
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।

अहंकार भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके उपयोग से पहचाना जाता है। आँसू, मुस्कान या कोई भी भावना अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार उन्हें लाभ, छवि या स्वार्थ के साधन में बदल देता है। यदि रोना किसी परिणाम, सहानुभूति या लाभ से जुड़ा है, तो वह प्रोग्राम्ड इमोशन है। शुद्ध भावना सहज होती है; अहंकार हर भावना को अपने हित के अनुसार मोड़ देता है।

क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।

अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।

अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से। तो ज़्यादातर जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा। अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा।

जो भीतर के अंधेरे को हटा सके उसके लिए नाम दिया गया गुरु। गुरु शब्द का इतना महत्त्व है कि सिखों ने मंदिर को नाम दिया गुरुद्वारा। गुरु नानक साहब उच्चतम कोटि के और असली गुरु हैं, पर कितने लोग हैं जो वास्तव में गुरु नानक साहब के जीवन पर और उनकी सीख पर चल रहे हैं? जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने नाम दे दिया गुरु का। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। बहुत खोजें, बहुत संदेह से भरे रहें, परीक्षण करें, यूँ ही किसी को गुरु मत बना लीजिए।

पीछे हटने का मन क्या होता है? मन क्या होता है? मैंने कभी बोला मन करता है? मैंने कहा, पीछे हटने का फ़ैसला लेना चाहते हो स्वार्थवश। चाहते हो। “मन करता है,” तो बहुत छुपा-छुपाई वाला मुहावरा है। “मन कर रहा है,” मन क्या कर रहा है, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ। “मन कर रहा है,” तो ऐसा लगता है जैसे किसी और के प्रभाव में आ गए हो, मन कोई और है। आप ही मन हो, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ।

गुरु ही देव है, माने ऊँचा देव को बाद में मानना, पहले आत्मा को ऊँचा मानो। बाहर कुछ भी ऊँचा नहीं है, जो ऊँची से ऊँची चीज़ हो सकती है, वो तुम्हारे ही भीतर मौजूद है। कितनी आत्मसम्मान की बात है ना ये। पर हम अपने ही प्रति अपमान से भरे हुए लोग हैं। तो हमें लगता है कि वहाँ पर कुछ है और हमें जाकर लोट जाना है, नेताजी हो, कोई हो, लौट जाना है। हीन भावना, अपना ही अपमान।

बेबाक और बिंदास, बेधड़क और बेख़ौफ़ — ये रिश्ता है शिष्य और गुरु का। हमारा मन अर्जुन-सा नहीं होता कि, "कुछ न हो तुम्हारे पास, अपनी सारी सेना भी दुर्योधन को दे दी, फिर भी हमें तो नेह तुमसे लगा है।" सच्चा शिष्य परम-स्वार्थी होता है; वह छोटी-मोटी चीज़ गुरु से माँगता ही नहीं है, वह कहता है, "तुम ही आओ, पूरे आओ।"

गुरु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं होता; तुम जो ऊँचे से ऊँचे हो सकते हो, तुम्हारी उस अप्राप्त संभावना का नाम है — गुरु। गुरु के साथ रहने का अर्थ होता है — अपनी उच्चतम संभावना के साथ रहना। उसके साथ होने का मतलब होता है उसको समर्पित हो जाना। वो पीछे से आदेश देता रहता है और तुम काम कर रहे होते हो। गुरु का विचार नहीं किया जाता, जब गुरु साथ होता है तो समस्त विचारों में गुरुता आ जाती है। गुरु का विचार नहीं करो, गुरु द्वारा प्रेरित जीवन जियो।

कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।

तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।

जो भीतर के अंधेरे को हटा सके, उसके लिए नाम दिया गया — गुरु। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। कुछ शब्दों का हल्का प्रयोग नहीं करना चाहिए; 'गुरु' उन शब्दों में सर्वोपरी है। जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने गुरु का नाम दे दिया है — ये मत करिए। बहुत खोजें, जाँचें, परखें, परीक्षण करें, और जिज्ञासा की भावना को बहुत जल्दी अंधी आस्था में न बदलने दें। ‘गुरु’ शब्द बड़े वजन का है, हर किसी के साथ इस शब्द को मत जोड़ दीजिए।

