
आध्यात्मिकता दुनिया से भागना नहीं, बल्कि उसे गहराई से समझना है। परिवार, बच्चों और समाज से संवाद के लिए उनके रुचि-क्षेत्रों को जानना आवश्यक है। किसी विचार को थोपने के बजाय समझ और निष्पक्षता से बात करनी चाहिए। आत्मज्ञान जीवन के हर क्षेत्र को दिशा देता है। सीखने की प्रक्रिया में जिज्ञासा, अध्ययन और खुला संवाद व्यक्ति को अधिक परिपक्व, प्रभावी और सार्थक बनाते हैं।




बेटों को अगर वही सब कुछ करना है जो पूरी दुनिया करती है, तो आप वीकेंड पर गोवा में ये गीता क्यों पढ़ रही हैं? पूरी दुनिया ये तो नहीं करती। या मीठा-मीठा ख़ुद खाना है और इधर-उधर की गड़बड़ बच्चों को खिलाना है? पूरी दुनिया जो कर रही है, अगर वही करना है तो आप यहाँ क्यों मौजूद हैं? आपकी छोड़िए, मैं यहाँ क्यों मौजूद हूँ? मैं भी वही करता हूँ जो पूरी दुनिया कर रही है। मुझे यहाँ क्या करना है?



कोई भी कर्म तब सही है जब सत्य से उठता हो ज्ञानी के मामले में, या सत्य की ओर ले जाता हो अज्ञानी के मामले में। प्रथा भी अच्छी हो सकती है, अगर वो सत्य की ओर ले जाती हो, समझदारी की ओर, ज्ञान की ओर ले जाती हो तो वो प्रथा अच्छी है। पर जिस प्रथा के साथ कोई समझ जुड़ी ही नहीं है, उस प्रथा में क्या रखा है?


क्योंकि कोई पूछने वाला नहीं होता, तो जो चल रहा होता है, वो चलता रहता है। अंधेरा क्यों है? अंधेरा तो होगा ही। प्रकाश नहीं होगा तो अंधेरा होगा। किसी को कभी आपत्ति हुई नहीं अंधेरे से — इसलिए अंधेरा है। आपत्ति हो जाए तो पल भर में हट जाएगा।







प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मैं भावना हूँ। और अक्टूबर दो-हज़ार-तेईस (2023) से गीता सत्र के साथ जुड़ी हुई हूँ। और मेरा अट्ठारह साल का बेटा है और एमबीबीएस फ़र्स्ट ईयर में है। जब वो हॉस्टल में गया, हॉस्टल में जाने से पहले दो-तीन साल कोविड के चक्कर में वो बिलकुल


प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि मम्मी हमसे कहती हैं कि तुम्हारे कारण हम अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाये। तो सर, उनकी इच्छा तो यही थी न कि हम भी कॉलेज में जाएँ। तो सर, वो ऐसा क्यों कहती हैं कि हम तुम्हारे कारण अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाये?

प्रश्नकर्ता: बचपन में मुझे मम्मी-पापा और स्कूल ने सिखाया कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और साथ ही मुझपर दबाव बनाया कुछ गिने-चुने काम ही करना। मैंने कहा — मुझे गायक बनना है। वो बोले — नहीं, तुम्हें एमबीए करना है। आज मैं एमबीए हूँ और बहुत दुख

आचार्य प्रशांत: हम क्यों चाहते हैं बच्चा? और ये ख़तरनाक है सवाल पूछना क्योंकि हमें नहीं पता हम क्यों चाहते हैं। हम सिर्फ़ इसलिए चाहते हैं क्योंकि सबके पास बच्चा है। जैसे कि ये (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) बोले कि उनके पास भी गुब्बारा है, उसके पास

प्रश्नकर्ता: जैसे कि आपने कहा, जीवन ख़ुद एक घाव है, ‘महात्मा बुद्ध’ ने भी यही कहा कि जीवन दुख है। फिर ऐसे में सन्तान उत्पत्ति को हम कैसे जस्टिफाई (न्याय-सम्मत) कर सकते हैं?
आचार्य: मैं तो नहीं करता, पता नहीं कौन करता है।

