न आत्मा शरीर छोड़ती है, न शरीर में प्रवेश करती है (अंधविश्वास समाप्त हो) || आचार्य प्रशांत (2022)

प्रश्नकर्ता: जो श्रीमद्भगवद्गीता की दो मूलभूत बातें हैं, उनको जोड़कर सवाल है। श्रीमद्भगवद्गीता में ये कहा गया है कि आत्मा एक शरीर बदलकर दूसरा शरीर धारण करती है। पिछले दो-सौ वर्ष में जो मानव जनसंख्या है, वो क़रीब एक बिलियन से बढ़कर अब क़रीब आठ बिलियन होने को है। तो अगर मानव शरीर बढ़ रहे हैं, तो नये शरीर में आत्मा भी नयी आनी चाहिए और श्रीमद्भगवद्गीता में ये भी कहा है कि आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, तो नये शरीर में आत्मा कहाँ से आ रही है?
आचार्य प्रशांत: यहाँ तक ठीक है, आत्मा कभी जन्म नहीं लेती, कभी मरती नहीं, पर ये श्रीमद्भगवद्गीता में कहीं पर भी नहीं लिखा है कि आत्मा एक शरीर छोड़ कर दूसरा शरीर धारण करती है। जिस श्लोक का बार-बार हवाला दिया जाता है उसमें ‘आत्मा’ शब्द कहीं आता ही नहीं है, ‘देही’ कहा है ‘देही‘। वो जीवात्मा है, आत्मा नहीं।
~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक २२)
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि, अन्यानि संयाति नवानि देही।।२.२२।।
मनुष्य जैसे पुराने कपड़ों को छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरों को छोड़कर दूसरे नये शरीरों में चला जाता है।
हिंदी अनुवाद - स्वामी रामसुख दास जी - श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक २२)






