ओर जाने के लिए आपको चाहिए वेदान्त और आपको बाक़ी सब ऊटपटांग चीज़ें त्यागनी होंगी, सारे अंधविश्वास, सारे कपोल कल्पनाएँ ये सब छोड़नी पड़ेंगी, यहाँ तक कि बहुत सारी जो पौराणिक बातें हैं आपको उनको भी त्यागना पड़ेगा क्योंकि वो बिलकुल वेदान्त विरुद्ध है।

जैसे बहुत सारी बातें जो गरुड़ पुराण में लिखी हैं, अगर आप गरुड़ पुराण पकड़ के बैठे हुए हैं, तो आप विशुद्ध चैतन्य की ओर कभी बढ़ ही नहीं सकते। लेकिन जो भारत का आम सनातनी मन है, वो अपने अंधविश्वास और अपनी कल्पनाएँ और अपनी झूठी मान्यताएँ-धारणाएँ, बहुत सारी यूँ ही व्यर्थ की प्रथाएँ वो सब भी छोड़ने को तैयार नहीं है। तो अब देखिए उसकी विडंबना, वो अब कहाँ फँस गया।

जानवर वो हो नहीं सकता तो जानवर की ताक़त से वंचित हो चुका है सदा के लिए, विशुद्ध चैतन्य हो पाने का निर्णय वो नहीं कर पा रहा क्योंकि अज्ञान के कारण वो अंधविश्वास को सच माने बैठा है। कथाओं-कहानियों में उलझा हुआ है। बहुत सारी प्रथाएँ-परम्पराएँ पकड़कर बैठा है, जिनका कोई मूल्य नहीं, जिनका कोई अर्थ नहीं। जो बस पैरों में बेड़ियों समान है, सिर के बोझ समान है, तो उसको वो बल भी नहीं मिल पा रहा जो?

प्र: चेतना से मिल सकता है

आचार्य: चेतना से मिल सकता है, तो ये दोनों तरफ़ से गए, दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम। जो बल माया से मिलता, वो मिल नहीं सकता, जो बल राम से मिलता उसको पाने का आपने कभी चुनाव नहीं करा क्योंकि राम के पास अगर जाना है तो अहंकार त्यागना पड़ता है। राम का अर्थ होता है विशुद्ध चैतन्य। राम माने ब्रह्म। मन की करतूतें लेकर के ब्रहमस्थ थोड़े ही हो सकते हो।

तो इधर की ताक़त मिल नहीं सकती, उधर की ताक़त पाने का चयन नहीं किया और बीच में जो है वो क्या है? वो बल-हीनता का बहुत बड़ा क्षेत्र है। अधिकांश भारतीय विशेषकर सनातनी बल- हीनता, के उस क्षेत्र में फँसे हुए हैं। यही कारण है कि जगह-जगह पीटे जाते हैं, जगह-जगह पलायन होता है उनका संहार होता है, आप एक प्रांत की और एक घटना की बात कर रहे हो।

आप कह रहे हो कश्मीर में उन्नीस-सौ-नब्बे में कुछ हुआ और मैं कह रहा हूँ पिछले सवा हज़ार साल से जो हो रहा है वो क्या कुछ अलग था? वो कुछ अलग था क्या? क्या कश्मीर अकेली जगह है जहाँ से सनातनी निकाल के खदेड़े गए? और कश्मीर में भी क्या पहली बार खदेड़े गए? छह दफा-सात दफा पलायन हो चुका है, आप बात करते हो कश्मीरी पंडितों की, कहते हो कम थे, अल्पसंख्यक थे वहाँ से भगा दिए गए, अल्पसंख्यक हो कैसे गए? अल्पसंख्यक कैसे हो गए?

धर्म तो माँ होता है, माँ को कोई कैसे छोड़ सकता है? अल्पसंख्यक कैसे हो गए? बात सारी ताक़त की है। धर्म से प्रेम तभी हो सकता है न जब धर्म का वास्तविक अर्थ पता हो?

जब धर्म का वास्तविक अर्थ ही नहीं पता तो जब कोई गर्दन पर तलवार रख देता है तो आप धर्म-परिवर्तन करने को तैयार हो जाते हो, अन्यथा आप कहोगे कि चला दो तलवार, काट दो गर्दन। माँ को थोड़े ही छोड़ सकते हैं, माँ तो अब शरीर में बैठ गई है न! खून की हर बूँद में माँ मौजूद है तो माँ को कैसे छोड़ देंगे? चाहें तो भी नहीं छोड़ सकते, तो धर्म कैसे छोड़ देंगे हम?

आपको अगर वेदान्त से प्रेम होता, गीता से प्रेम होता, उपनिषदों से प्रेम होता, तो आप कहते कि हम चाहेंगे तो भी हमसे कृष्ण तो छूटेंगे नहीं, तो हम कैसे धर्म-परिवर्तन कर लें, पर धर्म परिवर्तन हुआ और खूब हुआ, फिर अल्पसंख्यक हो गए।

तो मूल मुद्दे पर जाना होगा, मूल मुद्दा जो है वो ये है कि जो सनातनी है जिसको हम हिंदू बोलते हैं वो न घर का है न घाट का है, बिलकुल जानवर वो हो सकता नहीं और देवत्व की जो संभावना है उसको साकार करने का श्रम वो कभी करता नहीं। तो वो आसमान से गिरे खजूर में लटके वाली उसकी स्थिति रहती है।

बांग्लादेश में क्या हुआ? पाकिस्तान के सारे हिन्दू कहाँ चले गए? कश्मीर तो बहुत छोटा सा है कुल करोड़-एक करोड़ भी उसकी आबादी नहीं है। इतने बड़े पाकिस्तान में इतने हिन्दू थे, वो कहाँ चले गए? उसकी कौन बात करेगा? अफगानिस्तान के कहाँ गये उसकी कौन बात करेगा?