आचार्य प्रशांत: तुम छह-छह, आठ-आठ साल की लड़की को ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और ‘मैं तो तेरा बटर चिकन हूँ’ और इस तरीक़ों के गानों पर नचा रही हो। तुम उन बच्चियों में कौन सी भावना का संचार कर रही हो?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरे दो प्रश्न हैं। पहला प्रश्न है कि टिपिकली (आमतौर पर) ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएँ होती हैं, वो थोड़ा प्राकृतिक रूप से केयर गिवर्स (देखभाल कर्ता),इमोशनल (भावुक), ह्वेरैज़ मेन (जबकि पुरुष) वो थोड़ा,लॉजिकल (तार्किक), गो-गेटर्स (उद्योगी), ऐम्बिशस (महत्वाकांक्षी) होते हैं।

आचार्य प्रशांत: हम बहुत हर्षित होते हैं अगर हमारा बच्चा टीवी पर पहुँच जाए। कि देखो इसमें कितनी प्रतिभा है, यह गाना गा रहा है! और गाना क्या गा रहा है? आठ साल का है इनका सोनू और पहुँच गया टीवी पर। कौनसा गाना गा रहा है? वो टीवी पर…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे फादर का स्कूल है और उसमें मैंने अभी रिसेंटली लाइफ एजुकेशन नाम की एक क्लास स्टार्ट की है, जिसमें हम बच्चों को

आचार्य प्रशांत: एक मुहावरा चल गया है कि अरे किताबों में क्या है वहाँ तो खोखले और थोथे शब्द हैं, असली ज्ञान तो भीतर है, बच्चा ध्यान करो। गीता उठाकर के कचरे में डाल दो, बच्चा ध्यान करो और असली ज्ञान भीतर से निकलेगा। मेरे पास शब्द नहीं हैं इस…

प्रश्नकर्ता: अगर एक गाय के सामने माँस रख दिया जाए तो वह तो नहीं खाएगी पर अगर एक शेर या इंसान के सामने रख दिया जाए तो वह खा लेते हैं, इसका मतलब यह है कि माँस खाना इंसान की कुदरती फितरत है।


आचार्य प्रशांत: मेरे घर में लाइब्रेरी



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे हमें पता है कि दुख है जीवन में, जिंदगी हमारी दुख में ही बीतती है। तो फिर आचार्य जी, लोग बच्चे पैदाकर के उन्हें ऐसी जिंदगी जीने के लिए क्यों विवश करते हैं?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरी छः वर्ष की बेटी है। जो विद्यमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था है, उससे तो उसको भाषा की, विज्ञान की, गणित की, संसार की शिक्षा मिल ही जाएगी। ये भी समझ में आता है कि उस औपचारिक, सांसारिक शिक्षा के समानांतर, साथ-साथ,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को कोटि-कोटि प्रणाम। पिछले दो सालों से आपको सुन रहा हूँ। मेरा सवाल कुछ इस प्रकार से था कि अभी हम लोग देख रहे हैं कि तकनीकी बहुत बढ़ गई है। हम बहुत चरम पर हैं अभी मनुष्यता, और आध्यात्मिक रूप से भी हमारे इर्द-गिर्द बहुत प्रपंच

आचार्य प्रशांत: देखा हुआ है मैंने, यहाँ तक होता है कि जवान लोग हैं, किसी परीक्षा वगैरह की तैयारी कर रहे हैं—प्रतियोगी परीक्षा, नौकरी वगैरह के लिए—और उन्हीं दिनों घर में बहन की शादी का मुहूर्त निकाल दिया गया। माँ-बाप भी ज़बरदस्त होते हैं। लड़के का

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, दो हज़ार एक में मेरा विवाह हुआ था, उसके बाद थोड़ी सी पज़ेसिवनेस थी, बहुत ज़्यादा पज़ेसिवनेस



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न बच्चों के परवरिश के संदर्भ में है। जैसे हमेशा से कहा जाता है कि एक बच्चे की परवरिश में उसके माता और पिता दोनों की ही बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। और अगर दोनों में से कोई एक

प्रश्नकर्ता: मैं सिंगल पैरेंट (एकल अभिभावक) हूँ। मेरी एक बच्ची है छोटी। मुझे उसे कैसे संभालना चाहिए, कैसे संस्कारित करना चाहिए? क्योंकि मैं उसको थोड़ा सा फ़्रीडम (स्वतंत्रता) भी देती हूँ, तो बाहर के लोग बोलते हैं कि वो तुम्हारी सुनती ही नहीं है। तो कैसे उसको अच्छे से संस्कार…


प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहली बात तो आप और विवेकानंद जी एक ही फ्रेम (चौखट) में दो सुपर हीरोज बैठे हैं, तो आपकी जो बात है,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरे दो बच्चे हैं आचार्य जी और मेरा प्रश्न उन्हीं से सम्बन्धित है कि आजकल की जो पीढ़ी है, ये अभिभावकों की बात क्यों नहीं सुनती, और इतनी बहस क्यों करती है?

