मारना यदि गलत है तो पैदा करना कितना सही? || आचार्य प्रशांत (2021)

प्रश्नकर्ता: जैसे कि आपने कहा, जीवन ख़ुद एक घाव है, ‘महात्मा बुद्ध’ ने भी यही कहा कि जीवन दुख है। फिर ऐसे में सन्तान उत्पत्ति को हम कैसे जस्टिफाई (न्याय-सम्मत) कर सकते हैं?
आचार्य: मैं तो नहीं करता, पता नहीं कौन करता है।
प्र: कुछ उच्च चेतनाओं ने भी सन्तान उत्पत्ति क्यों की?
आचार्य: वो जाने भाई, शायद इस पहाड़ी को पता हो (संस्था के सदस्य), इससे पूछ लो, इसे करनी है। किसी ने सन्तान क्यों पैदा की ये तो वही बताए जो पैदा करने वाला हो (हँसते हुए)। न मैंने की है न मुझे करनी है तो मैं क्या बताऊँ। मेरे पास न करने का भी कोई कारण नहीं था। कोई ख़्याल आ रहा हो, आप उस ख़्याल पर अमल न करें तो आप बता पाएँगे न कि किस कारण से तुमने नहीं पैदा करे।
अरे! मुझे कभी विचार ही नहीं आया भई। कोई पूछे कि आप वो फ़लाने अन्धे कुएँ में अब तक क्यों नहीं गिरे? तो मैं जवाब क्या दूँ क्योंकि मुझे ऐसा कोई ख़्याल नहीं आया आज तक। पड़ोस के घर की छत पर वो सुनहरी बिल्ली घूम रही है, आचार्य जी आप उसको पकड़कर के कभी अपने बेडरूम में क्यों नहीं ले आए? क्योंकि मुझे ऐसा विचार ही नहीं आया।
मेरे पास ज़िन्दगी में करने को कुछ है और मेरी ज़िन्दगी उससे पूरी तरह भरी हुई है। और मेरे पास जो करने को जो है उससे मुझे सुख मिले, दुख मिले मैं उसे जानता हूँ वो सही है। तो मेरे पास ये सब करने का न विचार है, न समय है। कि किसी को पकड़ो, उसको गर्भवती बनाओ फिर उसको जाकर अस्पताल में भर्ती कराओ। उसकी भी हालत ख़राब, तुम्हारी भी ख़राब। भय्या, मैं ये सब इसलिए नहीं बोल रहा हूँ कि आप बच्चे पैदा न करें, आप करिए शौक से। पर मुझे ये सब कार्यक्रम कभी बहुत रोचक लगा नहीं,