प्र: बांग्लादेश

आचार्य: बांग्लादेश के कहाँ चले गए? इसी तरीक़े से एक समय पर मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया यहाँ हिंदू जनसंख्या भी थी और हिंदू संस्कृति भी थी, वो सब कहाँ चला गया, इतना कहना – इस भर से काम नहीं चलेगा न कि दूसरे लोगों ने हमपर जुल्म किया और हमें या तो मार दिया या हमारा धर्म-परिवर्तन करा दिया।

भाई! दूसरे लोग या दूसरी ताक़तें वो जैसे भी हैं आप पहले अपनी बात करिए न, आप बार-बार हारते क्यों रहे? आप अपना धर्म बदलने को तैयार क्यों होते रहे? और क्या वजह है कि आपको किसी एक देश या किसी एक समुदाय ने ही प्रताड़ित नहीं करा।

आप दुनिया की किसी भी ताक़त का नाम ले लें, संभावना ये है कि उस ताक़त ने हिंदुस्तान को पद-दलित करा ही होगा, यूरोप के किसी भी देश को पकड़ लो, हम तो सिर्फ़ अंग्रेजों को अधिकतर याद रखते हैं कि अंग्रेज आए और हमारा शोषण किया। पुर्तगालियों ने नहीं किया क्या? फ्रेंच ने नहीं किया क्या? डच ने नहीं किया? स्पिनयार्स नहीं चाहते थे? तो और अंग्रेज डरे हुए थे कि कहीं रूसी न घुस आएँ। अफगानिस्तान वाली सारी लड़ाइयाँ आज से सौ- डेढ़ सौ- दो सौ साल पहले। वो हुई ही इसीलिए क्योंकि अंग्रेजों को साफ़ दिख रहा था कि रूस भी घुस सकता है भारत में। वो घुसा नहीं ये किस्मत की बात है, तो जिसको मौका लगा वही घुसा भारत में।

हमने अभी यूरोपियन देशों की बात करी, इधर से जापानी नहीं घुसे थे द्वितीय विश्वयुद्ध में? चीनी नहीं घुसे? वो तो अभी भी घुसे हुए हैं गलवान में, चीनी नहीं घुसे? लद्दाख में चीनी अभी भी बैठे हुए हैं, आपका बहुत बड़ा भू-क्षेत्र चीन के कब्जे में है। पाकिस्तानी नहीं घुसे? आप ही का एक टुकड़ा पाकिस्तान और वो आपके एक भू-भाग को हथियाए बैठा हुआ है और फिर और जाएँ थोड़ा इधर पश्चिमी एशिया की ओर, तो तुर्क और अरब ये नहीं घुसे क्या? अफ़गानी ये नहीं घुसे? तो अफ़गानी, तुर्क अरब पूरा, यूरोप का एक-एक देश, कुछ तो आप में कोई खूबी होगी न? (व्यंग्य करते हुए) कि ये सब के सब आपके ऊपर चढ़ते रहे, ताक़त कहाँ हैं?

और मैं उन अपवादों की बात नहीं कर रहा, जहाँ भारतीय राजाओं ने या भारतीय योद्धाओं ने जम कर के प्रतिरोध किया और वैसे बड़े गौरवान्वित करने वाले उदाहरण मौजूद हैं मैं उनके प्रति पूरा सम्मान भी रखता हूँ। तो कोई कृपा करके ये इल्जाम न लगाए कि आप उनकी तो बात ही नहीं कर रहे हैं जिन्हें बड़े वीरतापूर्वक, लड़ाइयाँ लड़ी और कई बार जीते भी। आप पृथ्वीराज चौहान को क्यों भूल रहे हैं? और बहुत सारे ऐसे नाम हैं, देखिये वो नाम अपवादों की तरह हैं, भूलना नहीं चाहिए। उन नामों के प्रति हमें खूब सम्मान होना चाहिए, लेकिन तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता।

तथ्य ये है कि रात बहुत काली है और उसमें कुछ अगर आपको टिमटिमाते तारे दिख जाएँ, तो उससे अधिक से अधिक थोड़ी आशा बँधती है, थोड़ा सौंदर्य बढ़ता है लेकिन रात की कालिमा कम नहीं होती। तो जो ये मूल अशक्ति रही है, बलहीनता रही है, उसके कारण को हमें समझना पड़ेगा। उसका कारण आंतरिक है और आंतरिक कारण जो है वो यही है- ‘बल तो आत्मा से ही आता है बल तो शुद्ध चेतना से ही आता है’।