प्रश्न: फरीदाबाद से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, महिला हैं। कह रही हैं कि "मैंने देखा भी है कि घर-परिवार में महिलाओं को बड़े फैसले लेने या राय देने से रोका जाता है और उनको इतना महत्त्व भी नहीं दिया जाता हैं, बड़े मसलों में। पूछ रही हैं कि क्या वाकई महिलाएँ

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सब कहते हैं कि सबसे ताक़तवर रिश्ता माँ-बाप और बच्चों का होता है लेकिन अगर मैंने माँ-बाप को न पसन्द आने वाली लड़की से शादी करने का फैसला लिया तो वो रिश्ता भी तोड़ देते हैं। तो फिर इस रिश्ते का क्या अर्थ है? और अगर इसका

आचार्य प्रशांत: मालती का सवाल है, सूरत से। प्रणाम आचार्य जी। प्रकृति की प्रतिष्ठा पायी है तो मैं सच्ची कैसे हो सकती हूँ? सवाल पूछूँगी तो वो भी झूठा ही होगा आचार्य जी। जो मैं हूँ मुझे उसे पाना है। मुझे नहीं पता कि मुझे क्या पूछना है। मैं बोध…

प्रश्नकर्ता: सर, घर पर रहना कोई बुरी बात नहीं हुई न?
आचार्य प्रशांत: बेटा, बात अच्छे-बुरे की नहीं है। बात इसकी है कि तुम किसलिए हो? वो काम अगर घर पर बैठ कर हो रहा है, तो कर लो।
आज के समय में बच्चों में मोबाइल और गेम का एडिक्शन बढ़ता जा रहा है, जिसका मुख्य कारण खुद माता-पिता की लापरवाही और सुविधा-प्रियता है। समस्या को समझाने से नहीं, बल्कि सीधे नियंत्रित करने से हल किया जा सकता है। इसी तरह सोशल मीडिया तुलना और हीन भावना को बढ़ा रहा है। हर मानसिक समस्या का मूल समाधान आत्म-जागरूकता और सही दिशा में प्रयास है, जिसके लिए व्यक्तिगत पहल जरूरी है।
पूरी दुनिया की ओर देखिए सब सेटल्ड-ही-सेटल्ड लोग दिखाई दे रहे हैं। दिल-ही-दिल में हर सेटल आदमी जानता है कि वो ग़लत जगह सेटल हो गया है। जहाँ रुकना नहीं चाहिए वहाँ रुक गया है। अगर अभिभावकों को यह नहीं पता कि उन्होंने जीवन में क्या-क्या ग़लत करा है, तो उन्होंने जो कुछ करा है वही वो अपने बच्चों तक भी पहुँचा देंगे। बच्चे हमारे शब्दों से बहुत कम सीखेंगे, वो हमारे जीवन से सीख लेते हैं। आपका जीवन अगर आज़ादी भरा है, हिम्मत भरा है, तो बच्चों को सीख मिल गई आपसे।
बच्ची कुछ ऐसा कर रही है और आपको गुस्सा आ रहा है, उसको बता दीजिए कि “बेटा, आप जो कर रहे हो, बहुत गुस्सा आ रहा है, मेरा मारने का मन हो रहा है।” बस ये बोलिए, मारिए मत। फिर उसी से पूछिए, “अच्छा बताओ, मुझे गुस्सा क्यों आ रहा है?” उनको एंगेज़ करिए न। नहीं तो एक अजीब-सी बात है, वो कुछ कर रही है, आपने थप्पड़ मार दिया, उसको समझ में भी नहीं आया कि आपने थप्पड़ क्यों मार दिया। उसको ही बताने दीजिए कि “हाँ, मैंने जो किया है, उस पर गुस्सा तो आपको आएगा।” तो अब एक ज़्यादा एंगेजिंग रिलेशनशिप बनी न।
आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है, तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। एक स्वस्थ बच्चा बहुत दुर्लभ है। स्कूल अपने तरीक़े चला देता है और माँ-बाप उसमें सहभागी बन जाते हैं। इस पीढ़ी को मिकी माउस बनाए दे रहे हैं, रोबोटिक, असंवेदनशील और बहुत-बहुत भयभीत। बच्चे पर रोज़ सौ तीर लग रहे हैं; इस वक़्त उसको सुरक्षा चाहिए, और अध्यात्म के अलावा कोई दूसरा कवच नहीं है।
