प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने कहा था कि ग़लती ‘मैं’ भाव से आती है। तो इसके साथ ही अक्सर हम अपनेआप को ये तर्क देते हैं कि मुझसे ये ग़लती हो गयी, ये मैं नहीं थी। तो ये ‘मैं’ भाव क्या है? और ग़लती किसको कहा जा रहा है तब?
आचार्य प्रशांत: मज़े मारने के बाद सज़ा से बचने का उपाय है ये सबकुछ, बस। मैं वो हूँ जो उपस्थित रहता है जब मज़े हो रहे होते हैं। ‘मैं’ कौन है न? ‘मैं’ वो है जो बिलकुल मौजूद है जब भोग का क्षण है, जब मज़े मारे जा रहे हैं तो वो बाकायदा मौजूद है। और ‘मैं’ वो है जो इंसाफ़ के क्षण में एकदम नदारद है, लापता; उसको ‘मैं’ बोलते हैं। उसका एक ही काम है—मज़े मारना और क़ीमत चुकाने से बचना। क़ीमत चुकाने को ही इंसाफ़ कहते है न। तो ये ‘मैं’ की एक वैकल्पिक परिभाषा हो गई।
कभी कोई बोलता है—‘मैंने ग़लती से मज़े मार लिए।’ ऐसा होता है क्या? या कभी ऐसा होता है कि बोलते हो, ‘अरे! मज़े मारने का क्षण था, ग़लती से मिस (चूक) हो गया।’ होता है क्या? पर ख़रीदारी करने के बाद पैसे देना ग़लती से हम ज़रूर भूल जाते हैं, ऐसा ही होता है न। कभी ऐसा होता है—खाना मँगा लिया और ग़लती से खाना खाना भूल गए। होता है क्या? बैठे रहे, बैठे रहे, बैठे रहे; फिर उठकर चल दिए तो पीछे से वेटर आया, बोला, ‘सर आपका खाना।’ ‘अरे! मैं भूल गया, भूल गया; ग़लती से खाना खाना भूल गया। ऐसा होता है?
‘मैं’ ऐसा है—भोग के लिए लालायित, भोगने के क्षण में सदा उपस्थित। और मूल्य चुकाने के क्षण में—मैं तो था ही नहीं, वो तो बस संयोग हो गया, दुर्घटना हो गई। मैंने नहीं किया, हो गया। मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ, मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ, मैंने नहीं किया।(बेचारगी का अभिनय करते हुए)
उस आदमी के जीवन में क्रांति हो गई जिसके जीवन से ‘ग़लती’ शब्द मिट गया। जो अपने व्याकरण से इस शब्द को ही मिटा दे, कहे, ‘मैं इस्तेमाल ही नहीं करूँगा इसका। और मैं बहुत नहीं जानता, न गीता समझ पा रहा, न उपनिषद् समझ पा रहा हूँ; पर एक काम करता हूँ—अब कभी नहीं कहूँगा कि मैंने कुछ ग़लती से कर दिया। मैंने करा और अगर मैंने करा, तो मेरे भीतर की ही कोई राक्षसी वृत्ति है जिसने करवाया। इंसान हूँ, वयस्क हूँ, मैं ज़िम्मेदारी लेता हूँ—मैंने करा, मुँह नहीं चुराऊँगा, पीठ नहीं दिखाऊँगा। भले ही मुझे ही भीतर से तर्क उठ रहा हो कि ये तो हो गया, संयोग से हो गया, ग़लती हो गयी, वाकई ग़लती हो गयी,