कुरुक्षेत्र में लड़ने का बल अर्जुन को गीता ज्ञान से ही मिला। अब जब गीता ज्ञान से आम सनातनी इतना दूर हो गया है तो किसी भी फिर दुश्मन से लड़ने का बल उसमें कहाँ से आएगा? गीता ही सिखाती है न? कि तुम किनको मारने से डर रहे हो जो कृष्ण के विरुद्ध हैं वो तो कब का मर चुका, तुम उसे मरने से डर रहे हो और गीता से आपको कोई प्रयोजन नहीं, धर्म के नाम पर ऊटपटांग त्योहार और रीति-रिवाज यही पकड़कर बैठे हैं।

कोई पूछे आपसे कि कुछ थोड़ा दर्शन बता दीजिए, धर्म के स्तंभों के बारे में कुछ चर्चा कर लीजिए, तो आपको कुछ पता नहीं, धर्म का मतलब आपके लिए यही है बस कि त्यौहार मनाना, मजे करना, होली-दिवाली, कुछ प्रथाएँ, कुछ परंपराएँ जो खोखली जिनका न कोई अर्थ है न आपको पता है, पर बस आप उनको धर्म समझ कर के ढोए जा रहे हो।

जब इस तरीक़े का हो जाए एक समुदाय, तो उसमें बल कहाँ से आएगा? और फिर ये कोई अचरज़ की बात नहीं होनी चाहिए कि उसको जगह-जगह से खदेड़ा जाए, वो जहाँ भी रहे कमज़ोर ही रहे। दक्षिण अफ्रीका तक में भारतीयों पर ही विशेषकर जुल्म हो रहा था। गांधी जी को वहाँ पर क्यों आंदोलन करना पड़ा, क्योंकि वहाँ पर भी भारतीयों को ही पकड़ा गया था अपमानित करने के लिए, तो हमें थोड़ा सा तो आत्म-मंथन करना होगा न? कि क्या बात है? क्योंकि बात सिर्फ़ कश्मीर की नहीं है और बात सिर्फ़ उन्नीस सौ नब्बे की नहीं है, ये सिलसिला तो पिछले हज़ार साल से चला ही आ रहा है और बड़े खेद की बात है कि आगे भी चलेगा, अगर हम बदले नहीं, अगर हम सुधरे नहीं। और बदलने का तरीक़ा नफ़रत नहीं होता, नफ़रत तो ताक़त को कम कर देती है।

आप ये फ़िल्म वगैरह देख कर आए हो, वो, वो सब जो कुछ भी आपने देखा, उसका आप पर ये प्रभाव नहीं होना चाहिए कि आप नफ़रत से भर जाओ, ठीक है! और ये बात मैं किसी नैतिक आधार पर नहीं बोल रहा हूँ, ये मैं बहुत व्यवहारिक आधार पर बोल रहा हूँ और व्यवहारिक आधार ये है कि नफ़रत ताक़त की दुश्मन होती है, नफ़रत ताक़त को कम कर देती है।

ताक़त बोध में होती है, ताक़त स्थिरता में होती है, अर्जुन के तीर के पीछे ताक़त गीता के ज्ञान की थी, नफ़रत की नहीं थी। कृष्ण चाह रहे हैं कि अर्जुन युद्ध करे, तो उससे ये थोड़ी कह रहे हैं कि घृणा कर घृणा कर दुर्योधन से घृणा कर और याद कर कि द्रौपदी का कैसे अपमान हुआ था, याद कर कि तुझे कैसे वन में भेजा गया और दुत-क्रीड़ा में हराया गया और अज्ञातवास का दु:ख याद कर। ये सब तो नहीं कह रहे थे न? तो नफ़रत आपमें बल का संचार नहीं कर देगी, ज्ञान बल का संचार करता है, गीता ज्ञान से भरी हुई है, नफ़रत से नहीं भरी हुई है।

तो ये ग़लती मत कर बैठना क्योंकि ये ग़लती करके तुम मुद्दे से ही चूक जाओगे। आप ये सोचने लग जाओगे कि आपकी समस्या का कारण कोई दूसरा व्यक्ति है, जो या तो दूसरे समुदाय से है या दूसरे देश से आया सरहद पार करके, आप उसको दोषी ठहराने लगोगे, वो होगा दोषी पर उसको दोषी ठहरा के आपको मिल क्या जाना है? आपको तो ये कहना चाहिए कि मैं ऐसा क्यों न हो जाऊँ कि इस तरह के कितने भी आक्रमणकारी आयें, मुझ पर कोई अंतर न पड़े और मेरे बाजुओं में दम इतना हो कि मैं उनको परास्त करता चलूँ। आपको तो ये पूछना है न?

एक कहावत चलती है कि "निबल बछरुआ छप्पन रोग" कि बछड़ा जो है अगर वो दुर्बल होता है निर्बल होता है तो उसे छप्पन तरह के रोग लग जाते हैं। तो जैसे छप्पन तरह के रोग लगते हैं वैसे ही छप्पन तरीक़े के सनातनियों को भी रोग लगे हैं, और सनातनियों की भी छप्पन तरीक़े की हार हुई हैं।

अभी आजकल एक नया प्रचलन चला है कि ये कह दो कि नहीं-नहीं-नहीं हम तो कभी हारे ही नहीं, ये ऐसी सी बात है कि आप कह दो कि हम तो कभी बीमार हुए ही नहीं। इससे क्या बीमारी आपकी ठीक हो जाएगी? तथ्य को झुठलाने से तथ्य कहीं चला तो नहीं जाता न, वो तो आपके भीतर मौजूद है, आप फिर हारोगे, आपको फिर कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

