महिला की देह नहीं, मनुष्य की चेतना हैं आप || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरे दो प्रश्न हैं। पहला प्रश्न है कि टिपिकली (आमतौर पर) ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएँ होती हैं, वो थोड़ा प्राकृतिक रूप से केयर गिवर्स (देखभाल कर्ता),इमोशनल (भावुक), ह्वेरैज़ मेन (जबकि पुरुष) वो थोड़ा,लॉजिकल (तार्किक), गो-गेटर्स (उद्योगी), ऐम्बिशस (महत्वाकांक्षी) होते हैं।
जब परिवार में बच्चे आ जाते हैं, तो ज़्यादा रिस्पांसिबिलिटी इट फ़ॉल्स ऑन द वूमेन ऑफ़ द हाउस (ज़िम्मेदारी घर की औरत पर आ जाती है।) उनका करियर उन्हें छोड़ना पड़ता है। छह महीने के लिए हो, दो साल के लिए हो, कितने भी समय के लिए हो! पर (इट्स एक्सपेक्टेड, सोसाइटी से भी और सेल्फ इंपोज़्ड ऑलसो, दैट दे हैव टू गिव अप (समाज द्वारा ये उम्मीद की जाती है, और स्व आरोपित भी कि उन्हें त्याग करना है।)
तो बहुत सारी महिलाएँ हैं, जो ऐसा बहुत आराम से ऐसा कर लेती हैं, लेकिन प्रश्न कुछ ऐसी महिलाओं के लिए है जो कुढ़ती रहती हैं। उन्हें अपना कैरियर छोड़ देने के कारण, चाहे वो छोटे ही ड्यूरेशन (अवधि) के लिए क्यों न हों, इनसिक्योरिटी (असुरक्षा) होने लगती है। फिर क्लेश हो जाता है, मतलब बच्चा आया नहीं कि पति-पत्नी में इशूज़ (समस्याएँ) होने लग जाते हैं। और एक तो ये प्राकृतिक टेंडेंसी (वृत्ति) है। पर इसका एक और कारण भी है कि ऐसा आजकल समझा जाता है कि यू आर अ बेटर पर्सन इफ़ यू आर इंडिपेंडेंट फाइनैन्शल (यदि आप आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, तो आप बेहतर इंसान हैं)।
आजकल इम्प्लिसट्ली (परोक्ष रूप से) होम मेकर्स (गृहिणी) को थोड़ा-सा लुक डाउन (तिरस्कार करना) भी करते हैं। बहुत एक्सप्लिसिटली (स्पष्ट रूप से) नहीं करते, पर करते हैं। तो दोनों ही है। एक तरफ़ प्राकृतिक टेंडेंसी