हर बच्चा विद्रोही ही पैदा होता है; ये आदर, सम्मान, संस्कृति, सभ्यता, तमीज़, तहज़ीब — ये सब जो शब्द हैं, बच्चों को बचाकर रखो इनसे। उसके ऊपर नियम-कायदे मत लगाइए — “यहाँ बैठो, ऐसे करो, चलो-चलो, सीधे हाथ से खाना खाया करो।” बच्चों में ज़िंदगी होनी चाहिए, अनुशासन नहीं; प्राण होना चाहिए। बच्चा चाहिए एकदम जिसमें भीतर ज़िंदगी इतनी है कि छलक रही है, बाँधें नहीं बंध रहा, समेटे नहीं सिमट रहा — ऐसा होना चाहिए बच्चा।
एक अज्ञानी को आप एक पौधा भी दे दीजिए कि इसे बड़ा कर दो, उससे वो न बड़ा हो। मनुष्य का शिशु तो बड़ी संवेदनशील वस्तु होती है, प्राणवान वस्तु होती है। अज्ञानी को तो आप प्राणहीन वस्तु भी दे दीजिए, तो वो उसका भी बंटाधार कर दे। आप समझ रहे हैं कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, एक इंसान की औलाद को जन्म देकर उसका पालन-पोषण करके, परवरिश करके, उसको एक सशक्त चैतन्य मनुष्य बनाना। कितनी बड़ी बात, कितनी भारी ज़िम्मेदारी होती है। और यहाँ 20, 22, 24 साल वाली, जिन्होंने जीवन में न कोई पढ़ाई की, न कुछ समझा, न कुछ जाना, वो धड़ल्ले से बेबी बूमिंग कर रही हैं।
आप ये नहीं कह सकते कि मैं तो उन्हीं शादियों में जाकर के वैसे ही नाचूँगा जैसे नाचता हूँ, लेकिन बच्चे मेरे बड़े शुद्ध संस्कारी निकल जाएँ — निकल ही नहीं सकते। अगर बच्चों को सुधारना है, तो उसमें केवल बच्चों का ही नहीं, माँ-बाप का, पूरे घर का सुधार निहित होगा। श्रम करना पड़ेगा। घर के वातावरण को समझना होगा। तब जाकर के बच्चे सुधरेंगे, नहीं तो बच्चे ठीक वैसे ही निकलेंगे जैसे आजकल की आम संतानें निकल रही हैं।
पहली चीज़ जो मुझे मेरे पिता से मिली, वह है — किताबें। मुझे दुनिया भर की हर दिशा की किताबें मिलती रहीं। जब भीतरी विकास हो रहा था और दुनिया के प्रति एक दृष्टि विकसित हो रही थी, तो मैं उन किताबों का बहुत-बहुत महत्त्व पाता हूँ। दूसरी चीज़ जो मैंने उनसे सीख ली, वह थी — अथॉरिटी के सामने कभी न दबना। जब सच बोल रहे हो, तो डरने की ज़रूरत नहीं है। तीसरी चीज़ — मैंने उनसे चुप रहना सीखा। तब बोलो जब बोलने की ज़रूरत हो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक बेटे या बेटी का माँ-बाप के प्रति क्या ऋण होता है? मेरे पिता भ्रष्ट व्यक्ति हैं, मुझे पसंद नहीं हैं। लेकिन बार-बार यह ऋण चुकाने वाली बात मन पर हावी हो जाती है। कुछ कहें!
आचार्य प्रशांत: संतान का और माँ-बाप का रिश्ता दो तलों पर…
आपके बच्चों को आपसे ठीक वही मिलेगा, जो आप हैं। जो चाहते हों कि उनके बच्चे निखर कर सामने आएँ, उन्हें सबसे पहले अपना उपचार करने की ज़रूरत है। बच्चे का भला चाहते हों, तो सर्वप्रथम अपना भला कीजिए। जैसे उसकी प्रगति उत्तरोत्तर है, वैसे ही आपकी प्रगति को भी उत्तरोत्तर होना होगा। जब भी बच्चे में समस्या होती है, तो उसका प्रथम कारण घर का माहौल होता है। घर अच्छा रखिए — घर में ईमानदारी की बात और प्रेम हो; हिंसा, कटुता और तमाम तरीकों के दुष्प्रभावों का आमंत्रण ना हो।