गुरु वो जो तुम्हारी भलाई में सहायक हो सके। जिस गुरु के साथ रह करके मन के भ्रम न कट रहे हों, उसको तुरंत त्यागो। किसी 'व्यक्ति' के प्रति निष्ठा मत रखने लग जाना। लक्ष्य तो सच्चाई है; व्यक्ति को थोड़े ही पूजना है। ‘व्यक्ति’ गुरु नहीं होता; गुरु संदेशवाहक है। गुरु ऊँचे-से-ऊँचा साधन भी हो सकता है और गुरु स्वयं बहुत बड़ी ग़ुलामी भी बन सकता है। अधिकांशतः गुरु के नाम पर ग़ुलामी ही मिलती है। लगातार जाँचते चलो — बंधन कट रहे हैं कि नहीं; अंधेरा हट रहा है कि नहीं।

शरीरी गुरु क्यों चाहिए? इसलिए नहीं कि परमात्मा पक्षपात करता है, इसलिए क्योंकि तुम पक्षपात करते हो। ऊपरवाले की ज़िद नहीं है कि गुरु कोई देही आदमी ही हो सकता है। ये तुम्हारी ज़िद है। तुम्हें शरीर से बड़ा मोह है, बड़ी आसक्ति है। तुम्हें शरीर से बड़ी आसक्ति है, तो फिर तुम सीखते भी किसी ऐसे से ही हो जो सशरीर हो। नहीं तो तुम सीख नहीं पाओगे।

सिख धर्म का मतलब ही यही है — जो कुछ भी उचित लगता है, फ़र्क नहीं पड़ता किसने कहा और कब कहा — मैं उसको सुनूँगा और उसके सामने सिर झुकाऊँगा। सिख होने का मतलब है कि मैं लगातार सीख रहा हूँ, मैं शिष्य हूँ। दुनिया में कोई धर्म नहीं कहता कि शिष्य बनो, हर धर्म अनुयायी चाहता है। सिख धर्म शिष्यत्व चाहता है। बहुत-बहुत अनूठा है — न तो अवतार है, न पैग़म्बर, सिर्फ़ गुरु ग्रन्थ साहिब है जो शाश्वत गुरु है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के साथ ही घरेलू प्राणी भी है। घर तो रहेगा ही — प्रश्न यह है कि उस घर के साथ आप संबंध क्या बना रहे हो? आपके इर्द-गिर्द जो कुछ भी है, उससे सही रिश्ता बनाना सीखो। अध्यात्म का मतलब यह नहीं है कि घर-बार छोड़ देना है। अध्यात्म में कर्म के तौर पर कुछ भी अनिवार्य नहीं, कुछ भी वर्जित नहीं। सब विकल्प खुले हैं — छोड़ने का भी विकल्प है, और रिश्ते को सुधार देने का भी विकल्प है। आपको अपनी चेतना का प्रयोग करके देखना है कि इस क्षण पर क्या करना उचित है।

यदि घर में कोई बोध की राह पर चल पड़ा है, तो यह पूरे परिवार के लिए शुभ संकेत है। अध्यात्म परिवार को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे सुदृढ़ और समृद्ध बनाता है। यह हर रिश्ते को नई रोशनी में उजागर करता है। जो स्वयं को जानने की दिशा में बढ़ता है, वह पहली बार जीवन में वास्तविक रूप से उपयोगी बनता है। सही संगति में प्रवेश करने से वर्तमान की सभी संगतियाँ भी साफ़ हो जाती हैं। इसलिए साहसपूर्वक अपने बंधनों को जानने की राह चलो, और उनसे मुक्त होते जाओ।

अपने रिश्तों के आधार को समझो और रिश्ता सिर्फ़ माँ-बाप या दोस्तों से नहीं होता। रिश्तों का अर्थ है पूरी ज़िन्दगी, क्योंकि हम रिश्तों में ही जीते हैं। यही कारण है कि जब ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं, तो रिश्ते कमजोर पड़ जाते हैं, क्योंकि ये ज़रूरत और निर्भरता के रिश्ते होते हैं। निर्भरता के रिश्ते कभी स्वस्थ नहीं हो सकते।

टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।

साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।

गुरु का परिचय उसका प्रभाव है; गुरु कोई पदवी नहीं है। गुरु वो हैं, जिनके होने से शांति, समझ और रोशनी आती हो। बुद्धि का भरपूर प्रयोग करो। किसी भी बात को बस आँख मूँदकर, हाथ जोड़कर स्वीकार मत कर लो कि, "गुरु जी कह रहे हैं तो ठीक ही होगी।" खासतौर पर उन जगहों से बचना जहाँ विज्ञान-विरुद्ध और अंधविश्वास से भरी हुई बातें की जाती हों। जहाँ डर हटने लगे, जहाँ मन से ईर्ष्या, संदेह, तमाम तरह की बेचैनियाँ हटने लगें, समझ लेना वह जगह तुम्हारे लिए ठीक है।

प्रश्न: आचार्य जी, आप आई.आई.टी., आई.आई.एम. के बाद अध्यात्म की शरण में क्यों गये?
आचार्य प्रशांत जी: हर आदमी की अपनी एक यात्रा होती है और उस यात्रा में दस कारण होते हैं जो उसके पीछे लगे होते हैं।
तुम्हारी अपनी एक यात्रा है जो तुम्हें तुम्हारे कॉलेज से ले…

जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न सच्ची ख़ुशी को लेकर है। जैसे मैंने कोई कामना करी, और अगर वो पूरी नहीं होती है, तो उससे जो फ़्रस्ट्रेशन, जो दिमाग में मम्बलिंग या ओवरथिंकिंग (अधिक सोचना) होती है, बाद में इसको लेकर एक वॉइड (खालीपन या रिक्तता) बन जाता है…

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन पर लगी चोट से कैसे उबरें?
आचार्य प्रशांत: दूसरे काम करो। तुम्हें हर्ट (दर्द) पसंद है इसीलिए उसको पकड़ के बैठे हो। वो बंदर याद है न? एक मर्तबान था जिसका मुँह बड़ा सँकरा था, बंदरिया भी हो सकती है (श्रोतागण हँसते हैं।), चलो बंदर, चलो…

जिन लोगों की तुम बात कर रहे हो वो वही कर रहे हैं जो अस्तित्व का नियम है। वो देह हैं, वो शरीर हैं। वो उसी की बात करते हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए होती है क्योंकि तुम भी बहुत हद तक उनके जैसी हो। तुम्हारी तकलीफ़ की वजह ये नहीं है कि उन्होंने तुमसे कुछ व्यर्थ की बातें कह दी हैं या उनकी कुछ व्यर्थ की धारणाएँ हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास भी ये धारणा है कि वो तुम्हारे हैं और तुम्हारे और उनके रिश्ते में कुछ सच्चाई है, कुछ पवित्रता है, कुछ ताक़त है।

पहली कुसंगति आंतरिक होती है। मन ऐसा कुसंगी है जिसे बाहर कुसंग नहीं खोजना पड़ता। मन को अगर मन का साथ मिल जाए तो इससे बड़ा कुसंग नहीं। बाहर का कुसंग हटाना आसान है, पर भीतर वाला कुसंग, जहाँ आदमी अपने ही विचारों में फँसा है, "मैं हूँ और मेरे विचार हैं" - इससे बड़ी कुसंगति क्या हो सकती है? आंतरिक कुसंगति न हो तो बाहर का कुसंग कुछ नहीं कर सकता।

जैसे शरीर को पोषण देते हैं, वैसे ही मन को पोषण दीजिए। फ़िल्म देखने से मन को पोषण नहीं मिल जाना है, मैच देखने से नहीं मिल जाना है। पार्टी करने से, ख़रीददारी करने से भी नहीं मिल जाना है। जहाँ मिलना है, वहाँ जाइए। वो मैंने करा है, इसीलिए आपसे बड़े अधिकार और बड़े विश्वास के साथ कहता हूँ कि आप भी करिए।

प्रश्नकर्ता: लगभग सभी परिवारों में समस्याएँ होती ही हैं। अनबन, खटपट होती ही है। फिर भी इनमें लोग साथ रहते ही हैं। इसका क्या समाधान है?
आचार्य प्रशांत: साथ रहने का अर्थ होता है संगति देना; एक-दूसरे को। संगति का अर्थ होता है कि दूसरे के ऊपर आपका प्रभाव कैसा…

