अगर कोई कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर परेशान करे || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: अपूर्वा हैं, अगर कोई हमारी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाए, हमें बार-बार परेशान करे तो हम उस समय पर न्यूट्रल (तटस्थ) कैसे बने रहें?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो-तीन तरह की परेशानियाँ होती हैं जो लोगों को लगती हैं। मान लो, तुम ट्रेन में जा रही हो, भारतीय रेल। अब एक परेशानी यही है कि प्लेटफार्म गन्दा है, स्टेशन पर सफ़ाई नहीं है, रेल देर से आ रही है किस प्लेटफार्म पर आ रही है उसका भी ठीक से कुछ बताया नहीं जा रहा, समुचित उद्घोषणा नहीं हो रही। इसको क्या परेशानी मानना? पता है न कि एक मंज़िल पर जाना है तो यही विकल्प है इसके खिलाफ़ भीतर-ही-भीतर शिकायत करने से और मन कसैला करने से क्या होगा?
ऐसा ही है। तुम कहोगे लेकिन हमेशा तो ऐसा नहीं होता। कई बार तो ट्रेन सही समय पर आ भी जाती है, कई बार प्लेटफार्म साफ़ भी होता है। हाँ, कई बार होता है, कई बार नहीं होता है, ये तो संयोग की बात है कि तुम्हें ऐसा कुछ मिल गया। तुम्हें मंज़िल देखनी है या प्लेटफार्म देखना है या प्लेटफार्म ही मंज़िल है तुम्हारी? उस प्लेटफार्म पर तुम थोड़ी देर के लिए हो, वहाँ पर मन इतना मत खराब कर लो कि जो समस्या ज़रा सी देर की थी, थोड़ी देर में हट ही जानी थी उस समस्या को तुम लम्बा बना लो और आने वाले जो पल हैं और चुनौतियाँ हैं उनसे जूझने की तुममें ऊर्जा ही न बचे क्योंकि सारी ऊर्जा तो तुमने प्लेटफार्म से उलझने में लगा दी।
जो अगला तुम्हारे सामने व्यवधान आ सकता है वो ये है कि तुम कहो कि 'मैं गई हूँ, मैं अपनी सीट पर जाकर लेट गई हूँ पर ये ट्रेन है ये न जाने इसमें कैसे कोच लगे हुए हैं, डब्बे, कि वो झटके मारते हैं और मैं सोना चाहती हूँ तो इसमें बड़ा कम्पन होता है, रॉकिंग मोशन, हिलता-डुलता है, बर्थ काँपती है।‘ भाई ! वो ऐसा ही होना है। उसके खिलाफ़ शिकायत करके कुछ नहीं मिलना है।
प्लेटफार्म गन्दा था ये तो फिर भी संयोग की बात थी, ट्रेन देर से आई ये भी संयोग की बात थी लेकिन तुम कहो कि ये जो बर्थ है ये मुझे बहुत सताती है क्योंकि ये मेरे घर के पलंग की तरह सुस्थिर नहीं रहती, ये हिलती है, डुलती है, कॅंपती है तो ये तो संयोग की बात भी नहीं है, ट्रेन की बर्थ ऐसी ही होती है उसको स्वीकार करो। उसके खिलाफ़ खड़े होने से कोई लाभ नहीं है।



