ज़िंदगी की ठोकरें खा कर सीखो, या फिर ऐसे || आचार्य प्रशांत, गुरुपूर्णिमा पर (2020)

प्रश्नकर्ता १: आचार्य जी, प्रणाम। आज गुरु पूर्णिमा का पावन अवसर है। आपसे आज तक मिला तो नहीं हूंँ, लेकिन आपके वीडियोस व्याख्यान ही मेरे लिए गुरु समान हैं। सबसे पहले धन्यवाद!
श्री गुरुगीता में आया है —
"शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन। लब्ध्वा कुलगुरुं सम्यग्गुरुमेव समाश्रयेत्।।"
यदि शिवजी नाराज हो जाएँ तो गुरुदेव बचाने वाले हैं, किंतु यदि गुरुदेव नाराज हो जाएँ तो बचाने वाला कोई नहीं। अतः गुरुदेव को सम प्राप्त करके सदा उनकी शरण में रहना चाहिए।
~श्री गुरुगीता, श्लोक ४४
प्र२: देवों में महादेव हैं शिव, स्वयं ब्रह्म रूप हैं शिव, सृष्टि के संहारक हैं शिव, पर गुरुगीता तो गुरु को शिव से भी आगे का बता रही है। ऐसा क्यों है आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: देखिए! जिन्हें हम शिव कहते हैं, जिसे हम ब्रह्म या सत्य कहते हैं, वो निष्काम है। बिल्कुल निष्पक्ष है। जब आप कहते हैं कि, 'वो निर्गुण या निराकार है', तो बात शायद पूरी स्पष्ट नहीं होती। हमारे संदर्भ में सत्य बिल्कुल निष्पक्ष है। उसको कहना चाहिए निरपेक्ष, निष्काम। उसे कुछ नहीं चाहिए। तो फिर जो कुछ भी हमको-आपको घटित होता प्रतीत होता है, उससे भी उसका बिल्कुल कोई लेना-देना नहीं।