तो समस्या की जड़ तक जाना है और उसको इस तरह से मिटाना है कि फिर कभी अन्याय के सामने झुकने की नौबत ही न आए और जानते हैं जब आप में बल होता है न तो उसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होता है कि बल का अक्सर उपयोग ही नहीं करना पड़ता क्योंकि जो आपका दुश्मन बन के तैयार होता है उसको भी पता होता है कि आपके पास बल है।

जब आपके पास बल होता है तो आपको छेड़ता नहीं है आसानी से। और जब आपके पास बल नहीं होता तो जिसको देखो वही आपको छेड़ने पहुँच जाता है। आपके छोटे-छोटे पडोसी देश हैं देखिये वो भी आपको धौंस दिखाते हैं, आँख दिखाते हैं।

ले-देकर के ये अध्यात्म की कमी है, ये बात मेरी विचित्र लग रही होगी, कहेंगे अध्यात्म की कमी, हाँ वही है। क्योंकि पशु का बल आता है उसके शरीर से, उसकी माँसपेशियों से और मनुष्य का बल आता है ‘आत्मा से’। अध्यात्म वो है जो मन को आत्मा से जोड़ता है, जो जीवन को सच्चाई से जोड़ता है और ताक़त सिर्फ़ वहीं से आ सकती है।

जो व्यक्ति आध्यात्मिक है, यक़ीन जानिए, आप उसको हरा नहीं सकते। आप उसे मार सकते हो, आप उसके टुकड़े-टुकड़े कर सकते हो, आप उसे हरा नहीं सकते। वो हारेगा ही नहीं, उसको तो कान में गूँजने लग जाएगा न? ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ (शरीर के मारे जाने पर भी वह मारा नहीं जाता)। ये शरीर जो है इसको बचाने के लिए हार स्वीकार कर लूँ क्या? आप पूछते नहीं हो क्या हुआ था प्लाशी की लड़ाई में? अंग्रेजों की जितनी बड़ी सेना थी उससे दस या बीस गुनी सेना थी, कैसे हार गए? और जितनी भी आप लड़ाइयों के वृतांत पढ़ोगे, पिछले दो-चारसौ साल की, सब में यही कहानी है।

फ्रांसीसियों की छोटी सी सेना होती थी, उससे भारतीय राजा की सेना हार गई। कैसे हार गई? हार स्वीकार कैसे कर ली? हार स्वीकार करने के लिए कोई बचना चाहिए न? तुम बचे ही क्यों हार स्वीकार करने के लिए?

वीरता आत्मज्ञान की छाया होती है। वीरता कोई मूल्य नहीं होता कि आप किसी को बोले तुम वीर हो, वीर होने का मतलब ऐसी लड़ाई करो ये करो झुको नहीं, दबो नहीं ये वीरता नहीं होती। आत्मज्ञानी को मोह नहीं रह जाता उन चीज़ों के प्रति जिनसे जुड़कर हार मिलती है, तो अब वो अजेय हो जाता है, ये वीरता है।

कोई हारेगा तो तब न, जब उसके पास खोने के लिए कुछ हो? तभी तो उसे हरा सकते हैं। उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं, वो हारेगा कैसे? आत्मज्ञानी के पास खोने के लिए कुछ बचता नहीं, तो वो मैं कह रहा हूँ अजेय हो जाता है, उसे तुम हरा नहीं सकते, ये वीरता है। जहाँ आत्मज्ञान नहीं है वहाँ की वीरता तो बस एक प्रपंच है, झूठ है, आडम्बर है कि दिखा रहे हैं कि वीर हैं, बिना आत्मज्ञान के कौन सा वीर? ये वीरता तो फुस्स हो जानी है। समझ में आ रही है बात?

और अगर ये आत्मज्ञान वाला रास्ता पसंद न हो तो दूसरा रास्ता भी उपलब्ध है, जानवर हो जाओ, बिलकुल चंगेज खान हो जाओ। चंगेज खान ने लगभग पूरा एशिया जीत लिया था, यूरोप में घुस रहा था, कोई आत्मज्ञान नहीं लेकिन इतना जीत लिया, क्यों? क्योंकि पशु बराबर था। जहाँ जाता था वहीं औलादें पैदा करता था। रोचक तथ्य – एशिया की, पूरे एशिया की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा चंगेज खान के जीन्स लेकर चल रहा है।

चंगेज खान ने ऐसी पशुता से इतनी हज़ारों, जानें पता नहीं, लाखों महिलाओं का बलात्कार किया, बड़ी ताक़त पैदा होती है ऐसे हो जाओ। तो दो ही रास्ते हैं या तो जानवर बन जाओ, नहीं तो आत्मा हो जाओ। अभी जो हो उस रास्ते में तो दीनता और दुर्बलता और पराजय ही है और पलायन ही है, ऐसा नहीं रहना है तो मैं कह रहा हूँ दो विकल्प हैं या तो जानवर बन जाओ या अर्जुन बन जाओ।

कृष्ण तो बुला रहे हैं यही कह रहे हैं अर्जुन हो जाओ और सनातनी हो, कृष्ण जैसा उपहार विरासत में मिला है। वो उपहार उपलब्ध होते हुए भी आत्मज्ञानी न बन पाओ, वीर न बन पाओ तो किसकी ग़लती है? बात समझ में आ रही है?