हम सोचते हैं वर्तमान में होने का अर्थ है कि जो काम कर रहे हो उसमें हो जाओ। ये हो ही नहीं पाएगा। हम सोचते हैं वर्तमान में होने का अर्थ है कि इस वक़्त जो हो रहा है उसको अपना पूरा मन दे दो। ये हो ही नहीं पाएगा जब तक तुम अपनी उस जगह को उपलब्ध नहीं हो जाते जो वास्तव में है, जो वास्तव में प्रेज़ेंट (वर्तमान) है, जिसकी सत्ता सच्ची से सच्ची है, जो बदल नहीं सकती, जिसका कोई आना-जाना नहीं है। जब तुम वहाँ बैठे होते हो तब दुनिया भी तुम्हारी होती है और चूँकि हम वहाँ नहीं बैठे होते इसीलिए हम दुनिया में भी फिसड्डी रह जाते है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं…

प्रश्नकर्ता: कोई काम करते हैं या कोई बुक पढ़ते हैं, तो मन उस समय नहीं होता, वो भविष्य या भूतकाल में चला जाता है। ज़्यादातर प्रेज़ेन्ट (वर्तमान) में नहीं रहता है। तो क्या करें कि वो अधिकांशतः वर्तमान में ही रहे?
आचार्य प्रशांत: क्या करोगे तुम वर्तमान में रहकर?
प्र:…

प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत पहले से देख रहा हूँ। इमैजिनेशन (कल्पनाएँ करने) की आदत है। अब यहाँ तीन महीने से हूँ तो इसे और गहराई से देखने के लिए मिला। बहुत ज़्यादा गहराई तक है यह।
मैं सही-सही बताऊँ तो कोई मुझसे बात करता है तो मुझे उसकी आधी बात…

मन इतना अशांत क्यों रहता है?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आज मेरा प्रश्न फिर से मुझसे ही जुड़ा हुआ है, कि मेरा मन इतना अशांत क्यों रहता है। एकसाथ मेरे दिमाग में बहुत चीज़ें चलती रहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है, मैं ध्यान केंद्रित…

आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…

प्रश्नकर्ता: सर, सुबह जब मैं आया था और बैठा था गंगा किनारे। तो जो लोग घूमने आये थे, अभी भी जैसे हैं, तो लोग चिल्लाते क्यों हैं? जैसे मैंने भी अपने पर ध्यान दिया है, मैं भी बहुत चिल्लाता हूँ। तो ये चिल्लाहट क्यों है? कोई अभिव्यक्ति होती है?
आचार्य…

प्रश्नकर्ता: किसी भी मन को सत्य की तरफ़ दिशा कैसे मिलेगी अगर उसकी ज़िन्दगी में शरीर रुपी गुरु ही नहीं हो? गुरु के बिना क्या सत्य से साक्षात्कार होने की सम्भावना है भी?
आचार्य प्रशांत: ऐसा किसी के साथ भी नहीं होता कि वो एक पर्सन (व्यक्ति) से ही खाली…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

आचार्य प्रशांत: कुछ पाने का विचार होगा, कुछ खोने का विचार होगा, और तो कोई विचार होता नहीं। विचार बड़ी नीरस चीज़ होती है, उबाऊ। न जाने तुम कैसे इस उबाऊ चीज़ के साथ इतना समय गुज़ार लेते हो।
विचार ने कभी कुछ और कहा है तुमसे? एक ही बात…

प्रश्नकर्ता: इंटरनेट से एक बहुत लम्बे समय तक मेरा कोई विशेष लगाव नहीं था। यूट्यूब भी मैंने तभी देखना शुरू किया जब आपको सुनने की आदत लगी है आपके कारण ही मैंने इंटरनेट पर ज़्यादा समय बिताना शुरू किया, पर अब ये हो गया है कि इंटरनेट पर मैं आता…

प्रश्नकर्ता नमस्ते सर, आज की बातचीत थोड़ी कॉन्ट्रोवर्शियल (विवादित) होने वाली है
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं होती रहती है कॉन्ट्रोवर्शी।
प्र: मैं आपसे गुरुओं के ऊपर बात करना चाहता हूँ और इस पूरी बात की शुरुआत आज से दस या बारह साल पहले से होती है।
आचार्य: क्या हुआ…

आचार्य प्रशांत: कर्मसंन्यास और कर्मयोग क्या हैं? दोनों में अन्तर क्या है? आमतौर पर हम जिसे कर्म कहते हैं; वो कैसे होता है? वो ऐसे होता है कि जैविक रूप से और सामाजिक रूप से मन संस्कारित रहता है। फ़िज़िकल, सोशल दोनों तरह के संस्कार। तो मन में पहले…