आपको खुद एक बाप जैसा होना पड़ेगा। बात इसकी नहीं है कि उसको बाप ने सिखाया क्या, बात इसकी है कि बाप बाप जैसा हुआ कि नहीं हुआ, सिखाना तो पड़ता ही नहीं है। और हमारे साथ क्या विडंबना है कि हम बाप जैसे होते नहीं, पर बेटे को सिखाने की होड़ में रहते हैं। कुछ भी नहीं सिखाना है, इतना सा भी नहीं सिखाना है; सिखा देंगे तो गड़बड़ हो जाएगी। कभी वो अपनी स्वेच्छा से कुछ पूछने आ गया तो आपने बता दिया वो अच्छी बात है। सिखाने की कोई ज़रूरत ही नहीं है, मौजूद रहिए, उपस्थित रहिए, एक साक्षी की तरह रहिए, देखते रहिए।
"प्रेम प्रेम सब कहैं, प्रेम न चीन्है कोय। जा मारग साहब मिलै, प्रेम कहावै सोय।" या जा मारग डायपर मिले प्रेम कहावै सोय? जिस मार्ग पर चलकर साहब से मुलाकात हो जाए, उस मार्ग का नाम है प्रेम (आकाश की ओर इशारा करते हुए) । या प्रेम उस मार्ग का नाम है जो *मैटरनिटी* (प्रसूति) वार्ड की ओर जाता है?
यथा ह्नुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीज क्षेत्र पुररेवावपन-काले गुल्मतृणवीरुद्धिर्गह्नमिव। भवत्येवमेव गृहा श्रमः कर्मक्षेत्र यस्मिन्न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथ:।।
“जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण से आदि…
आचार्य…
ये कला है? आग लगे ऐसी कला को।
तुम एक…
तो मैंने ये सोचा है कि जैसे जो गीता है, उपनिषद् जो…
आचार्य प्रशांत: नहीं साहब, आप जो उदाहरण…
आचार्य प्रशांत: मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ — जो फ़िल्में, जो पिक्चरें, मूवीज़ जनसामान्य के लिए रिलीज़ करी जाती हैं, उन पर सेंसर बोर्ड ‘ए’, ‘यूए’, ‘यू’ ये सब ठप्पा लगाता है न? लगाता है न? तो बहुत सारी बातें होती हैं जिनको समाज और सरकार और बाहर…
प्रश्नकर्ता: मैं कोटा, राजस्थान से हूँ। मैंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की है। आचार्य जी, मैं जिस शहर से आती हूँ, वो नीट और जेईई (मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज की प्रवेश परीक्षा) की कोचिंग के लिए मशहूर है, लेकिन पिछले कुछ सालों से आत्महत्या बढ़ती ही जा…
जैसे हम देखते हैं कि कोई मजदूर आदमी है, वह दिनभर मजदूरी करता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी एक बेटी है। इस बार वो कह रही थी कि मुझे घूमने जाना है कॉलेज ट्रिप में जयपुर वग़ैरह। पहली बार वो बाहर जा रही है अकेले। वो अभी सिर्फ़ बारह वर्ष की है।
हमने कहा कि तुम अभी छोटी हो, मत जाओ। उसने कहा कि…
आचार्य प्रशांत: होता क्या है कि हम जिनका भला चाहते हैं हम उन्हीं की ओर देखना शुरू कर देते हैं। यह ऐसी सी बात है कि कोई ड्राइवर गाड़ी चला रहा हो और सवारियों की ओर देखना शुरू कर दे कि कितनी प्यारी सवारियाँ है और मुझे इनका ख़याल रखना…
तो, आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है कि ऐसे तो मेरी लाइफ स्टाइल (जीवन शैली) सब…
आचार्य प्रशांत: तो सवाल है बच्चों के बारे में कि ये बच्चे ऐसे क्यों…
आचार्य: तुमको यहाँ…