प्र: जो अभी आचार्य जी आपने समझाया पूरा, तो इस सन्दर्भ में मैं कश्मीरी कम्यूनिटी (समुदाय) को देख रहा था कि अपने परिवार को कश्मीरी फैमिली में सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि रहता है, जो आपका जन्मदिन भी है, तो माह शिवरात्रि पर जब मैं आपके सानिध्य में आया, तो हमने सीखा कि हम शिव-सूत्र पढ़े, पर मैंने इतने सारे फंक्शंस (कार्यक्रम) अपने फैमिली में या बाहर भी देखे हैं।

तो शिवरात्रि में वो जो आपने बताया कि जो गरुड़ पुराण, वो वही बिलकुल शादी करवा दी शिव की। न कभी शिव सूत्र पढ़े गए, और आप ही के माध्यम से मुझे संत ललेश्वरी के बारे में पता लगा। उनकी बहुत बड़ी विरासत कश्मीरी लैंग्वेज (भाषा) में अवेलेबल (उपलब्ध) है, लेकिन न तो वो पढ़ा जाता है, शिव-सूत्र तो दूर की बात है। तो जैसे आपने बताया कि अगर आप वेदान्त के पास नहीं आए तो ये चीज़ तो फिर।

आचार्य: सारी समस्या यही है न? हमें जो ऊँचे-से-ऊँचा हमको दिया गया, हमने उसको अपने तल पर गिरा लिया। हमने शिव को वही बना दिया जिसका हम ब्याह कराते हैं महाशिव रात्रि को, कि महाशिवरात्रि माने शंकर-पार्वती का ब्याह हो रहा है। एक-एक ग्रंथ हमारा हमें बताता है कि शिव माने- विशुद्ध आत्मा। ब्रह्म को शिव कहते हैं, सत्य को शिव कहते हैं तो फिर ये क्या कर रहे हो?

तुम सत्य समझना नहीं चाहते इसीलिए सत्य को नीचे अपने तल पर गिरा ले रहे हो। तुम कह रहे हो जैसे हम अपना शादी-विवाह करते हैं और हम एक देह हैं और हम एक स्त्री की देह से विवाह कर लेते हैं उसी तरीक़े से हम अपने राम का और कृष्ण और शिव का इनका भी हम विवाह का आयोजन करेंगे और उसमें फिर उत्सव करेंगे, मौज करेंगे। ये क्या कर रहे हो?

शिव क्या हैं? ये समझना है तो ऋभु गीता पढ़ी कभी? और अवधूत गीता पढ़ी कभी। छोड़ो, इतना नहीं पढ़ सकते तो आचार्य शंकर का 'निर्वाण षटकम्' ही पढ़ लो। छहों बार वो बोलते हैं कि "शिवोsहम्, शिवोsहम्"। ये कौन से शिव की बात कर रहे हैं? उन शिव की बात कर रहे हैं जिनसे आम आदमी सम्बन्ध रखता है? नहीं। वो असली शिव की बात कर रहे हैं।

पर असली शिव तक जाना हमारे अहंकार को रुचता नहीं क्योंकि असली शिव तक जाएँ, तो हमें अपने जीवन की निरर्थकता स्वीकार करनी पड़ेगी कि झूठा जीवन जी रहे हैं हम, अगर शिव असली हैं तो फिर हम जैसे जी रहे हैं तो चीज़ ही पूरी नकली है, तो इसीलिए हम असली शिव की बात नहीं करते।

हम फिर कभी कह देंगे कि शिव एक व्यक्ति हैं, शिव एक योगी हैं, जो आसन लगाए बैठे हैं, कोई बताएगा कि मैं शिव के माँ- बाप खोज के ले आ दूँगा। किसी को बहुत रस है कि फिर शिव ने उससे क्या कहा, फिर शिव ने ये करा, फिर वो करा, फिर शिव वियोग में आ गए ये सब बातें करने लगते हैं।

तो फिर यही तो वजह है न कि ताक़त नहीं बचती आपके पास। शिव पूरी ताक़त देंगे, लेकिन शंकर भगवान बनकर नहीं, पारब्रह्म् बनकर। ये सब जो आपने किस्से-कहानियाँ खड़े करे हैं, ये तो आपकी अपनी कल्पनाएँ हैं, शिव तो कल्पना के पार के हैं न? जहाँ मन नहीं जा सकता, जहाँ वाणी नहीं जा सकती, वहाँ के हैं शिव और शिव से आपने दूरी बना ली, तो आपमें कैसे ताक़त बचेगी?

यही काम हमने राम और कृष्ण के साथ भी करा है। मैं पूछता हूँ- योगवासिष्ठ सार पढ़ा, नहीं पता होता लोगों को, पर जयश्रीराम जयश्रीराम नारा खूब लगा रहे हैं। योगवासिष्ठ सार उच्चारित भी नहीं कर पाते, जबान में गाँठ पड़ जाती है। और जयश्रीराम, अरे! तुम्हे रामत्व का अर्थ ही नहीं पता, राम माने क्या? तो तुम क्या जयश्रीराम कर रहे हो?

