आचार्य प्रशांत: खिंचाव है, आकर्षण है, किधर को जाने की इच्छा, बदल जाने का मन; कुछ अनजाना, कुछ नया पा लेने की अभीप्सा। कोई ऐसा है जिसको ये न होता हो? कोई ऐसा है जो किधर को खिंचता न हो? कोई है जिसको कुछ-न-कुछ आकर्षित न करता हो? सब हैं न ऐसे? उसी को प्रेम कहते हैं। लेकिन खिंचाव दो तरह का हो सकता है — एक तो वो जो आपको वहाँ तक ले जाए जो आप सचमुच चाहते हैं, दूसरा वो जो वादा तो ये करे कि असली मंज़िल तक ले जाएगा, ले कहीं और जाए; खिंचाव दोनों ही हैं।
पर जैसे दुनिया की हर चीज़ के साथ होता है, जैसा हमारी हर साँस के साथ होता है, हमारी हर गतिविधि के साथ होता है, मामला असली भी हो सकता है और नक़ली भी। तो खिंचाव तो खिंचाव है, पर ये देखना पड़ता है कि किधर को जा रहा है, अन्ततः आपको शान्ति चाहिए। अन्ततः आपको कुछ ऐसा चाहिए, जो आपको बिखेरकर रख दे, कुछ ऐसा चाहिए, जो आपको भस्मीभूत कर दे, आह्लाद से ऐसा पूरित कर दे कि आप नाच उठो, ऐसा मतवाला कर दे आपको कि आपके मुँह से आवाज़ न निकले। हम सबको उसकी तलाश है। उससे कम में हम कभी राज़ी होंगे नहीं। इसका प्रमाण ये है कि छोटा-मोटा जब मिलता है, तो वहीं पर रुक जाते हो कभी? लगातार मान लो कि आश बनी रहती है, कुछ और भी तो मिले। हममें से कोई ऐसा है, जिसको पूरा पड़ गया हो? सबके मन में क्या आशा रहती है? अभी और चाहिए। यही प्रेम है। दिक़्क़त ये होती है कि हम ये नहीं जान पाते कि हमें और?
श्रोता: क्या चाहिए।
आचार्य: क्या चाहिए। हमें लगता है और फर्नीचर चाहिए, हमें लगता है और कटलेरी चाहिए, हमें लगता है और एयर कंडीशनर चाहिए, दो-चार और मकान-बंगला वगैरह चाहिए या थोड़ी इज़्ज़त या ओहदा चाहिए। बात आ रही है समझ में? और क्या चाहिए? और?
श्रोता: क्या चाहिए।