यही बात कृष्ण की है जन्माष्टमी मना लें, उनको एक व्यक्ति मान करके पूजा कर लें, पर गीता पढ़ी क्या? समझ में आई क्या? गीता से मतलब नहीं है, हमको तो ये मानना है कि कृष्ण एक बालक थे, फिर एक युवा व्यक्ति हुए, रासलीला वगैरह करी इत्यादि-इत्यादि, क्यों वैसा मानना है? क्योंकि वैसा मानने में हमें सुविधा रहती है।

हम कहते हैं जैसे हम हैं वैसे ही हमसे मिलते-जुलते हैं कुछ कृष्ण। कृष्ण आपसे मिलते-जुलते बिलकुल नहीं हैं, एकदम ही आपसे मिलते-जुलते नहीं हैं और हमारी पूरी कोशिश रहती है कि उनको कुछ-कुछ अपने जैसा बना लें। उससे हमारे अहंकार को सुविधा रहती है कि चलो ज़्यादा नहीं बदलना है। कृष्ण हमसे आगे हैं पर थोड़ा ही आगे हैं, तो हम बहुत ग़लत नहीं है, कृष्ण भी अगल-बगल के ही हैं हमारे। ऐसा हम सोचना चाहते हैं।

और हम ऐसा सोचना चाहते हैं इसके लिए हम राम-कृष्ण- शिव सबको विकृत कर डालते हैं, कर लीजिए विकृत, उसका परिणाम ये होगा सजा, ये मिलेगी कि आपको वो बल उपलब्ध नहीं हो पाएगा जो सिर्फ़ सच्चाई से मिल सकता है। आप सच्चाई से दूर हो जाएँगे और फिर सोचेंगे कि आपके जीवन में ताक़त रहे, रहेगी नहीं।

प्र: उल्टा ये नेरेटिव दिया जाता है कि रिचुअल्स (रीति-रिवाज) को फॉलो (अनुसरण) करने से ही हम एकजुट रहेंगे, ताक़तवर बनेंगे।

आचार्य: ऐसा हुआ क्या?

प्र: बिलकुल नहीं।

आचार्य: ऐसा हुआ क्या? रिचुअल्स (रीति-रिवाज) ताक़तवर नहीं बनातीं, सच्चाई ताक़तवर बनाती है। संस्कृति ताक़तवर नहीं बनाती, अध्यात्म ताक़तवर बनाता है। और संस्कृति कोई आवश्यक नहीं है कि अध्यात्म के पीछे-पीछे ही चल रही हो या अध्यात्म से ही सम्बन्धित हो। आदर्श संस्कृति वो होगी, जो अध्यात्म का अनुगमन करती हो माने अध्यात्म के पीछे-पीछे चलती हो।

पर अधिकांशत: जैसी संस्कृति होती है विशेषकर जैसे हमारी संस्कृति है उसका अध्यात्म से कोई ताल्लुक़ ही नहीं है। और दिक्कत ये है कि सनातनी लोग संस्कृति को ही धर्म माने बैठे हैं। वो कहते हैं कि जो तुम्हारी संस्कृति चल रही है इसी को तो धर्म बोलते है। वो हिंदू की पहचान ही यही मानते हैं कि जो फ़लानी तरह की संस्कृति का पालन करे वो हिंदू है।

नहीं, सनातनी वो नहीं है जो फ़लाने तरह के संस्कारों पर चले, फलाने तरह के रीति-रिवाजों पर चले इत्यादि- इत्यादि। नहीं, सनातनी वो है जो वेदों के केंद्र वेदान्त को समझता हो और उसे जीता हो, मात्र वो सनातनी है जिसका वेदान्त से सम्बन्ध नहीं, वो सनातनी नहीं है। वो अपनेआप को हिंदू बोले ही नहीं। होली-दिवाली मनाने से आप हिंदू थोड़े ही हो जाते हो, वैदिक धर्म है न आपका? वैदिक। और वेदों का दर्शन है वेदान्त । तो जो वेदान्त को समझता है, सिर्फ़ वो हिंदु है। बाक़ी सब तो ऐसे ही हैं, नाम के हिंदू, नकली हिंदू और जहाँ मामला बस नाम का और नकली है वहाँ ताक़त कहाँ से आ जाएगी।

फिर इसलिए हार होती है और पलायन होता है, फिर इसलिए विज्ञान में आप पीछे रह जाते हो, खेल में पीछे रह जाते हो, कला के क्षेत्र में भी पीछे रह जाते हो क्योंकि हर तरह की उत्कृष्टता तो आत्मा से ही उठती है। जब आप आत्मा से दूर हो, तो किसी भी क्षेत्र में आप उत्कृष्ट कैसे हो जाओगे? न आप फिर अच्छा साहित्य लिख पाते हैं, न अच्छी फ़िल्में बना पाते, न अच्छे आविष्कार कर पाते।

एक-सौ-चालीस करोड़ लोगों का देश होता है और आप पाते हो कि ग्लोबल यूनिवर्सिटी रैंकिंग (वैश्विक विश्वविद्यालय श्रेणी) में आप नदारद हो। एक-सौ-चालीस करोड़ लोगों का देश होता है और ओलिम्पिक्स में एक स्वर्ण पदक आ जाए तो आप ऐसे कूदते हो जैसे जमाना जीत लिया।

इतनी फ़िल्में बनती हैं बॉलीवुड में, इनमें, उनमें आपके लिए यही बहुत बड़ी बात हो जाती है कि कोई पिक्चर ऑस्कर में मनोनीत हो गई है, जीतना तो बहुत दूर की बात है। पेटेंट्स, इनवेंशन्स (अविष्कार), नोबेल प्राइज़ इसमें कहीं नाम नहीं होता आपका, ये सब कुछ क्यों है? ये सब कुछ अध्यात्म की कमी की वजह से है और कोई बात नहीं है।

ये जो आम भारतीय में इतना खोखलापन और इतनी कमज़ोरी है उसकी वजह बस यही है हम हल्के लोग हैं। हमारे पास न अष्टावक्र हैं, न कृष्ण हैं। इसीलिए फिर हम बिक भी बड़ी आसानी से जाते हैं। कोई थोड़ा पैसा दिखा दे हम बिक जाते हैं सस्ते लोग हैं। जो कृष्ण के साथ होगा वो आसानी से थोड़े ही बिक जाएगा, हम बिक जाते हैं। वोट के लिए भी हम बिक जाते हैं, दहेज के लिए भी हम बिक जाते हैं, नौकरियाँ भी यहाँ बिक रही होती हैं, सब कुछ बिकाऊ है।

सिर्फ़ आत्मा ऐसी चीज़ होती है जो अमूल्य होती है। बाक़ी तो हर चीज़ का सांसारिक मूल्य लगाया ही जा सकता है। इसलिए बिकाऊ हो जाता है इंसान। हाँ, जो आत्मस्थ है वो नहीं बिक सकता क्योंकि आत्मा अमूल्य है।

प्र: मैंने अभी तक आचार्य जी काफ़ी चीजों पर पढ़ा है कि भारत क्यों हारा किसी से या कोई और देश क्यों जीता? पर आपने जो उसका पूरा मूल बताया वो यही है कि हारने का तो, क्योंकि आप चेतना के साथ है नहीं और दूसरा जीता भी इसलिए क्योंकि उनके साथ वो पशुता, ये दोनों चीज़ें एक-साथ मिलकर।

आचार्य: और सोचो ये कितनी-कितनी शर्मनाक बात होगी न? कि जानवरों की एक फौज आकर के आपको हरा दे। और वो जीत ही इसलिए रहे हैं क्योंकि वो जानवर हैं और आपका क्या हाल है? जैसा अभी कहा- "माया मिली न राम, माया मिली न राम।" धोबी के कुत्ते हो आप न! तो जानवर हो, कि मैं भी जानवर तू भी जानवर। जानवर-जानवर से भिड़ गया, तो टक्कर बराबरी की, आप जानवर भी नहीं हो और आप अर्जुन भी नहीं है। आप पता नहीं क्या हो बीच के?

प्र: जब हम (मैं और मेरे माता-पिता) बात कर रहे थे कि जब जो भी जेनोसाइड (नर-संहार) हुआ, उसमें उस तरफ़ के लोग काफ़ी ज़्यादा बर्बर हो गए थे। कुछ ऐसे वारदात उन्होंने बताया।

आचार्य: देखो, युद्ध में तो बर्बरता चलती ही चलती है, ठीक है। प्रश्न ये है कि आप क्यों नहीं निर्मम होकर के अपने कर्तव्य का पालन कर पा रहे? मैं फिर कह रहा हूँ बात एक कश्मीर की नहीं है, बात एक समुदाय की नहीं है, कोई भी युद्ध हो आपको पता है शायद तैमूर का था चेक (जाँच) कर लेना शायद तैमूर का ही है, तो तैमूर ने लगभग एक लाख युद्धबंदी बनाए थे दिल्ली और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों से। लगभग एक लाख बंदी बनाए हैं।

अब इनको ग़ुलाम बनाया जाएगा, इनसे काम (करवाएँगे), तो उनको ले जाने लगा वापस तो उनको पता चला कि इतनों को ले नहीं जा सकते। व्यवहारिक रूप से असंभव है, महँगा पड़ेगा या समस्या है, तो उसने क्या करा? तैमूर ने एक लाख के एक लाख सारे दिल्ली में मार दिए। आप कश्मीर की बात ऐसे कर रहे हो जैसे कि कोई अनहोनी घट गई हो जैसे कि कुछ पहली मर्तबा हो गया हो।

भारत की भूमि पर तो ये हज़ारों सालों से हो ही रहा है। हम बस ऐसा कुछ स्वांग करते हैं जैसे कि सब कुछ सामान्य हो, ठीक हो बिलकुल। ये जो जेनोसाइड वर्ड (नर-संहार शब्द) है, ये भारत के लिए नया है क्या? अभी उन्नीस-सौ-इकहत्तर में पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान में अनबन हुई, तो पूर्वी पाकिस्तान जो बांग्लादेश है वहाँ मारा किसको गया? वहाँ सारे हिंदू ही तो मारे गए। और वो पिछली शताब्दी के बड़े से बड़े नर संहारों में है, हमें होलोकॉस्ट (सर्वनाश) पता है, पर आपसे कोई पूछे उन्नीस-सौ-इकहत्तर में क्या हुआ था? तो आपको पता भी नहीं होगा और उन्नीस-सौ-इकहत्तर में जो हुआ, वो बिलकुल होलोकॉस्ट की श्रेणी में रखा जा सकता है, तो ये लगातार हो ही रहा है भारत में।

देखिए, संसार बल पर चलता है, जिनके पास बल नहीं है उनके साथ कोई रियायत नहीं करने वाला, कोई नहीं आपको छूट दे देगा, तो आप ये न सोचिए कि ऐसा मुसलमानों ने कर दिया। कोई भी और व्यक्ति होगा या कोई और दल होगा या कोई भी और धर्मावलंबी होंगे वो भी यही करेंगे। आप गोआ गए थे वहाँ पर पुर्तगालियों ने क्या करा था? इनक्वेस्ट (कानूनी जाँच)? पूरे गोआ की हिंदू जनसंख्या का क्या किया गया था? आप नहीं जानते क्या?

तेरा अप्रैल आने वाला है जलियावाला बाग। भारतीयों का नरसंहार, तो जिसने चाहा है उसने करा है किसने नहीं करा है? और कितनी ये विचित्र बात है कि जिस देश के बच्चे- बच्चे को पूरी तरह निर्भय होना चाहिए था, उस देश की एक बड़ी आबादी डरपोक और दब्बू है और ये बात दुनिया जानती है और क्यों है डरपोक और दब्बू? सिर्फ़ एक बात कृष्ण से बहुत दूर हो, गीता ज्ञान के बिना वीरता असंभव है।

पुराणों से वीरता नहीं आ जाएगी, वीरता तो वेदान्त से ही आएगी, उपनिषदों से ही आएगी। पुराणों का भी असली अर्थ तभी समझ में आएगा जब पहले उपनिषदों में आपकी दीक्षा है फिर पुराणों का भी असली अर्थ आपको समझ में आएगा और कुछ पुराणों में कुछ बहुत सुंदर उपदेश और कथाएँ उल्लेखित हैं, पर वो भी आपके लिए अर्थवान तभी बनेंगी, जब पहले आपको वेदान्त का ज्ञान होगा।

प्र: अभी आचार्य जी आपने उल्लेखित किया था एक शब्द ‘नफ़रत’, जो आपने कहा कि उल्टा, निगेटिव (नकारात्मक) इस पर प्रभाव डालती है तो मतलब मैं इस डिस्कशन (चर्चा) को फॉरवर्ड (आगे) वहाँ पर लेना चाहूँगा कि अभी जो हो रहा है, खासकर जब से ये फ़िल्म आई है तो स्पेसिफिकली कश्मीरी कम्यूनिटी (विशेषतया कश्मीरी समुदाय) और अन्य समुदाय में भी एक नफ़रत का सा माहोल शुरू हो गया है। उस चीज़ से लाभ भी नहीं होगा, जैसा आपने बताया उल्टा वो बैकस्टेप (कदम वापसी) पर लेकर जाएगी।

आचार्य: नफ़रत तो ताक़त को जला देती है, नफ़रत से कोई लाभ नहीं होता और नफ़रत में कहीं न कहीं आत्म-प्रवंचना होती है। आत्म प्रवंचना माने स्वयं के प्रति झूठ, नफ़रत में आप अपनेआप को ये भुलाने की कोशिश करते हो कि आपकी कमज़ोरी कहाँ पर है? आप अपनी कमज़ोरी को भुलाना चाहते हो नफ़रत की आग भड़का करके, उससे कोई लाभ नहीं होगा।

आत्म-अवलोकन बहुत ज़रूरी है। अपनेआप को देखना बहुत जरुरी है। एक व्यक्ति की इम्यूनिटी (प्रतिरक्षा-तंत्र) अगर कमज़ोर हो जाए, तो उसपर सौ तरह के बैक्टीरिया और वायरस हमला कर देते हैं। बैक्टीरिया को दोष देखना क्या फ़ायदा? किसी एक तरह के वायरस को पकड़ लो और उसपर इल्ज़ाम लगा दो, क्या मिलेगा?

वो सब तो मौक़ा-परस्त हैं जहाँ देखते है कि कोई कमज़ोर है वहाँ चढ़ बैठते हैं ऑपर्च्यूनिज़्म (अवसरवादी)। आप कमज़ोर हुए क्यों? मैं तो ये सवाल पूछना चाहता हूँ, आप कमज़ोर हुए क्यों? जब आपको कृष्ण उपलब्ध हैं फिर आप इतने कमज़ोर हो कैसे गए? आपके सब अवतार शस्त्र लिये हुए हैं, लगभग सभी ने युद्ध लड़े हैं और सभी ने कठिन युद्ध लड़े हैं और सभी ने अपनी जान की परवाह किए बगैर युद्ध लड़े हैं, फिर आप कैसे इतने कमज़ोर हो गए?

क्योंकि हमें अवतारों से भी कोई लेना-देना नहीं। हमने अवतारों को मनोरंजन का साधन बना लिया है। अवतारों से हम शिक्षा नहीं लेते, अवतारों की कहानियाँ हमारे लिए मनोरंजन जैसी हैं। हमें अवतारों का मर्म नहीं पता। हमारे मंदिरों में अध्यात्म की शिक्षा नहीं दी जाती, वहाँ भी बस लगभग मनोरंजन का ही कार्यक्रम चलता है। वहाँ कोई पढ़ाई नहीं होती, वो शिक्षण के केंद्र नहीं है। जब तक मन को शिक्षा से, आध्यात्मिक शिक्षा से जागृत नहीं किया जाएगा, तब तक कहाँ से ताक़त आ जाएगी?

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